नई दिल्ली: देश के सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से लाए गए 'सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 2026' को महामहिम राष्ट्रपति की ओर से औपचारिक मंजूरी मिल गई है। इस नए संशोधन के लागू होने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की कुल स्वीकृत संख्या 34 से बढ़कर 38 हो गई है। इस महत्वपूर्ण बदलाव से देश की सबसे बड़ी अदालत में कामकाज की रफ्तार तेज होने की उम्मीद है।
कितने न्यायाधीशों की होगी नियुक्ति?
इस नए संशोधन के जरिए अब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को छोड़कर सुप्रीम कोर्ट में कुल 37 अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो गया है। सरकार और न्यायपालिका को पूरी उम्मीद है कि जजों की संख्या में हुई इस बढ़ोतरी से अदालतों में लंबित मुकदमों (बैकलॉग) के बढ़ते बोझ को कम करने में बड़ी मदद मिलेगी। इसके अलावा, कई बार महत्वपूर्ण संवैधानिक पीठों (Constitutional Benches) के गठन के कारण नियमित मामलों की सुनवाई पर जो असर पड़ता था, उससे भी काफी हद तक राहत मिलने की संभावना है।
संसद में कब और कैसे पास हुआ यह विधेयक?
इस संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिल चुकी है:
लोकसभा: लोकसभा ने गत 3 अगस्त को इस संशोधन बिल को अपनी हरी झंडी दी थी।
राज्यसभा: लोकसभा के बाद उच्च सदन यानी राज्यसभा ने भी इस पर अपनी मुहर लगा दी।
राज्यसभा में इस बिल पर चली चर्चा के दौरान केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सदन को जानकारी दी कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने का यह पूरा प्रस्ताव मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की विशेष पहल पर आगे बढ़ाया गया था। कानून मंत्री के अनुसार, सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने बीते 11 मई को प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर देश की सर्वोच्च अदालत में जजों की स्वीकृत संख्या बढ़ाने का औपचारिक अनुरोध किया था।
मुख्य न्यायाधीश ने अपने पत्र में क्या बताई थी वजह?
भारत के मुख्य न्यायाधीश ने प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में इस बात पर विशेष जोर दिया था कि सुप्रीम कोर्ट में लगातार बढ़ रहे मुकदमों के अंबार के चलते अब हर दिन भारी संख्या में मामलों का त्वरित निपटारा करना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
सीजेआई ने स्पष्ट किया था कि जब भी किसी महत्वपूर्ण मामले के लिए बड़ी 'संविधान पीठ' (कॉन्स्टिट्यूशन बेंच) का गठन किया जाता है, तो उससे नियमित मामलों की दैनिक सुनवाई पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है; क्योंकि संविधान पीठ में शामिल होने वाले न्यायाधीशों को अपनी नियमित बेंच की सुनवाई से अलग होना पड़ता है।
अपने पत्र के समर्थन में उन्होंने हाल ही में गठित उस 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ का भी विशेष रूप से उल्लेख किया था, जो सबरीमाला मंदिर प्रवेश से जुड़े एक कानूनी संदर्भ पर सुनवाई कर रही है। इस प्रकार के जटिल और बड़े मामलों के कारण सामान्य और नियमित मुकदमों के निपटारे की रफ्तार धीमी हो जाती है। इसी व्यावहारिक समस्या को ध्यान में रखते हुए शीर्ष अदालत में जजों के पद बढ़ाने का यह प्रस्ताव रखा गया था।
अध्यादेश से शुरू हुई थी प्रक्रिया
मुख्य न्यायाधीश के इस पत्र के मिलने के तुरंत बाद केंद्र सरकार ने सक्रियता दिखाते हुए गत 17 मई को एक विशेष अध्यादेश (Ordinance) जारी किया था, जिसके जरिए सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की पूरी विधिवत प्रक्रिया की शुरुआत हुई थी और अब संशोधन अधिनियम के रूप में इसे पूर्ण मंजूरी मिल चुकी है।









