हरतालिका तीज की पूजा समय सुनें माता पार्वती की यह कथा, पूरा होगा व्रत, मिलेगा अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद

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14 सितंबर को ब्रह्म योग में हरतालिका तीज है. हरतालिका तीज का व्रत काफी कठिन होता है क्योंकि इसमें निर्जला उपवास सूर्योदय काल से अगले दिन सूर्योदय तक करते हैं. इसमें माता पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी की पूजा करते हैं. शिव और गौरी की कृपा से व्रती को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है, वहीं अविवाहित युवतियों को योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है. अगर आप हरतालिका तीज का व्रत रख रही हैं, तो आपको पूजा के समय हरतालिका तीज की व्रत कथा जरूर सुननी चाहिए. इससे आपका व्रत पूरा होगा और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद भी मिलेगा.
हरतालिका तीज 2026 व्रत कथा

हरतालिका तीज का व्रत सबसे पहले माता पार्वती ने शिव जी को प्राप्त करने के लिए रखा था. एक समय की बात है, भगवान शिव माता पार्वती को उनके पूर्वजन्म की कथा सुना रहे थे, उसी क्रम में उन्होंने माता पार्वती के वर्तमान स्वरूप की भी कथा सुनाई. उसमें ही हरतालिका तीज की व्रत कथा आती है.
भगवान शिव ने देवी पार्वती से कहा कि सती ने जब आत्मदाह कर लिया, तो फिर उनका जन्म हिमालयराज के घर पुत्री के रूप में हुआ. समय के साथ पार्वती को माता-पिता का प्रेम मिल रहा था. एक दिन नारद मुनि हिमालयराज से मिलने उनके घर पहुंचे. उन्होंने देवी पार्वती से भगवान विष्णु के विवाह का प्रस्ताव रखा.

य​ह सुनकर उनके पिता हिमालयराज काफी खुश हो गए. भगवान विष्णु उनके जामाता यानि दामाद बनेंगे. उन्होंने उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया. जब पार्वती जी को इसकी सूचना मिली तो वे खुश नहीं हुईं. उन्होंने अपनी सहेली को बताया कि वे भगवान शिव को पति के रूप में पाना चाहती हैं. उनके सामने बड़ा ही धर्मसंकट था, एक ओर पिता की बात थी और दूसरी ओर अपना प्रण.

उन्होंने अपनी सहेलियों से कहा कि अब तो प्राण त्यागने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है. तब सहेलियां उनको महल से बाहर ले गईं और एक घने वन में ले जाकर एक गुफा के अंदर छिपा दिया. उनका म​कसद था कि पार्वती का विवाह विष्णु जी से न हो और उनके पिता भी उनकी तलाश न कर पाएं.
देवी पार्वती ने उस गुफा में रेत से शिवलिंग बनाया और पूजा करके कठोर तपस्या प्रारंभ कर दी. उधर उनके पिता अपनी बेटी की तलाश करा रहे थे. दिन, सप्ताह, महीने और फिर साल बीतने लगे. पार्वती जी ने हजारों साल तक व्रत, जप और कठोर तप किया.
आंधी, तूफान और बारिश के बीच उन्होंने अपना तप करना नहीं छोड़ा. एक समय उन्होंने फूल, अन्न, जल सब छोड़. भूख लगने पर बेलपत्र के सूखे पत्ते खाकर रहीं. भगवान शिव ने कठोर परीक्षा ली, लेकिन वे अपने पथ से विचलित नहीं हुईं.
एक दिन भगवान शिव प्रसन्न हो गए और माता पार्वती के सामने प्रकट हुए. पार्वती जी को वरदान मांगने को कहा. देवी पार्वती ने उनको पति रूप में प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की. तब भोलेनाथ ने उनको मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद दिया.
तब तक हिमालयराज भी उस गुफा में आ गए. देवी पार्वती को ऐसी अवस्था में देखकर दुखी हो गए. तब देवी पार्वती ने सारी बात बताई. इस पर हिमालयराज ने कहा कि उनका विवाह महादेव से होगा. फिर विधि विधान से पार्वती जी का विवाह शिव जी से हुआ.