Sri Krishna Janmashtami : गृहस्थ जीवन वालों के लिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी छह सितंबर को मनाना शुभ रहेगा। प्रतिवर्ष भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला श्रीकृष्ण जन्माष्टमी इस बार बेहद खास माना जा रहा है। पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रात के 12 बजे रोहणी नक्षत्र में हुआ था। इस दिन अर्धकालीन अष्टमी तिथि, बुधवार, रोहिणी नक्षत्र एवं वृष के चंद्रमा का दुर्लभ एवं शुभ योग बन रहा है। इस वर्ष 6 सितम्बर को सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है और चंद्रमा वृषभ राशि का तथा रोहिणी नक्षत्र में होने से एक विशेष योग 30 सालों बाद निर्मित हो रहा है। यही वजह है कि यह कृष्ण जन्माष्टमी सुख, समृद्धि और मनोवांछित फल देने वाला माना जा रहा है।
सर्वार्थ सिद्धि योग
ज्योतिष आचार्य पंडित अशोक मिश्र ने बताया कि कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर मध्य रात्रि में रोहिणी नक्षत्र बन रहा है जिसके चलते सर्वार्थ सिद्धि योग निर्मित हो रहा है। रोहिणी नक्षत्र 6 सितम्बर की सुबह 9.20 से 7 सितम्बर को सुबह 10. 25 तक रहेगा। रोहिणी को चंद्रमा की पत्नी माना जाता है और इस दिन चंद्रमा अपने उच्च अंश वृषभ राशि में होगा। ग्रहों की यह दशा पूजन अर्चन के योग से विशेष फलदायी बताई जा रही है। सर्वार्थ सिद्धि योग में की गई पूजन अर्चन भक्तों को विशेष फल देगी।
इस वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि
पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को अर्द्ध रात्रि में वृष का चंद्रमा होनेका कई वर्षों तक संयोग बना है, लेकिन साथ में रोहिणी नक्षत्र का योग नहीं बना।
इस वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, वृष का चंद्रमा और बुधवार का एक साथ मिलना कृष्ण भक्तों के लिए उत्साह का विषय है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी रोहिणी नक्षत्र के योग से रहित हो तो केवला कही जाती है और रोहिणी नक्षत्र सेयुक्त हो तो जयंती योग वाली कही जाती है। जयंती में यदि बुधवार का योग आ जाए तो वह अति उत्कृष्ट फल देने वाली कही जाती है। वैष्णव संप्रदाय को माननेवालों के लिए कान्हा का जन्मोत्सव सात सितंबर को है। आचार्य पंडित अशोक मिश्र के अनुसार गौतमी तंत्र में जयंती योग वाली श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के बारे में कहा गया है कि यदि इस दिन व्रत, अर्चन और उत्सव संपन्न किया जाए तो कोटि जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं और वह जन्म बंधन से मुक्त होकर परम धाम में निवास करता है। उस दिन व्रत और अर्चन करने से पितर भी प्रेत योनि से मुक्त हो जाते हैं।
कैसे करें जन्माष्टमी में श्रीकृष्ण की आराधना
इस वर्ष विशेष ग्रह नक्षत्र में होने की वजह से जन्माष्टमी को काफी शुभ माना जा रहा है। रात्रिकालीन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा का है विशेष महत्व जन्माष्टमी व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। इसके बाद स्वच्छ कपड़े पहनकर मंदिर में दीप जलाएं और सभी देवी- देवताओं की पूजा-अर्चना करें। इसके बाद लड्डू-गोपाल जलाभिषेक कर भोग लगाएं और धूप व दीप जलाएं। रात्रि में पूजन के लिए तैयारी करें। जन्माष्टमी पर रात्रि में पूजन का विशेष महत्व होता है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अर्द्धरात्रि में हुआ था। रात्रि पूजन के लिए भगवान का झूला सजाएं। इसके बाद श्रीकृष्ण को पंचामृत या गंगाजल से अभिषेक करें। फिर उनका श्रृंगार करें। इसके साथ ही पूजा में उन्हें मक्खन, मिठाई, मेवा, मिश्री और धनिया की पंजीरी का भोग लगाएं। पूजा में भगवान श्रीकृष्ण की आरती जरूर करें। विशेष काल और नक्षत्र में भजन कीर्तन के साथ कृष्ण कथा, कृष्णाष्टकम और लीला अमृत का पाठ करते हैं तो इससे भगवान श्री कृष्णा प्रसन्न होंगे और सुख समृद्धि तथा सफलता का आशीर्वाद मिलता है।