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IPS बद्रीनारायण मीणा को बस्तर रेंज की कमान, IG पद पर हुई नियुक्ति

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बस्‍तर। छत्तीसगढ़ शासन ने बस्तर संभाग की सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ करने के उद्देश्य से एक बड़ा फेरबदल किया है। राज्य सरकार द्वारा जारी आधिकारिक आदेश के तहत, साल 2004 बैच के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी बद्रीनारायण मीणा को बस्तर रेंज के नए पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) की कमान सौंपी गई है। आईपीएस बद्रीनारायण मीणा का छत्तीसगढ़ में काम करने का लंबा और व्यापक प्रशासनिक अनुभव रहा है; इससे पहले वे दुर्ग रेंज के आईजी तथा एसएसपी जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। इसके अतिरिक्त, वे बिलासपुर जिले में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (एडिशनल एसपी) के पद पर भी अपनी सराहनीय सेवाएं दे चुके हैं। गृह विभाग के आदेश के मुताबिक, बस्तर की कमान मिलने से पहले वे पुलिस मुख्यालय (पीएचक्यू), नवा रायपुर में आईजी के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे थे।

सुंदरराज पी की जगह संभालेंगे बस्तर की कमान

आईपीएस बद्रीनारायण मीणा की इस संवेदनशील क्षेत्र में नियुक्ति को बस्तर संभाग की आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था को नया आयाम देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। उनसे ठीक पहले, वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी सुंदरराज पी पिछले लगभग पांच वर्षों से बस्तर के आईजी के रूप में लगातार मोर्चे पर तैनात थे। राज्य सरकार ने अब सुंदरराज पी को प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) पर भेजते हुए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) में आईजी के पद पर नियुक्त किया है, जिसके बाद रिक्त हुए इस बेहद महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी बद्रीनारायण मीणा को सौंपी गई है।

राजस्थान के जयपुर से है गहरा नाता

आईपीएस अधिकारी बद्रीनारायण मीणा मूल रूप से राजस्थान के जयपुर जिले के निवासी हैं और छत्तीसगढ़ कैडर के 2004 बैच के अफसर हैं। उनके पिता जनगणना विभाग में अपनी सेवाएं देते थे। बद्रीनारायण मीणा की प्रारंभिक से लेकर उच्च शिक्षा जयपुर में ही संपन्न हुई है, जहां उन्होंने सनफ्लावर पब्लिक स्कूल से मैट्रिक (दसवीं) और राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पोद्दार से इंटरमीडिएट (बारहवीं) की पढ़ाई पूरी की। इसके पश्चात, उन्होंने प्रतिष्ठित राजस्थान कॉलेज, जयपुर से साल 2000 में कला स्नातक (बीए) की उपाधि प्राप्त की।

पहले ही प्रयास में पाई सिविल सेवा में सफलता

बद्रीनारायण मीणा बचपन से ही प्रशासनिक सेवा में जाने का सपना देखते थे, जिसे पूरा करने के लिए उन्होंने साल 2001 में पहली बार संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा परीक्षा दी और अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के दम पर साल 2004 में वे आईपीएस के लिए चुन लिए गए। एक बेहद दिलचस्प बात यह भी है कि उनके भाई श्रवण मीणा भी इसी 2004 बैच में उनके साथ आईपीएस अधिकारी बने थे, हालांकि बाद में श्रवण मीणा ने दोबारा यूपीएससी की परीक्षा उत्तीर्ण की और भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) को चुनकर उसमें शामिल हो गए।

Emergency पर संजय राउत का बड़ा बयान, इंदिरा गांधी के फैसले का किया बचाव

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मुंबई: आपातकाल की बरसी पर शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर तीखा हमला बोला है। संजय राउत ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने आपातकाल के दौरान कभी किसी राजनीतिक दल को नहीं तोड़ा था। राउत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब हाल ही में शिवसेना (यूबीटी) के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसदों ने पाला बदलकर शिंदे गुट का दामन थाम लिया है। मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए राउत ने दावा किया कि देश पिछले 12 सालों से अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति का सामना कर रहा है।

