छात्र आंदोलन पर SC सख्त, नाबालिग प्रदर्शनकारियों को राहत; राज्यों को दिया बड़ा आदेश

0
7

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने नीट (NEET) प्रदर्शनों से जुड़े एक मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए दिल्ली समेत तमाम राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि 18 साल से कम उम्र के उन सभी नाबालिग प्रदर्शनकारियों को तुरंत रिहा किया जाए, जिनका कोई पुराना आपराधिक इतिहास नहीं रहा है। इसके अलावा, अदालत ने पुलिस को हिंसक घटनाओं से जुड़े सभी डिजिटल साक्ष्यों को पूरी तरह सुरक्षित रखने की हिदायत दी है।

अदालत ने यह स्पष्ट किया कि छात्रों के आंदोलन के दौरान पुलिस की कथित बर्बरता की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होनी जरूरी है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन चलाए जाने को लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेर रहा है।

कानून का उल्लंघन करने वालों पर गिरेगी गाज

सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि जिन भी लोगों ने अपनी सीमाओं को लांघा है और कानून को हाथ में लिया है, उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाने चाहिए। अदालत का कहना था कि जब तय नियमों और प्रोटोकॉल का उल्लंघन होता है, तो कानून को बिना किसी पक्षपात के अपना काम करना चाहिए।

अदालत के अनुसार, यह पूरा मामला किसी स्वतंत्र आयोग द्वारा जांच कराए जाने के योग्य दिखता है। इस तरह की जांच से न केवल सच सामने आएगा, बल्कि भविष्य में होने वाले ऐसे आंदोलनों को संभालने के लिए एक बेहतर प्रोटोकॉल तैयार करने में भी मदद मिलेगी।

राज्यों में पुलिस कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल

अदालत में विभिन्न राज्यों से आई पुलिस कार्रवाई की शिकायतों पर भी चर्चा हुई। इनमें बिहार का एक मामला भी शामिल है जहाँ कथित तौर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर एक पुलिसकर्मी द्वारा AK-47 तानने का आरोप लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने उन सभी राज्यों से आगामी सोमवार तक जवाब दाखिल करने को कहा है जहाँ प्रदर्शनों के दौरान हिंसा देखने को मिली थी।

डिजिटल साक्ष्यों पर आदेश देते हुए अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन से ली गई तस्वीरों और फेशियल रिकग्निशन सिस्टम के डेटा को महफूज रखा जाए। कोर्ट ने यह सख्त निर्देश भी दिया कि प्रदर्शनकारियों की व्यक्तिगत जानकारी और इन डेटा को सार्वजनिक न किया जाए।

जुनैद मलिक की याचिका और कोर्ट का रुख

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने प्रदर्शन में शामिल स्वयंसेवक जुनैद मलिक की याचिका का हवाला दिया, जिसमें आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने मलिक और उनके परिजनों के साथ मारपीट की।

इस पर संज्ञान लेते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि अदालत के सामने आए दस्तावेज गंभीर आरोपों की तरफ इशारा करते हैं, जिनकी गहराई से जांच जरूरी है। उन्होंने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से पहली नजर में यही लगता है कि यह हिंसा से जुड़ा मामला है और इसी वजह से न्यायपालिका इसे इतने गंभीर रूप से सुन रही है।

पुलिस पर हमले और 'उपद्रवियों' की भूमिका

केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने माना कि यदि पुलिस की तरफ से कोई ज्यादती हुई है, तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। हालाँकि, उन्होंने यह भी उजागर किया कि प्रदर्शनों के दौरान 250 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। उन्होंने कहा कि अदालत को मामले के दोनों पहलुओं को देखकर 'परम सत्य' तक पहुँचना होगा।

मुख्य न्यायाधीश ने सहमति जताते हुए कहा कि पुलिसकर्मियों पर हुए हमलों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। इस पर तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि पुलिस का यह मानना नहीं है कि छात्रों ने हमला किया था, बल्कि हिंसा फैलाकर पूरे आंदोलन को भटकाने का काम बाहर से आए उपद्रवियों या 'बिन बुलाए मेहमानों' ने किया था। इस बात का समर्थन करते हुए जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी कहा कि शांतिपूर्ण आंदोलनों को बदनाम करने वाले तत्व अक्सर भीड़ में शामिल हो जाते हैं।