Tuesday, December 6, 2022
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क्‍या आज भी रखा है गणेश जी का कटा हुआ सिर, क्‍या यहां छुपा है – दुनिया के खत्म होने का राज

आइये जातने है यह रहस्‍यमय गुफा “पाताल भुवनेश्वर” के बारे में

ऐसी मान्यता है कि मंदिर में भगवान गणेश के कटे हुए सिर को स्थापित किया गया है। यहां मौजूद गणेश मूर्ती को आदिगणेश कहा जाता है। इस गुफा में चार खंबे हैं जो युगों – सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग को दर्शाते हैं। इनमें पहले तीन आकारों के खंबों में कोई परिवर्तन नहीं होता, लेकिन कलियुग का खंबा लंबाई में ज्यादा है। इस गुफा को लेकर एक और खास बात ये भी है कि यहां एक शिवलिंग है जो लगातार बढ़ रहा है, ऐसी मान्यता है कि जब ये शिवलिंग गुफा की छत को छू लेगा, तब दुनिया खत्म हो जाएगा। गुफा में एक साथ चार धामों के दर्शन भी किए जा सकते हैं। ऐसी मान्यता है कि गुफा में एक साथ केदारनाथ, बद्रीनाथ, अमरनाथ देखे जा सकते हैं। बताया जाता है कि इस गुफा में मौजूद पत्थर से पता लग सकता है कि दुनिया का अंत कब होगा।

पुराणों के अनुसार आज भी इस गुफा में है गणेश जी का कटा हुआ सिर

पुराणों के अनुसार आज भी इस गुफा में है गणेश जी का कटा हुआ सिर,ब्रह्मकमल शिलारूपी मूर्ति के ठीक ऊपर 108 पंखुड़ियों वाला ब्रह्मकमल। पुराणों के अनुसार ये हम सभी जानते हैं कि भगवान शिव ने क्रोध में आकर भगवान गणेश का सिर काट दिया था और मां पार्वती के अनुरोध पर ही भगवान शिव ने गणेश जी के मुख पर शीशु हाथी का मुख लगाया था।

इसके बाद उनमें प्राण प्रतिष्ठा की थी। लेकिन क्या आप ये जानते हैं जब गणेश जी का सिर धड़ से अलग किया गया था, तो वो कहां जाकर गिरा था? इस बात का जवाब उत्तराखंड स्थित पिथौरागढ़ की पाताल भुवनेश्वर गुफा में है। पुराणों के अनुसार भगवान गणेश जी का सिर पाताल भुवनेश्वर गुफा में जा कर गिरा था। और ये सिर गुफा में आज भी मौजूद है। चलिए जानते हैं क्या है इस रहस्य का सच।

देश-विदेश में भगवान गणेश के जितने भी मंदिर हैं उनमें उनकी हर मूर्ति में हाथी का सिर लगा हुआ ही नजर आता है। हाथी का सिर ही भगवान गणेश की असली पहचान है। कई लोगों के मन में ये सवाल भी आता है कि आखिर गणेश जी के असली सिर कटने के बाद कहां गया होगा? लेकिन आपको ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि गणेश जी का असली सिर एक गुफा में है।
पाताल भुवनेश्वर गुफा

गुफा को पाताल भुवनेश्‍वर के नाम से जाना जाता

मान्‍यता है कि भगवान शिव ने गणेश जी का जो मस्‍तक शरीर से अलग कर दिया था उसे उन्‍होंने एक गुफा में रख दिया था। इस गुफा को पाताल भुवनेश्‍वर के नाम से जाना जाता है। इस गुफा में विराजित गणेशजी की मूर्ति को आदि गणेश कहा जाता है। मान्‍यता के अनुसार कलयुग में इस गुफा की खोज आदिशंकराचार्य ने की थी।

उत्तराखंड में पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट से 14 किलोमीटर दूर स्थित

यह गुफा उत्तराखंड में पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट से 14 किलोमीटर दूर स्थित है. इसे पाताल भुवनेश्वर गुफा कहते हैं। मान्‍यता है कि इस गुफा में रखे गणेश के कटे हुए सिर की रक्षा स्‍वयं भगवान श‍िव करते हैं।
पाताल भुवनेश्वर गुफा