संविधान में है आपातकाल का प्रावधान: संजय राउत

संजय राउत ने 1975 में देश में लागू किए गए आपातकाल के फैसले का खुलकर बचाव किया। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान में आपातकाल लगाने का बकायदा स्पष्ट प्रावधान मौजूद है। राउत ने कहा, "इंदिरा गांधी ने न तो कोई राजनीतिक पार्टी तोड़ी थी और न ही देश के संविधान को खत्म किया था। अगर देश के भीतर अराजकता फैलती है, तो संविधान सरकार को आपातकाल लगाने का अधिकार देता है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि संविधान का सम्मान नहीं किया गया।" उन्होंने सवाल उठाते हुए आगे कहा कि अगर नोटबंदी लागू की जा सकती है और कोविड-19 महामारी के दौरान कड़े प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, तो उस समय के फैसले पर सवाल क्यों? उन्होंने याद दिलाया कि शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने भी उस समय आपातकाल का समर्थन किया था।

एनसीईआरटी की नई किताब में आपातकाल का पाठ

इसी बीच, नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) ने कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान की नई किताब में 1975 के आपातकाल को शामिल किया है। 'अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड' नाम की इस नई पाठ्यपुस्तक में आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के सामने आई सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक के रूप में पढ़ाया जाएगा। किताब के इस अध्याय में बताया गया है कि आपातकाल के उस दौर में देश के नागरिकों के ज्यादातर मौलिक अधिकारों को सस्पेंड (निलंबित) कर दिया गया था।

सचिन पायलट ने सरकार पर साधा निशाना

दूसरी तरफ, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सचिन पायलट ने भी इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरा है। उन्होंने एनसीईआरटी के इस कदम की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि भाजपा जब भी केंद्र या किसी राज्य की सत्ता में आती है, तो वह इतिहास को अपने नजरिए और सहूलियत से पेश करने की कोशिश करती है। पायलट ने कहा कि आजाद भारत के इतिहास में लोकतंत्र के सामने आज जैसी चुनौती पहले कभी नहीं देखी गई। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार मीडिया, सोशल मीडिया, न्यायपालिका, नौकरशाही और चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्थाओं का दुरुपयोग करके विपक्ष और जनता की आवाजों को दबाने का काम कर रही है, जो कि अभूतपूर्व है।

WHO तक पहुंचा नकली दवा का मामला, भारत सरकार से मांगी गई रिपोर्ट

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कोटा। शिक्षा नगरी कोटा के जेके लोन अस्पताल और सुपर स्पेशियलिटी विंग में सिजेरियन ऑपरेशन (प्रसव) के बाद महिलाओं की मौत के बेहद गंभीर मामले में प्रशासन ने एक और बड़ी दंडात्मक कार्रवाई की है। औषधि नियंत्रण विभाग ने सरकारी अस्पतालों में नकली ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन की खेप सप्लाई करने वाली कोटा की स्थानीय फर्म का लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है। इससे पहले इस जानलेवा नेटवर्क से जुड़ी अमृतसर की मुख्य दवा निर्माता कंपनी का लाइसेंस भी रद्द किया जा चुका है।

दवाइयों की खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड में बड़ा फर्जीवाड़ा; जांच में गायब मिला जरूरी साल्ट

सहायक औषधि नियंत्रक देवेंद्र गर्ग द्वारा जारी किए गए आदेश के मुताबिक, अस्पतालों को भेजे गए 'टोसिन' (ऑक्सीटोसिन) इंजेक्शन प्रयोगशाला जांच में पूरी तरह सब-स्टैंडर्ड और नकली पाए गए हैं। लैब टेस्टिंग की रिपोर्ट में इन इंजेक्शनों के भीतर मुख्य जीवनरक्षक साल्ट (ऑक्सीटोसिन) की मात्रा शून्य प्रतिशत मिली है। इसके अलावा, जांच में एक और बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। फर्म ने अमृतसर की मैसर्स जैक्सन लेबोरेट्री से महज 9,300 डोज खरीदे थे, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में 10,050 डोज की बिक्री दिखा दी। ड्रग विभाग अब इस बात की तफ्तीश कर रहा है कि बिना बिल के ये अतिरिक्त 750 नकली इंजेक्शन कहां से और किसके माध्यम से मंगाए गए थे।

