मुंबई: नाना पाटेकर अब इस दुनिया में नहीं रहे। इस बात को स्वीकार करते हुए भी भीतर का कोई सच यह कहता है कि अभी बात पूरी नहीं हुई है। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो जब इस दुनिया से जाते हैं, तो हवा में अपनी आवाज का भारीपन, एक खास तरह का गुस्सा—जो कभी किसी अन्याय के खिलाफ उबला करता था—और वह अचानक फूट पड़ने वाली हंसी पीछे छोड़ जाते हैं, जो किसी छोटे बच्चे की निश्छलता की तरह बिल्कुल साफ और निर्मल होती थी।
वे एक अभिनेता थे, और बहुत बड़े अभिनेता थे। लेकिन शायद इससे भी पहले वे एक सच्चे इंसान थे। मुंबई की मायानगरी ने उन्हें पहचान दी और उनकी फिल्मों ने उन्हें देश के कोने-कोने तक पहुंचाया। 'अंकुश', 'प्रहार', 'परिंदा', 'क्रांतिवीर', 'अब तक छप्पन', 'नटसम्राट', 'कोहराम', 'तिरंगा' और 'वेलकम' जैसी ढेर सारी फिल्मों में उनके किरदार भले ही अलग-अलग थे, लेकिन उनके भीतर का आदमी हर जगह एक ही जैसा था। वह एक ऐसा इंसान था जो अन्याय देखकर कभी चुप नहीं बैठ सकता था। मैंने उन्हें हमेशा एक ऐसे दरवाजे की तरह देखा, जो कभी पूरी तरह बंद नहीं होता और जब खुलता है तो एक झटके के साथ खुलता है। उनकी आवाज में महाराष्ट्र की माटी की वह सोंधी और तीखी गंध थी, जो जब बोलती थी, तो मुंबई की बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच एक खाली सड़क की याद दिला देती थी। उनके चेहरे पर एक ही समय में दो मौसम साफ नजर आते थे—एक तपती हुई धूप, जहाँ अन्याय के खिलाफ गुस्सा पकता था, और दूसरी अचानक बरस जाने वाली वह बारिश, जो किसी अबोध बच्चे की हंसी की तरह एकदम निर्मल होती थी।
सिनेमा ने रंगों के रास्ते बुलाया, अभिनय के जोड़े रंग
जनवरी 2006 में उनसे हुई एक छोटी-सी मुलाकात आज बहुत दूर की बात लगती है। फिल्म 'अपहरण' रिलीज हो चुकी थी। नाना पाटेकर सामने थे, लेकिन मैं उन्हें सिर्फ एक अभिनेता की तरह नहीं देख पा रहा था। मेरे लिए उस समय वे 'सर जेजे इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट' के एक पुराने और समर्पित विद्यार्थी थे। ऐसा शख्स, जिसने कभी रंगों के सामने बैठकर इस दुनिया को गहराई से देखा होगा। उन्होंने खुद कहा था कि वे चित्रकार पहले हैं और अभिनेता बाद में। कई बार इंसान अपने बारे में एक ऐसा वाक्य कह देता है कि उसके बाद कुछ और कहने की जरूरत ही नहीं रह जाती। नाना पाटेकर ने बताया था कि मुजफ्फर अली की फिल्म ‘गमन’ के पोस्टर और पब्लिसिटी डिजाइन उन्होंने ही तैयार किए थे, और उसी फिल्म में उन्हें एक छोटी सी भूमिका भी मिली थी। सिनेमा ने उन्हें पहले रंगों के रास्ते अपनी ओर बुलाया था, और उसके बाद अभिनय के रास्ते पर आगे बढ़ाया।
नाना पाटेकर की कठोरता के भीतर एक बेहद मुलायम जगह थी, जिसे वे हमेशा बहुत बचाकर रखते थे। किसी जरूरतमंद की मदद करनी हो तो शायद उन्हें यह जताने की भी जरूरत महसूस नहीं होती थी कि उन्होंने किसी की सहायता की है। वे बिल्कुल वैसे ही थे, जैसे हमारे गांवों के कुछ लोग हुआ करते हैं। कई बार वे आपकी बात से सहमत न भी हों, लेकिन किसी भी संकट के समय आप सबसे पहले उन्हीं को अपने दरवाजे पर खड़ा पाएंगे। क्या यही वह मुख्य कारण नहीं है कि जिस इंसान को पूरा देश जानता और पहचानता था, उसे गांव की साधारण जिंदगी में रहना सबसे ज्यादा अच्छा लगता था? शहर ने उन्हें एक बड़ा आभामंडल दिया था, लेकिन उनके भीतर की मिट्टी और गांव ने उन्हें एक असली इंसान बनाए रखा। उनके भीतर माटी की खुशबू थी, और मिट्टी की अपनी एक खास गंध होती है—आप चाहे कितनी भी दूर क्यों न चले जाएं, वह गंध हमेशा आपके साथ रहती है। नाना पाटेकर के साथ भी ऐसा ही था।
नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं हैं। कुछ कलाकार अपने पीछे फिल्में छोड़ जाते हैं, कुछ संवाद छोड़ जाते हैं, तो कुछ अपनी छवियां छोड़ जाते हैं, लेकिन नाना पाटेकर इनसे कुछ बहुत अधिक छोड़ गए हैं—और वह है उनका अपना अनूठा स्वभाव।
असरदार असल जिंदगी: नदी-तालाबों को बचाया और मुसीबत के वक्त हमेशा किसानों के साथ खड़े रहे