108 वाला शवाष्टक दल ब्रह्मकमल सुशोभित

108 पंखुड़ियों वाला ब्रह्मकमल शिलारूपी मूर्ति के ठीक ऊपर 108 वाला शवाष्टक दल ब्रह्मकमल सुशोभित है। इससे ब्रह्मकमल से पानी भगवान गणेश के शिलारूपी मस्तक पर दिव्य बूंद टपकती है। मुख्य बूंद आदिगणेश के मुख में गिरती हुई दिखाई देती है। मान्यता है कि यह ब्रह्मकमल भगवान शिव ने ही यहां स्थापित किया था।
पाताल भुवनेश्वर गुफा

मस्‍तक को लेकर है और एक मान्‍यता

ये भी है मस्‍तक को लेकर है एक मान्‍यता ये मान्यता भी है कि जब भगवान शिव ने जब गणेश जी का सिर काटा था तो वो चन्द्र लोक में चला गया। श्रीगणेश का असल मस्तक चन्द्रमण्डल में है, इसी आस्था से भी धर्म परंपराओं में संकट चतुर्थी तिथि पर चन्द्रदर्शन व अर्घ्य देकर श्रीगणेश की उपासना व भक्ति द्वारा संकटनाश व मंगल कामना की जाती है।

पाताल भुवनेश्वर की खोज कैसे हुई

इस मंदिर के बारे में ऐसा कहा जाता है कि सूर्य वंश के राजा और त्रेता युग में अयोध्या पर शासन करने वाले राजा ऋतुपर्णा ने इस गुफा की खोज की थी, जिसके बाद उन्हें यहां नागों के राजा अधिशेष मिले थे। ऐसा कहा जाता है कि इंसानों द्वारा मंदिर की खोज करने वाले राजा ऋतुपर्णा पहले व्यक्ति थी। अधिशेष ऋतुपर्णा को गुफा के अंदर ले गए, जहां उन्हें देवी देवताओं के साथ-साथ भगवान शिव के दर्शन करने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। ऐसा कहा जाता है कि फिर उसके बाद इस गुफा की चर्चा नहीं हुई और फिर द्वापर युग में पांडवों द्वारा इस गुफा को फिर से ढूंढ लिया गया। जहां वे इस गुफा के पास भगवान की पूजा करते थे स्कंदपुराण में उल्लेख है कि खुद महादेव शिव पाताल भुवनेश्वर में रहते हैं और अन्य देवी देवता उनकी यहां पूजा करने आते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार कलियुग में मंदिर की खोज जगदगुरु आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में की थी, जहां उन्होंने यहां तांबे का शिवलिंग स्थापित किया था।

पाताल भुवनेश्वर जाने का सबसे अच्छा समय

अगर आप रोमांच और धार्मिक प्रेमी हैं, तो अच्छा होगा आप इस मंदिर के दर्शन एक सही समय में करें। उत्तराखंड में इस रहस्यमयी गुफा की यात्रा करने के लिए मानसून का समय बिल्कुल भी सही नहीं है, आप यहां मार्च से जून के बीच दर्शन करने के लिए जा सकते हैं। अगर आपको ठंड में घूमना बेहद पसंद है तो ठंड में आप अक्टूबर से फरवरी के महीने में भी जा सकते हैं।

कैसे पहुंचें पाताल भुवनेश्वर

सड़क द्वारा:

ये जगह हर जगह से अच्छी तरह से जुड़ी हुई है, जहां आप आसानी से पहुंच सकते हैं। यह नई दिल्ली, लखनऊ और कोलकाता जैसे प्रमुख शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। रेलवे स्टेशन या हवाई अड्डे से टैक्सी और बसें आसानी से उपलब्ध हैं।

रेलवे द्वारा:

निकटतम रेलवे स्टेशन टनकपुर रेलवे स्टेशन है, जो पाताल भुवनेश्वर से 154 किमी दूर है।

हवाई जहाज से:

टनकपुर में बसें और टैक्सियाँ उपलब्ध हैं। निकटतम हवाई अड्डा पंतनगर हवाई अड्डा है, जो पाताल भुवनेश्वर से 224 किमी दूर है।

(डिस्क्लेमर : यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। प्रदेश लाइव इसकी पुष्टि नहीं करता है।)

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