दुर्गा पूजा के पंडाल में ढाक की गूंज सुनाई दे और हाथों में धुनुची लिए लोग थिरकते नजर आएं तो माहौल अपने आप खास लगने लगता है. खासकर बंगाल की दुर्गा पूजा में धुनुची नृत्य उत्सव की पहचान बन चुका है. मिट्टी के छोटे से पात्र में जलती धूप से उठता धुआं और ढाक की लय पर होता नृत्य देखने वालों का ध्यान खींचता है, लेकिन यह सिर्फ मनोरंजन या नृत्य का प्रदर्शन नहीं है. इसके पीछे पूजा से जुड़ी एक पुरानी परंपरा और श्रद्धा की भावना जुड़ी हुई है.
कई पूजा पंडालों में आज भी संध्या आरती के दौरान धुनुची नृत्य किया जाता है. आइए समझते हैं कि धुनुची क्या होती है और इस नृत्य को इतना खास क्यों माना जाता है.
क्या होती है धुनुची?
धुनुची मिट्टी से बना एक खास पूजा पात्र है, जिसका इस्तेमाल पारंपरिक रूप से धूप जलाने के लिए किया जाता है. इसका आकार नीचे से थोड़ा संकरा और ऊपर से खुला होता है. इसमें आमतौर पर जलता हुआ कोयला या नारियल का सूखा छिलका रखा जाता है. इसके ऊपर धूप या सुगंधित सामग्री डाली जाती है, जिससे धुआं निकलता है. दुर्गा पूजा के दौरान इसी धुनुची को हाथ में लेकर देवी की आरती और पूजा के समय नृत्य किया जाता है. धुएं के बीच ढाक की तेज लय और नर्तक की चाल मिलकर एक अलग ही दृश्य बनाते हैं.
धुनुची नाच को दुर्गा पूजा की भक्ति परंपरा से जोड़ा जाता है. मान्यता है कि देवी के सामने धुनुची लेकर नृत्य करना श्रद्धा और भक्ति प्रकट करने का एक तरीका है. पूजा में धूप अर्पित करने की परंपरा भी लंबे समय से चली आ रही है. धुनुची से निकलने वाला धुआं पूजा के माहौल का हिस्सा बनता है. इसी वजह से धुनुची नाच को केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन के तौर पर नहीं देखा जाता. हालांकि, इससे जुड़ी मान्यताएं परिवार, क्षेत्र और पूजा की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं.
ढाक की ताल का क्यों है खास कनेक्शन?
धुनुची नाच की बात ढाक के बिना अधूरी लगती है. ढाक एक पारंपरिक वाद्य है, जिसकी गहरी और लयबद्ध आवाज दुर्गा पूजा के माहौल में खास पहचान रखती है. धुनुची लेकर नाचने वाले लोग इसी ताल के साथ अपनी चाल और हाथों की गति बदलते हैं. कई जगहों पर नर्तक एक हाथ में धुनुची लेकर नाचते हैं. अनुभवी लोग कभी-कभी एक से ज्यादा धुनुची के साथ भी प्रदर्शन करते हैं. ऐसे प्रदर्शन देखने में आकर्षक जरूर होते हैं, लेकिन जलती सामग्री होने के कारण इसमें सावधानी रखना जरूरी है.
दुर्गा पूजा में धुनुची नाच कब किया जाता है?
धुनुची नाच आमतौर पर पूजा और आरती के समय किया जाता है. कई जगहों पर खासकर संध्या आरती के दौरान इसका आयोजन होता है. पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा में इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पंडालों में जुटते हैं. अब यह परंपरा केवल एक खास उम्र या वर्ग तक सीमित नहीं रही. महिलाएं, पुरुष और युवा भी धुनुची नाच में हिस्सा लेते हैं. कुछ पूजा समितियां इसके लिए प्रतियोगिताएं भी आयोजित करती हैं, जहां प्रतिभागी ढाक की ताल पर अपनी प्रस्तुति देते हैं.
परंपरा के साथ उत्सव का भी हिस्सा बना धुनुची नाच
समय के साथ धुनुची नाच ने धार्मिक परंपरा के साथ सांस्कृतिक उत्सव का रूप भी अपना लिया है. पंडाल में जब ढाक बजता है और लोग धुनुची लेकर नृत्य करते हैं तो आसपास मौजूद लोग भी उत्साह से उनका साथ देते हैं. इससे पूजा का सामूहिक माहौल और जीवंत हो जाता है. इस परंपरा की खास बात यही है कि इसमें पूजा, संगीत और नृत्य एक साथ दिखाई देते हैं. धुनुची का धुआं, ढाक की आवाज और नृत्य की लय मिलकर दुर्गा पूजा की उस सांस्कृतिक तस्वीर को सामने लाते हैं, जिसे खासकर बंगाल की पूजा परंपरा में लंबे समय से देखा जाता रहा है.









