मुंबई: किसी भी फिल्म के किरदार या पात्र को हमेशा एक कला और अभिनय के नजरिए से ही देखा जाना चाहिए, न कि उसे कलाकार की वास्तविक निजी जिंदगी से जोड़कर देखना चाहिए। यह विचार जाने-माने अभिनेता और सांसद रवि किशन के हैं, जिनकी बहुप्रतिक्षित फिल्म 'मिर्जापुर: द मूवी' का ट्रेलर हाल ही में आधिकारिक तौर पर रिलीज किया गया है।
'मिर्जापुर: द मूवी' को लेकर क्या बोले रवि किशन?
सक्रिय राजनीति में एक जनप्रतिनिधि के रूप में काम करते हुए क्या किसी कलाकार के लिए पर्दे पर नकारात्मक (नेगेटिव) भूमिका निभाना मुश्किल होता है? इस सवाल पर रवि किशन का स्पष्ट मानना है कि दर्शक को हमेशा पर्दे के पात्र को सिर्फ एक पात्र के रूप में ही देखना चाहिए। उन्होंने अपनी आगामी फिल्म के बारे में बात करते हुए कहा कि उनके इस नए किरदार में कई तरह के डार्क और नेगेटिव शेड्स देखने को मिलेंगे, जिन्हें लोग सिनेमाघरों में पसंद करेंगे। उनका यह किरदार एक रसीला और खतरनाक किस्म का प्रेमी है, जिसकी एक गर्लफ्रेंड भी है। अभिनेता को पूरा भरोसा है कि दर्शक इस भूमिका को केवल मनोरंजन और सिनेमा की हद तक ही सीमित रखेंगे।
सोशल मीडिया पर वायरल मीम्स और GenZ के प्यार पर दी प्रतिक्रिया
आज के दौर में सोशल मीडिया रील्स पर कभी अपने अनूठे अंदाज में डांस तो कभी अपने गानों के वीडियो को लेकर इंटरनेट पर छाए रहने वाले रवि किशन इस क्रेज को इस बेहद प्रतिस्पर्धी और आधुनिक दुनिया में ईश्वर का आशीर्वाद मानते हैं। वह इसके लिए आज की युवा पीढ़ी यानी GenZ का विशेष रूप से धन्यवाद करते हुए कहते हैं कि वे उन्हें दिल से प्रणाम करते हैं। अपनी खुशी बयां करते हुए उन्होंने कहा कि वह इस बात से पूरी तरह निशब्द हैं कि युवाओं ने उन पर इतना प्यार बरसाया है, उन्हें खुद नहीं पता कि फैंस ने उनमें क्या खूबी देखी है। संभव है कि लोगों को उनका यह बेबाक और अल्हड़ अंदाज भा गया हो।
आज की युवा पीढ़ी (GenZ) ऐसे लोगों को पसंद करती है जो बिल्कुल स्पष्टवादी हों, दिल के साफ हों और जिन्होंने समाज में कोई कृत्रिम मुखौटा न पहन रखा हो। युवा जिस प्रकार से उनके वीडियो और रील्स तैयार कर रहे हैं, वे उन्हें ‘क्रिएटिव जीनियस’ मानते हैं।
युवाओं के इस अपार स्नेह से यही संदेश मिलता है कि इंसान जैसा है, उसे खुद को वैसे ही स्वीकार करना चाहिए, इससे लोग आपको अपने आप पसंद करने लगते हैं। रवि किशन कहते हैं कि वह अपने द्वारा बोले गए हर एक शब्द की पूरी जिम्मेदारी लेते हैं। उनका स्वभाव ऐसा ही है, इसलिए उनके घर पर उनकी पत्नी और बच्चों को भी उन्हें इस तरह गाते-बजाते या झूमते हुए देखकर कोई हैरानी नहीं होती। शायद यही बेबाकी युवाओं को सबसे अधिक आकर्षित करती है। यही प्यार उन्हें अपने काम के प्रति पूरी तरह ईमानदार रहने की प्रेरणा देता है। वैसे भी उनका मानना है कि वे देश की सेवा करने के लिए राजनीति के क्षेत्र में हैं और अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए अभिनय (सिनेमा) का काम करते हैं।
अपने पिता से मिली देशभक्ति और देश सेवा की सीख
बचपन के दिनों को याद करते हुए और देश सेवा की समझ कब विकसित हुई, इस पर रवि किशन कहते हैं कि उन्हें यह महान सीख उनके पिता से मिली थी, जो उनके जीवन के सबसे पहले और सबसे बड़े गुरु रहे हैं। बच्चे हमेशा अपने माता-पिता के आचरण को देखकर ही सीखते हैं; ठीक वैसे ही जैसे उनकी खुद की बेटी उन्हें देश सेवा के मार्ग पर चलते देख प्रेरित हुई और आज भारतीय सेना (फौज) में अपनी सेवाएं दे रही है। उनके पिता हमेशा पूजा-पाठ में लीन रहते थे, जिन्हें देखकर उनके मन में भी धार्मिक आस्था जाग्रत हुई।
उनके पिता ने उन्हें यह बहुत बड़ी सीख दी थी कि परम ईमानदारी ही दुनिया की सबसे बड़ी ताकत होती है। यदि आप अपने अंतःकरण के प्रति सच्चे और ईमानदार रहेंगे, तो आप स्वतः ही अपने परिवार और अपने देश के प्रति भी वफादार रहेंगे। उनके पिता एक साधारण से मिट्टी के घर में भारी गरीबी के बीच जीवनयापन करते थे, लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी ईमानदारी के मार्ग को न तो छोड़ा और न ही कभी समझौता किया। रवि किशन का कहना है कि भले ही वह फिल्मों में अभिनय करते हैं, लेकिन वह कभी भी ऐसी किसी फिल्म का हिस्सा नहीं बनते हैं जो देश के हित के खिलाफ हो।
बचपन के दिनों में देशभक्ति के रंग में रंग जाते थे रवि किशन
स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त के राष्ट्रीय पर्व को अपने बचपन के दिनों में मनाने की यादों को ताजा करते हुए अभिनेता ने बताया कि उस दौर में इस दिन स्कूलों और हर जगह अवकाश रहता था। उन्हें आज भी अच्छी तरह याद है कि स्वतंत्रता दिवस के मौके पर चारों तरफ देशभक्ति के तराने और गीत गूंजते थे, जो आज भी उसी उत्साह के साथ बजते हैं। उस समय वे लोग विशेष रूप से तिरंगे के तीन रंगों वाले कपड़े पहनकर तैयार होते थे। इस राष्ट्रीय पर्व की सबसे बड़ी और खास खूबसूरती यही है कि पूरा देश एक सूत्र में बंधकर तिरंगे के रंग में सराबोर नजर आता है। ऐसे पावन अवसरों पर समाज में धर्म, जाति या ऊंच-नीच का कोई भी भेद मायने नहीं रखता है।