निरीक्षण के दौरान मिलीं कई गंभीर अनियमितताएं, कारण बताओ नोटिस का नहीं मिला सही जवाब

बीती 19 मई को इंद्रप्रस्थ इंडस्ट्रियल एरिया स्थित इस फर्म पर ड्रग विभाग की टीम ने अचानक छापा मारा था। निरीक्षण के दौरान फर्म से जुड़े फार्मासिस्ट शादाब खान मौके से नदारद थे, जबकि नियमों के विरुद्ध फर्म संचालक महेश मित्तल स्वयं गैर-कानूनी ढंग से दवाओं की बिक्री कर रहे थे। इन गंभीर लापरवाहियों और अनियमितताओं को देखते हुए विभाग ने 21 मई को 'कारण बताओ नोटिस' जारी कर जवाब मांगा था। फर्म संचालक की ओर से कोई भी संतोषजनक स्पष्टीकरण न मिलने पर विभाग ने सख्त कदम उठाते हुए फर्म को हमेशा के लिए प्रतिबंधित कर दिया है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गूंजा कोटा का मामला, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वतः संज्ञान लेकर मांगी डिटेल

कोटा के सरकारी अस्पताल में हुई प्रसूताओं की मौत का यह खौफनाक मामला अब अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर इस घटना पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया है। डब्ल्यूएचओ ने भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय को पत्र लिखकर पूरे घटनाक्रम की विस्तृत और तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब की है। वैश्विक संस्था ने विशेष रूप से यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या इस बैच के नकली इंजेक्शन भारत के अलावा किसी अन्य देश में भी एक्सपोर्ट (सप्लाई) किए गए हैं? यदि ऐसा है, तो उन देशों के नाम सार्वजनिक किए जाएं ताकि वहां भी समय रहते अलर्ट जारी कर इस जानलेवा नेटवर्क पर रोक लगाई जा सके। फिलहाल, ड्रग विभाग के साथ अन्य सुरक्षा एजेंसियां भी इस अंतरराज्यीय नकली दवा रैकेट के नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त करने में जुटी हैं।

पासपोर्ट को लेकर कन्फ्यूजन क्यों? जानिए हाईकोर्ट के फैसले की पूरी कहानी

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नई दिल्ली। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के एक हालिया बयान ने देश में एक नई बहस छेड़ दी है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट मुख्य रूप से सिर्फ एक यात्रा दस्तावेज (ट्रैवल डॉक्यूमेंट) है, इसे नागरिकता का पक्का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इस स्पष्टीकरण के बाद अब आम जनता के बीच यह सवाल बड़ा हो गया है कि आखिर किन सरकारी दस्तावेजों को भारतीय नागरिकता के वैध प्रूफ के रूप में स्वीकार किया जाता है।

पासपोर्ट पर क्यों उठा सवाल?

आमतौर पर माना जाता है कि विदेशी दौरों के लिए जारी होने वाला पासपोर्ट किसी भी व्यक्ति की राष्ट्रीयता को दर्शाता है। लेकिन विदेश मंत्रालय के इस तकनीकी पक्ष को सामने रखने के बाद कानूनी और प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। जानकारों का कहना है कि पासपोर्ट एक निश्चित अवधि के लिए जारी होता है और यह मुख्य रूप से विदेश यात्रा की अनुमति देने वाला दस्तावेज है, न कि नागरिकता का अंतिम दस्तावेज।

कौन से दस्तावेज माने जाते हैं नागरिकता का प्रमाण?

