रेलवे का नया बिजनेस मॉडल, राख के ट्रांसपोर्ट से होगी भारी कमाई

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नई दिल्ली। भारतीय रेल ने थर्मल पावर स्टेशनों से निकलने वाली राख (फ्लाई ऐश) के परिवहन के जरिए करोड़ों रुपये का अतिरिक्त राजस्व जुटाने की एक व्यापक और पुख्ता कार्ययोजना तैयार की है। जो फ्लाई ऐश कभी ताप बिजली घरों के लिए निस्तारण के लिहाज से एक बड़ा सिरदर्द बनी हुई थी, आज सड़क निर्माण, सीमेंट उत्पादन और ईंट निर्माण में भारी मांग के चलते बेहद मूल्यवान हो चुकी है। अब स्थिति यह है कि इस छाई को हासिल करने के लिए बिजली संयंत्रों के बाहर मालवाहक ट्रकों की लंबी कतारें लगी रहती हैं, जिसे देखते हुए रेल मंत्रालय ने भी इस सेक्टर में व्यावसायिक संभावनाओं को पूरी तरह भुनाने के लिए कदम बढ़ा दिए हैं।

रेल मंत्री की उच्च स्तरीय बैठक और डेडिकेटेड लॉजिस्टिक नेटवर्क की रूपरेखा

इस परियोजना को लेकर रेल मंत्रालय की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव स्वयं इस पूरी योजना में व्यक्तिगत रूप से गहरी रुचि ले रहे हैं। हाल ही में रेलवे बोर्ड के मुख्यालय में आयोजित एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता खुद रेल मंत्री ने की, जिसमें इस छाई के परिवहन में रेलवे की हिस्सेदारी बढ़ाने के विभिन्न व्यावहारिक विकल्पों पर गहन मंथन किया गया। रेलवे बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, फ्लाई ऐश की सुगम और निर्बाध ढुलाई के लिए भविष्य में एक विशेष 'डेडिकेटेड लॉजिस्टिक नेटवर्क' स्थापित करने पर भी विचार किया जा रहा है, ताकि इसे मालढुलाई का एक प्रमुख और व्यवस्थित जरिया बनाया जा सके।

वर्तमान में सीमित हिस्सेदारी और फ्लाई ऐश की विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ती मांग

वर्तमान आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि देश के विभिन्न ताप बिजली घरों से सालाना लगभग 34 करोड़ टन राख का उत्पादन होता है, परंतु इसमें से रेलवे अभी केवल 130 लाख टन की ही ढुलाई कर पाता है और इसका बड़ा हिस्सा आज भी ट्रकों के माध्यम से ही भेजा जाता है। कोयले को जलाने के बाद सह-उत्पाद (बाय-प्रोडक्ट) के रूप में निकलने वाली इस छाई की मांग बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में तेजी से बढ़ी है। राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (एनटीपीसी) के वित्तीय वर्ष 2024-25 के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस राख का सर्वाधिक 32 प्रतिशत उपयोग सड़क एवं फ्लाईओवर निर्माण में, 27 प्रतिशत सीमेंट फैक्ट्रियों में, 14 प्रतिशत ईंट व टाइल्स बनाने में तथा शेष हिस्सा खदानों को भरने (बैकफिलिंग) और कृषि कार्यों में किया जा रहा है।

सुरक्षित पर्यावरण अनुकूल परिवहन प्रणाली और भावी राजस्व की संभावनाएं

चूंकि फ्लाई ऐश का असुरक्षित परिवहन पर्यावरण और वायु गुणवत्ता के लिए अत्यंत हानिकारक सिद्ध हो सकता है, इसलिए रेलवे इसके सुरक्षित संचलन के लिए विशेष रूप से निर्मित ढके हुए कंटेनरों का उपयोग करने की तैयारी में है। रेलवे अधिकारियों का कहना है कि वर्तमान में कोयला ढोने के लिए प्रयुक्त होने वाले बॉक्स-एन वैगनों का उपयोग भी इस कार्य के लिए किया जा सकता है, बशर्ते उन्हें पूरी तरह से कवर किया जाए ताकि राख हवा में न उड़े। रेल प्रशासन को पूरा भरोसा है कि यदि एक बार इस छाई के परिवहन के लिए एक व्यवस्थित और सुरक्षित तंत्र क्रियान्वित कर दिया जाता है, तो यह कोयले की ही भांति भारतीय रेलवे की वित्तीय आय को बढ़ाने वाला एक नया और बेहद लाभकारी जरिया साबित होगा।