कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सत्ता से तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बाहर हुए तीन महीने का वक्त बीत चुका है और पंद्रह साल तक लगातार सत्ता में रहने के बाद पार्टी एक बार फिर मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में आ गई है। लेकिन मौजूदा समय में इस पार्टी के सामने संकट सिर्फ चुनावी हार का नहीं, बल्कि उसके सियासी वजूद और आंतरिक अस्तित्व को बचाने का है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल सबसे बड़ा बन गया है कि क्या पश्चिम बंगाल की राजनीति की धुरी रहीं ममता बनर्जी इस बिखरी हुई पार्टी को एक बार फिर से एकजुट कर पाएँगी, या फिर यह ऐतिहासिक पराजय इस प्रमुख दल को हमेशा के लिए कई अलग-अलग गुटों में बांट देगी?
पार्टी के भीतर उभर आए तीन अलग-अलग सत्ता केंद्र
फिलहाल तृणमूल कांग्रेस के भीतर मुख्य रूप से तीन अलग-अलग पावर सेंटर (धड़े) खड़े हो चुके हैं:
पहला खेमा: पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी का मूल समर्थक वर्ग।
दूसरा खेमा: ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में उभरा असंतुष्ट और बागी गुट, जिसने पार्टी पर समानांतर दावा ठोका है।
तीसरा खेमा: लोकसभा के वे बागी सांसद, जिन्होंने पार्टी से अलग होकर एक नया राजनीतिक रुख अख्तियार कर लिया है और वर्तमान में एनडीए के समर्थन की बात कह रहे हैं।
इस घमासान के कारण संगठन की असली कमान और चुनाव चिह्न पर अधिकार को लेकर मामला चुनाव आयोग तक जा पहुँचा है। सांसदों के एक बड़े हिस्से के अलग हो जाने से संसद में टीएमसी की ताकत काफी सिमट चुकी है।
सत्ता गंवाने के बाद ममता बनर्जी के सामने खड़ी मुश्किलें
पंद्रह वर्षों तक प्रशासनिक सत्ता और संगठन एक ही राजनीतिक रथ के दो पहिया बनकर चले थे। मंत्री, विधायक, पंचायत से लेकर जिला स्तर तक के नेता सत्ता के संरक्षण में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करते आए थे। लेकिन अब सरकार जाने के बाद वह ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है।
लड़ाई अब केवल कुछ नेताओं के पाला बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी की संपत्ति, राजनीतिक विरासत और नियंत्रण पर आ गई है। ऋतब्रत गुट ने वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को अपना अध्यक्ष चुनकर एक अलग समानांतर व्यवस्था का ऐलान कर दिया है, जिसे ममता खेमे ने पूरी तरह असंवैधानिक करार दिया है। दूसरी ओर, ममता के करीबी नेता कुणाल घोष ने बागी गुट की इस कार्रवाई को महज एक 'तमाशा' बताते हुए दावा किया है कि अधिकांश जमीनी विधायक अभी भी ममता बनर्जी के साथ खड़े हैं।
बागी गुट और सांसदों के बगावती तेवर
दूसरी तरफ, बागी खेमे का तर्क है कि मूल टीएमसी अब अपनी पुरानी लोकतांत्रिक पहचान और विचारधारा से भटक चुकी है। ऋतब्रत और उनके समर्थकों का आरोप है कि पार्टी के भीतर एकछत्र और केंद्रीयकृत नेतृत्व के बढ़ते प्रभाव के कारण जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी हो रही थी। मदन मित्रा और फिरहाद हकीम जैसे कई दिग्गज नेताओं के नाम भी इस आंतरिक हलचल से जुड़े बताए जा रहे हैं।
इसके अलावा, अलग हुए सांसदों का नेतृत्व कर रहे वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि वे राज्य के विकास कार्यों और प्रगति के लिए केंद्रीय व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाकर चलना चाहते हैं। इस राजनीतिक उठापटक का सीधा और सबसे बड़ा फायदा विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (BJP) उठाती नजर आ रही है, जो राज्य में अपनी पकड़ और मजबूत करने के प्रयासों में जुटी है।