इस बयान के बाद कानूनी विशेषज्ञों और सरकारी गाइडलाइंस के अनुसार, कुछ चुनिंदा दस्तावेजों को ही नागरिकता के ठोस प्रमाण के तौर पर देखा जाता है:

  • जन्म प्रमाण पत्र (Birth Certificate): भारत में जन्में नागरिकों के लिए उनका आधिकारिक जन्म प्रमाण पत्र सबसे बुनियादी और मजबूत दस्तावेज माना जाता है।

  • वंशानुगत दस्तावेज: यदि किसी का जन्म देश से बाहर हुआ है, तो उनके माता-पिता के भारतीय होने के प्रमाण और पंजीकरण से जुड़े दस्तावेज।

  • नागरिकता प्रमाण पत्र (Citizenship Certificate): गृह मंत्रालय द्वारा विशेष रूप से जारी किया गया नागरिकता प्रमाण पत्र।

पहचान पत्र और नागरिकता में अंतर

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में मिलने वाले कई सरकारी दस्तावेज जैसे वोटर आईडी कार्ड, पैन कार्ड या अन्य सरकारी पहचान पत्र केवल देश में रहने, टैक्स भरने या मतदान करने का अधिकार और पहचान सुनिश्चित करते हैं। ये सभी 'पहचान और पते के प्रमाण' (Proof of Identity & Address) तो हैं, लेकिन तकनीकी और कानूनी रूप से इन्हें 'भारतीय नागरिकता का अकाट्य प्रमाण' नहीं कहा जा सकता। विदेश मंत्रालय के इस बयान के बाद अब नागरिकता के नियमों और इसके कानूनी दस्तावेजों को लेकर स्पष्टता की मांग और बढ़ गई है।

स्कूल में आग बुझाने पहुंची दमकल टीम के सामने आया चौंकाने वाला दृश्य, युवक का शव मिला

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पाली। शहर के कोतवाली थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले टैगोर नगर स्थित एक निजी स्कूल में गुरुवार सुबह उस वक्त हड़कंप मच गया, जब स्कूल परिसर में भीषण आग लग गई। सुबह के समय इमारत से अचानक काला धुआं और लपटें उठती देख स्थानीय निवासियों ने तुरंत इसकी सूचना दमकल विभाग और डिस्कॉम (बिजली विभाग) को दी। सूचना मिलते ही दमकल की गाड़ियां मौके पर पहुंचीं और सुरक्षा के लिहाज से पूरे इलाके की बिजली आपूर्ति बंद कराई गई। फायर ब्रिगेड के कर्मचारियों ने जब अंदर प्रवेश किया, तो स्कूल के रिकॉर्ड रूम में आग धधक रही थी। कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू तो पा लिया गया, लेकिन तब तक कमरे में रखा तमाम जरूरी सामान और सीसीटीवी (CCTV) कैमरे का डीवीआर (DVR) जलकर पूरी तरह स्वाहा हो चुका था।

आग बुझाते समय खुला मौत का खौफनाक राज, रेलिंग से बंधा था फंदा

इस घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला और खौफनाक मोड़ तब आया, जब आग बुझाने के बाद दमकलकर्मी स्कूल के मुख्य हॉल का मुआयना करने पहुंचे। हॉल के भीतर का नजारा देखकर सबके होश उड़ गए; वहाँ लोहे की रेलिंग के सहारे एक युवक का शव फंदे से लटका हुआ था। स्कूल के भीतर लाश मिलने की खबर मिलते ही कोतवाली थाने के एएसआई जगदीश कुमार पुलिस बल के साथ तुरंत मौके पर पहुंचे। पुलिस ने शव को फंदे से नीचे उतारा और उसकी शिनाख्त की कोशिशें शुरू कीं।

मृतक की हुई पहचान, हादसे और खुदकुशी के बीच उलझी पुलिस; गहन जांच जारी

पुलिस की शुरुआती तफ्तीश में मृतक की पहचान 30 वर्षीय राघवेंद्र शर्मा के रूप में हुई है, जो टैगोर नगर स्थित सरस्वती स्कूल के पास का ही रहने वाला था और उसके पिता का नाम एस.एन. शर्मा है। पुलिस ने विधिक औपचारिकताएं पूरी करते हुए शव को अपने कब्जे में ले लिया है और पोस्टमार्टम के लिए बांगड़ अस्पताल की मोर्चरी में सुरक्षित रखवा दिया है।