पर्दे पर हमेशा गुस्से और संघर्ष की सशक्त आवाज बने नाना पाटेकर ने कैमरे की चकाचौंध से बाहर निकलकर महाराष्ट्र के दूर-दराज के गांवों और किसानों के लिए एक लंबी और संघर्षपूर्ण लड़ाई लड़ी। वर्ष 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 'नाम फाउंडेशन' की नींव रखी और समाज सेवा के क्षेत्र में कदम बढ़ाया।
सम्मान की लड़ाई और जल संरक्षण: नाना पाटेकर ने 'नाम फाउंडेशन' की मदद से सूखाग्रस्त इलाकों में नदियों और नालों को गहरा तथा चौड़ा करने, पुराने जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने, टूटी हुई नहरों की मरम्मत करने और खेत-तालाब बनाने जैसे महत्वपूर्ण कार्य किए। भूजल स्तर को ऊपर उठाने के लिए बारिश के अमूल्य पानी का संचय कर उसे जमीन के भीतर पहुंचाया गया, जिससे आसपास के कुओं और कृषि की सिंचाई व्यवस्था में अभूतपूर्व सुधार हुआ।
किसानों को आत्मनिर्भर बनाने पर विशेष जोर: नाना पाटेकर की सोच हमेशा से किसानों को केवल आर्थिक मदद पाने वाला मोहताज बनाने के बजाय उन्हें फिर से अपने पैरों पर खड़ा कर आत्मनिर्भर बनाने की रही। तात्कालिक आर्थिक सहायता से आगे बढ़कर उन्होंने पानी की समस्या का एक स्थायी समाधान तलाशा, खेती-किसानी को दोबारा मजबूत किया और किसान परिवारों को स्वावलंबी बनाया।
एक दशक में 178 नदियों को संवारा, कई राज्यों में फैला रहे जागरूकता
नाना पाटेकर के 'नाम फाउंडेशन' ने वर्ष 2015 से 2025 के बीच महाराष्ट्र समेत देश के कई अन्य राज्यों में कुल 2,246 जलस्रोतों का सफलतापूर्वक पुनरुद्धार किया है। इस दौरान कुल 178 नदियों को पुनर्जीवित कर संवारा गया है, 515 नालों और जलधाराओं को गहरा व चौड़ा किया गया है, तथा 769 टैंकों से भारी गाद निकाली गई है।
यह संस्था महाराष्ट्र के अलावा असम, अरुणाचल प्रदेश, और मणिपुर में देश के अमर शहीदों के बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल बनाने का सराहनीय काम कर रही है। इसके साथ ही, देश के विभिन्न हिस्सों में बाढ़ पीड़ितों की सहायता में भी यह संस्था लगातार जुटी हुई है। बाद के दिनों में मेघालय और असम को भी इन राहत कार्यों से जोड़ा गया। इस संस्थान ने बिहार में भीषण बाढ़ से प्रभावित गांवों के पुनर्निर्माण के कार्य में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
उस गांव की कहानी, जिसे नाना ने पानी के संकट से उबारा और बना दिया टैंकर मुक्त
महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर से 57 किलोमीटर दूर वैजापुर तहसील के धोंडलगांव को नाना पाटेकर ने वर्ष 2016 में गोद लिया था। नदी विशेषज्ञ आनंद असोलकर बताते हैं कि मीठे और रसीले नींबू के उत्पादन के लिए मशहूर इस गांव में बारिश का मौसम खत्म होते ही पानी के टैंकरों का आना शुरू हो जाता था। स्थानीय नदी पर बने 12 बैराज पूरी तरह गाद से भर चुके थे, जिसके कारण पानी का रुकना बंद हो गया था और किसान एक साल में एक से ज्यादा फसल भी नहीं उगा पाते थे। 'नाम' संस्था की मदद से जब यहां से गाद को हटाया गया, तो पानी को संचित करने की क्षमता में भारी इजाफा हुआ। आज इस गांव के 70 प्रतिशत किसान साल में दो फसलें और कुछ किसान तो तीन फसलें तक आसानी से उगा रहे हैं। वर्ष 2016 से यह पूरा गांव पानी के मामले में पूरी तरह टैंकर-मुक्त बन चुका है।
कोविड महामारी के संकट काल में किसानों को पहुंचाई मदद
किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं के बाद उनके पीड़ित परिवारों की दयनीय हालत को बेहद करीब से देखने वाले नाना पाटेकर ने वर्ष 2015 में कई जरूरतमंद परिवारों को अपने हाथों से 15-15 हजार रुपये के आर्थिक चेक सौंपे थे। इसके अलावा, कोविड-19 (Covid-19) महामारी के दौरान देशव्यापी लॉकडाउन के कठिन समय में 'नाम फाउंडेशन' ने महाराष्ट्र के भीतर 11,236 से अधिक जरूरतमंद परिवारों को मुफ्त राशन और किराने की किट वितरित कीं, तथा प्रत्येक परिवार को 15 हजार से लेकर 25 हजार रुपये तक की प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता भी प्रदान की।









