नई दिल्ली। स्लीपर बसों में यात्रियों की सुरक्षा से हो रहे खिलवाड़ का एक बड़ा मामला सामने आया है। अधिक मुनाफे के चक्कर में नियमों को ताक पर रखकर बसों के मूल डिजाइन से छेड़छाड़ की जा रही है, जिससे सड़क पर दौड़ने वाली ये बसें यात्रियों के लिए किसी बड़े खतरे से कम नहीं हैं।
डिजाइन से अवैध छेड़छाड़ और सीटों में बढ़ोतरी
नियमों के मुताबिक लंबी दूरी की स्लीपर बसों का मानक डिजाइन 2×1 (एक तरफ डबल और दूसरी तरफ सिंगल बर्थ) का होता है, जिसमें बीच में आवाजाही के लिए गैलरी होती है। हालांकि, कुछ ऑपरेटरों द्वारा इस डिजाइन से खिलवाड़ कर इसे 2×2 में बदल दिया जाता है। इस तरह अवैध रूप से एक्स्ट्रा बर्थ बनाकर बस की यात्री क्षमता 36 से बढ़ाकर 48 तक कर दी जाती है। अतिरिक्त बर्थ बनाने के चक्कर में बर्थ की लंबाई-चौड़ाई और बीच की गैलरी इतनी संकरी हो जाती है कि आपात स्थिति में यात्रियों का निकलना बेहद मुश्किल हो जाता है।
फिटनेस प्रमाण पत्र के बाद होता है बड़ा खेल
सूत्रों के अनुसार, बस संचालक परिवहन विभाग से फिटनेस प्रमाण पत्र हासिल करने के वक्त तो निर्धारित मानकों (2×1 फॉरमेशन) के अनुरूप ही बसें पेश करते हैं, लेकिन सर्टिफिकेट मिलते ही उनमें अवैध फेरबदल कर लिया जाता है। इसके अलावा, अधिकांश बसों में आग बुझाने वाले यंत्रों (फायर एक्सटिंग्विशर) का भारी अभाव पाया जाता है, या फिर वे तय मानकों से बहुत कम होते हैं।
आपातकालीन निकास और सुरक्षा उपकरणों की अनदेखी
सुरक्षा नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए कई बसों में आपातकालीन खिड़कियां तोड़ने के लिए हथौड़े (हैमर) तक उपलब्ध नहीं होते। सबसे खतरनाक बात यह है कि इमरजेंसी एग्जिट गेट के ठीक सामने भारी मात्रा में सामान या लगेज भर दिया जाता है, जिससे किसी भी दुर्घटना के वक्त मुख्य निकास द्वार पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है।
ट्रांसपोर्ट एक्सपर्ट्स और ऑपरेटर संघ की राय
जाने-माने ट्रांसपोर्ट एक्सपर्ट अनिल छिकारा का कहना है कि फिटनेस जांच के बाद बसों के ढांचे में होने वाले इन बदलावों को रोकने के लिए सड़कों पर दौड़ने वाली स्लीपर बसों की औचक ( सरप्राइज) जांच की जानी बेहद जरूरी है। वहीं, दिल्ली इंटर स्टेट बस ऑपरेटर्स संघ के महासचिव श्याम लाल गोला ने इस बात पर जोर दिया है कि हाल के दिनों में बीएस-6 (BS-6) बसों में शॉर्ट सर्किट और इलेक्ट्रिकल फेलियर से जुड़ी आग लगने की घटनाओं को देखते हुए बस निर्माता कंपनियों, बॉडी बिल्डर्स और एसी लगाने वाली एजेंसियों की भी कड़ी जवाबदेही तय की जानी चाहिए।