इस पूरी घटना ने पुलिस के सामने कई गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। स्कूल के रिकॉर्ड रूम में आग का लगना, सबूत मिटाने के उद्देश्य से सीसीटीवी के डीवीआर का जलना और उसी वक्त एक युवक का शव फंदे पर मिलना—किसी बड़ी आपराधिक साजिश या खुदकुशी की ओर इशारा कर रहा है। कोतवाली थाना पुलिस का कहना है कि मौत और आग लगने के वास्तविक कारणों का खुलासा अभी नहीं हो पाया है, लेकिन फॉरेंसिक साक्ष्यों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर सभी एंगल से मामले की गहनता से जांच की जा रही है।

हथियार लहराते रील बनाना पड़ा भारी, वायरल वीडियो के बाद युवती की तलाश में जुटी पुलिस

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रीवा। मध्य प्रदेश के रीवा जिले में सोशल मीडिया पर हथियारों के खुलेआम प्रदर्शन का एक और नया मामला सामने आने के बाद पुलिस महकमे में खलबली मच गई है। जिले में हाल ही में हुई गोलीबारी की कुछ वारदातों के बीच अब एक युवती द्वारा कथित रूप से अवैध पिस्टल (तमंचे) के साथ रील बनाकर उसे इंटरनेट पर अपलोड करने का मामला तेजी से तूल पकड़ रहा है। इस दुस्साहसिक वीडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होते ही रीवा पुलिस पूरी तरह मुस्तैद हो गई है और मामले की सघन जांच शुरू कर दी गई है।

प्राप्त विवरण के अनुसार, इंस्टाग्राम पर "manu_rewa" नाम के एक यूजर अकाउंट से एक युवती ने हाथ में पिस्टल थामे हुए दो अलग-अलग वीडियो रील साझा की हैं। इन रीलों में युवती फिल्मी अंदाज में हथियार चमकाती और लहराती हुई दिखाई दे रही है। इंटरनेट पर तेजी से फैल रहे इन वीडियो को अब तक हजारों की संख्या में लोग देख चुके हैं, जिसके बाद कानून व्यवस्था को लेकर स्थानीय स्तर पर तीखी बहस छिड़ गई है।

कानून व्यवस्था को सरेआम चुनौती और नागरिकों में चिंता

क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों और स्थानीय लोगों का मानना है कि रीवा में पिछले कुछ दिनों से हथियारों के अवैध प्रदर्शन और सरेराह फायरिंग की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। ऐसे संवेदनशील माहौल में एक युवती द्वारा सरेआम घातक हथियार के साथ वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया पर डालना सीधे तौर पर पुलिस और कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाने जैसा है। इस वीडियो को लेकर इंटरनेट यूजर्स ने गहरी चिंता व्यक्त की है और पुलिस के आला अधिकारियों से इस पर तुरंत और कठोर दंडात्मक कदम उठाने की अपील की है।

समान थाना क्षेत्र का पुराना आर्म्स एक्ट का मामला

गौरतलब है कि यह रीवा में इस तरह का कोई पहला मामला नहीं है; इससे पहले भी समान थाना इलाके में एक युवक द्वारा वीडियो कॉल के दौरान अवैध हथियार का प्रदर्शन करने का सनसनीखेज मामला सामने आया था। उस वक्त पुलिस ने फौरी कार्रवाई करते हुए आरोपी को दबोचकर हथियार जब्त किया था और उसके खिलाफ आर्म्स एक्ट (आयुध अधिनियम) के तहत मुकदमा दर्ज कर जेल भेजा था। हालांकि, उस कड़ी कार्रवाई के बाद भी युवाओं में हथियारों के साथ सोशल मीडिया पर लोकप्रियता बटोरने का यह खतरनाक चलन थमता नजर नहीं आ रहा है।

