कृष्ण से कितनी बड़ी थीं राधा? आखिर क्यों बरसाने की लाडली ने जन्म लेते ही नहीं खोली थीं आंखें,

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मथुरा-वृंदावन की गलियों में राधा-कृष्ण की लीलाएं आज भी गूंजती हैं. आपको इनकी लीलाओं का रहस्य कहीं ना कहीं देखने और सुनने को मिल जाएगा. एक ऐसी दिलचस्प कहानी कहें या लीला हम आपको बताने जा रहे हैं. वैसे शायद आपने सुन भी रखी हो कि राधा जी कृष्ण से उम्र में बड़ी थीं. इतना ही नहीं राधा रानी ने अपनी आंखें पहली बार कृष्ण को देखकर खोली थी. आपको ये बात अजीब लग सकती है कि जब राधा रानी बड़ी थीं तो आंखें पहली बार कृष्ण को देखकर कैसे खोलीं… आइए जानते हैं सब कुछ.

हम सभी जानते हैं कि राधा रानी का जन्म बरसाना में हुआ. मगर, सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है. राधा रानी का जन्म बरसाने में नहीं बल्कि रावल गांव में हुआ था. कहा जाता है कि राजा वृषभानु यमुना में स्नान के लिए गए थे. तभी कमल पुष्प में राधा रानी उन्हें मिली थीं. इसलिए उनका यहां घुटमुन चलते हुए बाल रूप है. ब्रज की बेटी को लाडली भी कहते हैं. राधा रानी को यहां बरसाना में लाडली जी के नाम से जाना जाता है. मथुरा डिस्ट्रिक्ट मेमोरियल बुक और ब्रज वैभव पुस्तक के साथ-साथ गर्ग संहिता, ब्रज परमानंद सागर में भी रावल गांव का जिक्र किया गया है.

यहीं वृषभानु के राजमहल और निवास थे इसलिए इस स्थान को रावल कहा गया है. मुगलों के आक्रमण और यमुना में आई बाढ़ से मंदिर को काफी नुकसान हुआ था. सन् 1924 के दौरान आई बाढ़ में यह मंदिर पूरी तरह से तबाह हो गया था. वृंदावन के सेठ हरगुलाल ने इसका जीर्णोद्धार कराया और आज देश के कोने-कोने से यहां श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं.
कितनी बड़ी राधा रानी
पंडित गौरांग शर्मा ने राधा रानी के प्राकट्य उत्सव को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी दी. उन्होंने कहा कि ऐसा बताया जाता है कि वृषभानु दुलारी राधा रानी अपने शखा कृष्ण से करीब साढ़े 11 महीने बड़ी थीं. उन्होंने अपने नेत्र नहीं खोले थे. रावल गांव से लगभग 8 किलोमीटर दूर गोकुल में जब कन्हैया ने जन्म लिया, तो नंद उत्सव में बधाई देने गए राजा वृषभानु और माता कीर्ति उन्हें भी साथ ले गईं. तब राधारानी घुटने के बल चलकर श्याम सुंदर के पालने तक पहुंच गई और श्रीकृष्ण को नजर भरके देखते हुए राधा रानी ने पहली बार अपनी आंखें खोली थी.
5250 साल से बिना जड़ के जिंदा है ये वृक्ष
वहीं पुजारी ने बताया कि मंदिर की छत पर एक वृक्ष उगा हुआ है. उस वृक्ष की खासियत यह है कि इस वृक्ष की जड़ें नहीं हैं. यह 12 महीने हरा भरा रहता है. लाडली के पालने के ऊपर मंदिर की गुम्मद में ये पेड़ उगा हुआ है. इस पेड़ को मन्नत का पेड़ भी कहा जाता है. यहां आने वाले श्रद्धालु अपने हाथों से मन्नत का धागा बांधकर जाते हैं. मन्नत पूरी होने के बाद इस धागा को आकर लोग खोल लेते हैं. 5250 साल से बिना जड़ के जिंदा है ये वृक्ष.