नई दिल्ली में संपन्न 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के समापन के अवसर पर विदेश मंत्रालय ने साझा ब्रिक्स करेंसी को लेकर चल रही सभी अटकलों को खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय में सचिव (आर्थिक संबंध) सुधाकर दलेला ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल किसी भी साझा मुद्रा को लाने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है, बल्कि सदस्य देश आपसी व्यापार को अपनी-अपनी स्थानीय मुद्राओं में ही निपटाने पर जोर दे रहे हैं।
साझा मुद्रा पर विदेश मंत्रालय का स्पष्ट रुख
विदेश मंत्रालय के अनुसार, ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में कारोबार का उद्देश्य किसी मौजूदा वैश्विक भुगतान व्यवस्था को विस्थापित करना नहीं है, बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार ढांचे के पूरक के रूप में उपयोग करना है। इससे दो देशों के बीच होने वाले द्विपक्षीय व्यापार की लागत में कमी आएगी और मुद्रा विनिमय का जोखिम घटेगा।
'नई दिल्ली घोषणापत्र' और व्यापार निपटान
सम्मेलन के दौरान जारी 'नई दिल्ली घोषणापत्र' में यह सहमति बनी है कि स्थानीय मुद्राओं के माध्यम से व्यापार को बढ़ावा देने के लिए सभी देशों की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का पूरा सम्मान किया जाएगा, क्योंकि इस नीति में 'सबके लिए एक ही पैमाना' लागू नहीं किया जा सकता। इसके क्रियान्वयन के लिए गठित 'ब्रिक्स पेमेंट टास्क फोर्स' (बीपीटीएफ) को क्रॉस-बॉर्डर भुगतान प्रणालियों की इंटरऑपरेबिलिटी का अध्ययन करने और सुरक्षित, तेज तथा किफायती विकल्प तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं।
भारत की अध्यक्षता और वैश्विक कूटनीति
भारत की आठ महीने की अध्यक्षता के दौरान विभिन्न स्तरों पर 350 से अधिक बैठकें आयोजित की गईं। शिखर सम्मेलन में वैश्विक संघर्षों और आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच मतभेदों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए कूटनीति और आपसी संवाद पर विशेष जोर दिया गया। ब्रिक्स देशों का यह कदम वैश्विक व्यापार ढांचे को अधिक लचीला और लागत-प्रभावी बनाने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है।