पुलिस अधीक्षक के निर्देश और युवती की तलाश जारी

इस गंभीर मामले का संज्ञान लेते हुए जिला पुलिस मुख्यालय ने वीडियो की प्रामाणिकता और उसमें दिख रहे हथियार की बारीकी से जांच करने के आदेश जारी किए हैं। साइबर सेल और स्थानीय पुलिस की टीमें संयुक्त रूप से यह पता लगाने में जुटी हैं कि वीडियो में दिख रही पिस्टल असली है या केवल खिलौना, और यदि वह असली है तो उसका लाइसेंस किसके नाम पर दर्ज है। पुलिस अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि युवती की शिनाख्त के प्रयास किए जा रहे हैं, और जांच में यदि हथियार गैर-कानूनी पाया गया, तो आरोपी युवती के विरुद्ध आर्म्स एक्ट की संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज कर सख्त कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।

IPS Promotion DPC Today: नौ पदों के लिए दौड़ तेज, अधिकारियों की नजर अहम बैठक पर

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भोपाल। राज्य पुलिस सेवा (SPS) के वरिष्ठ अधिकारियों को प्रमोट कर भारतीय पुलिस सेवा (IPS) का कैडर सौंपने की प्रशासनिक कवायद काफी तेज हो गई है। प्रदेश के पुलिस महकमे में लंबे समय से इंतजार की जा रही विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की एक महत्वपूर्ण बैठक गुरुवार को आयोजित होने जा रही है। इस उच्च स्तरीय बैठक में प्रांतीय अधिकारियों की वरिष्ठता, उनके सेवा रिकॉर्ड की शुद्धता और निर्धारित पात्रता के कड़े मानकों के आधार पर नामों का बारीकी से मूल्यांकन किया जाएगा। इस अहम प्रक्रिया के जरिए इस बार राज्य के नौ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को आईपीएस कैडर का गौरव हासिल होने का सुनहरा अवसर मिल सकता है। प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, इस वर्ष की चयन सूची में मुख्य रूप से वर्ष 1997, 1998 और 2000 बैच के अधिकारियों के नामों और उनकी सेवा फाइलों पर प्रमुखता से विचार किया जा रहा है, जिसे शासन स्तर पर समय से मंजूरी मिलने के कारण प्रक्रिया को गति मिली है।

पिछले वर्ष के रिक्त पद को भी मिला समावेशन और विचारणीय नाम

इस बार की पदोन्नति प्रक्रिया की एक खास बात यह है कि इसमें पिछले वर्ष का एक बैकलॉग पद भी शामिल किया जा रहा है। दरअसल, बीते साल किसी अंतिम और ठोस निर्णय के अभाव में आईपीएस अवॉर्ड का एक पद खाली रह गया था, जिसे अब चालू वर्ष के कोटे में समाहित कर लिया गया है। इस वजह से पदोन्नति पाने वाले पात्र दावेदारों की संख्या में इजाफा तय माना जा रहा है। इस पूरी चयन प्रक्रिया के दौरान सीताराम सतस्या, अंजना तिवारी, सत्येंद्र सिंह तोमर, समर वर्मा, अमृत मीणा, निमिषा पांडे, राजेश कुमार मिश्रा, मलय जैन, अमित सक्सेना, मनीषा पाठक सोनी, सुमन गुर्जर, संदीप मिश्रा और सव्यसांची सर्राफ जैसे वरिष्ठ नामों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। हालांकि, इनमें से कुछ अधिकारियों के पूर्व के विभागीय मामलों, सेवा अभिलेखों की त्रुटियों या अन्य बारीक तकनीकी वजहों से आपत्तियां भी सामने आ सकती हैं, और यदि ऐसा होता है, तो वरिष्ठता सूची में उनके ठीक नीचे मौजूद अन्य पात्र अफसरों की किस्मत चमक सकती है।

