नई दिल्ली। पैकेट बंद खाद्य और पेय पदार्थों पर चेतावनी भरा 'फ्रंट ऑफ पैकेट वार्निंग लेबल' (FOPL) लागू करने में हो रही ढिलाई पर सर्वोच्च अदालत ने भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) को जमकर आड़े हाथों लिया है। अदालत ने FSSAI की कार्यप्रणाली पर गहरा असंतोष जताते हुए सवाल दागा कि क्या नियामक संस्था खाद्य कारोबार से जुड़ी बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों के दबाव में काम कर रही है और आम नागरिकों व मासूम बच्चों के स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर रही है। अदालत ने साफ किया कि व्यापारिक मुनाफा किसी भी सूरत में आम जनमानस की सेहत से बड़ा नहीं हो सकता।
कंपनियों के फायदे से बढ़कर देशवासियों की सेहत
मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने तल्ख रुख अपनाते हुए कहा कि व्यापारिक घरानों के वित्तीय नफे-नुकसान को देश की जनता और बच्चों की तंदुरुस्ती से ऊपर प्राथमिकता नहीं दी जा सकती। अदालत के अनुसार, देश के नागरिकों, विशेष रूप से छोटे बच्चों का स्वास्थ्य और सुरक्षा सर्वोपरि है। खाद्य पदार्थों में मौजूद हानिकारक तत्वों की जानकारी उपभोक्ताओं को स्पष्ट रूप से मिलना उनका मौलिक अधिकार है।
क्या है 'फ्रंट ऑफ पैकेट वार्निंग लेबल' का मामला
यह पूरा विवाद पैकेट बंद खाने-पीने की चीजों के मुख्य हिस्से पर चेतावनी संकेत लगाने से जुड़ा है। इसका सीधा मकसद उपभोक्ताओं को उत्पाद में मौजूद अत्यधिक सैचुरेटेड फैट, चीनी और नमक की मात्रा के प्रति तुरंत आगाह करना है, ताकि लोग जागरूक होकर खाने का चयन कर सकें। FSSAI द्वारा इस नियम को कड़ाई से लागू करने के बजाय ढील देने की कोशिशों पर अदालत ने गहरी नाराजगी जताई है।
FSSAI को दो सप्ताह की मोहलत और सख्त चेतावनी
मामले का संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI को अपनी नीति और निर्णय पर पुनर्विनिचार करने के लिए दो सप्ताह की मोहलत दी है। अदालत ने बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि FSSAI तय समय सीमा के भीतर स्वयं कोई ठोस और सख्त कदम उठाने में नाकाम रहता है, तो न्यायपालिका जनहित में अपनी ओर से कड़े दिशा-निर्देश जारी करने के लिए बाध्य होगी।