समय से काफी पहले शुरू हुई मूल्यांकन की यह पूरी प्रक्रिया

डीपीसी की इस बैठक में सभी संबंधित अधिकारियों के वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (ACR), उनके पूरे करियर के सर्विस रिकॉर्ड, अनुशासनात्मक कार्रवाई की वर्तमान स्थिति तथा केंद्र सरकार द्वारा तय किए गए विशिष्ट पैमानों को आधार बनाकर गहनता से जांच की जाएगी। यहां से अंतिम रूप से चुने गए अधिकारियों के नामों के प्रस्ताव को पहले केंद्र सरकार और फिर संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के पास अंतिम मुहर के लिए भेजा जाएगा, जहां से हरी झंडी मिलने के बाद गृह विभाग द्वारा आधिकारिक तौर पर नियुक्ति की अधिसूचना जारी की जाएगी। पुलिस महकमे के जानकारों का कहना है कि सामान्य तौर पर आईपीएस अवॉर्ड से जुड़ी यह जटिल प्रक्रिया साल के आखिरी महीनों में जाकर रफ्तार पकड़ती थी, लेकिन इस बार राज्य सरकार और पुलिस मुख्यालय की सक्रियता के कारण सारे जरूरी प्रस्ताव काफी पहले भेज दिए गए, जिससे जून महीने में ही डीपीसी की तिथि तय हो गई और प्रमोशन की राह देख रहे अधिकारियों को समय से पहले बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जगी है।

ईंधन बचत और पर्यावरण संरक्षण के लिए हाईकोर्ट का बड़ा कदम, जारी हुई नई गाइडलाइन

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जबलपुर। देश में ईंधन संसाधनों के कुशल और बेहतर प्रबंधन के साथ-साथ अदालती कामकाज को बिना किसी बाधा के सुचारू रूप से चलाने के लिए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने व्यापक दिशानिर्देश जारी किए हैं। केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग द्वारा पूर्व में जारी कार्यालय ज्ञापन को आधार बनाकर तैयार की गई इस नई एडवाइजरी को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की मंजूरी के बाद तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है।

यह नए नियम मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की मुख्य पीठ जबलपुर, इंदौर व ग्वालियर की खंडपीठों सहित राज्य की तमाम जिला अदालतों, सभी न्यायिक अधिकारियों, कर्मचारियों और वकीलों पर समान रूप से लागू होंगे। इस नई नियमावली के जरिए अदालतों में उपलब्ध शासकीय वाहनों के इस्तेमाल को पूरी तरह से नियंत्रित, सीमित और सुव्यवस्थित किया जाना तय किया गया है।

पूल वाहनों का संचालन और व्यक्तिगत सुविधा पर नियंत्रण

नए आदेश के अनुसार, न्यायालय के पूल वाहनों का उपयोग अब केवल बेहद जरूरी न्यायिक और प्रशासनिक दायित्वों को पूरा करने के लिए ही किया जा सकेगा। इसके लिए अधिकारियों और कर्मचारियों के रहने वाले क्षेत्रों व निवास स्थान को ध्यान में रखकर रूट-वाइज और लोकैलिटी-वाइज एक विशेष वाहन योजना तैयार की जाएगी, ताकि गाड़ियों की अधिकतम बैठने की क्षमता का पूरा लाभ उठाया जा सके। किसी भी स्तर के अधिकारी या कर्मचारी को व्यक्तिगत तौर पर गाड़ी की सुविधा केवल आपातकालीन परिस्थितियों, सुरक्षा कारणों, विशिष्ट प्रोटोकॉल या फिर गंभीर चिकित्सीय जरूरत होने पर ही प्रदान की जाएगी।

कार-पूलिंग को बढ़ावा और साझा परिवहन की व्यवस्था

उच्च न्यायालय ने पर्यावरण और ईंधन संरक्षण को ध्यान में रखते हुए वकीलों और न्यायालयीन स्टाफ को कार-पूलिंग अपनाने की विशेष सलाह दी है। कोर्ट प्रशासन ने सभी से सार्वजनिक परिवहन, कार-पूलिंग और टू-व्हीलर शेयरिंग को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करने का आग्रह किया है। इसके साथ ही, ज्यादा आवाजाही वाले और व्यस्त रूटों पर जरूरत के हिसाब से स्टाफ के लिए मिनी बस, ट्रैवलर या अन्य बड़े कमर्शियल साझा वाहनों का इंतजाम करने की रूपरेखा भी तैयार की जा सकती है ताकि सड़कों पर गाड़ियों का दबाव कम किया जा सके।

वर्चुअल सुनवाई की अपील और ईंधन खपत की दैनिक निगरानी

नई गाइडलाइन में वकीलों से विशेष तौर पर यह अनुरोध किया गया है कि जहां तक संभव हो, वे अदालती मामलों की पैरवी और सुनवाई के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (वीसी) के माध्यम से ही शामिल हों। इसके अतिरिक्त, सभी प्रशासनिक बैठकें, विभागीय चर्चाएं और बार व बेंच के बीच के संवाद भी डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए ही आयोजित किए जाएंगे, ताकि बेवजह की यात्राओं को रोककर ईंधन की हर संभव बचत की जा सके। हाईकोर्ट ने संबंधित प्रभागों को प्रतिदिन गाड़ियों के उपयोग और डीजल-पेट्रोल की खपत की कड़ी निगरानी करने तथा समय-समय पर इसकी समीक्षा करने के निर्देश भी दिए हैं। हालांकि, रजिस्ट्री ने साफ किया है कि ईंधन बचाने की यह मुहिम फिलहाल अस्थायी तौर पर लागू की गई है, ताकि राष्ट्रीय स्तर के इस अभियान में न्यायपालिका भी अपना अहम योगदान दे सके।

कावेरी नदी में मातम: सेल्फी के दौरान चार महिलाएं और चालक डूबे

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मांड्या: कर्नाटक के मांड्या जिले में स्थित प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मुत्तथी में एक बेहद दर्दनाक हादसा सामने आया है। यहाँ कावेरी नदी के किनारे सेल्फी लेने के चक्कर में एक ही परिवार की चार महिलाओं और उनके कार ड्राइवर समेत कुल पांच लोगों की नदी में डूबने से मौत हो गई है। पुलिस ने गुरुवार को इस घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि जान गंवाने वालों में विजयम्मा, उनकी बेटी प्रियंका, श्वेता, चैत्रा और कार चालक महेश शामिल हैं। ये सभी लोग बेंगलुरु के पास चन्नापटना तालुका के जगदापुरा गाँव के रहने वाले थे। इस घटना के बाद से पूरे गाँव और पीड़ित परिवार में मातम पसरा हुआ है।

पूजा के बाद घूमने गए थे पीड़ित, बचाने के चक्कर में डूबे सभी

पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक, यह परिवार बुधवार शाम को एक पारंपरिक भोज में शामिल होने और पूजा-अर्चना करने के लिए कब्बालू मंदिर गया था। मंदिर के दर्शन करने के बाद वे सभी पास ही मलावल्ली तालुका में स्थित मुत्तथी पर्यटन स्थल पर घूमने चले गए। नदी के किनारे तस्वीरें (सेल्फी) खींचने के दौरान अचानक विजयम्मा का पैर फिसल गया और वह गहरे पानी में गिर गईं। उन्हें डूबता देख परिवार की अन्य महिलाओं ने एक-दूसरे को बचाने की कोशिश की, लेकिन पानी का बहाव इतना तेज था कि वे सभी बहने लगीं। महिलाओं को तड़पता देख उनके कार चालक महेश ने भी जान की परवाह न करते हुए नदी में छलांग लगा दी, लेकिन अफसोस वह भी खुद को नहीं बचा सका और सभी की डूबने से मौत हो गई।

तैराकों ने निकाले शव, प्रशासन ने दी चेतावनी

हादसे की खबर मिलते ही स्थानीय प्रशासन तुरंत हरकत में आया और कुशल तैराकों की मदद से बड़े पैमाने पर सर्च ऑपरेशन शुरू किया गया। काफी मशक्कत के बाद बुधवार शाम करीब सात बजे तक सभी पांचों शवों को नदी से बाहर निकाल लिया गया। शवों को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेजा गया और प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें परिजनों को सौंप दिया गया। मांड्या की पुलिस अधीक्षक वी जे शोभा रानी ने बताया कि दिखने में भले ही नदी का जलस्तर कम लग रहा था, लेकिन अंदर पानी का बहाव बेहद खतरनाक और तेज था, जिसके कारण यह बड़ा हादसा हुआ। घटना की गंभीरता को देखते हुए मांड्या के उपायुक्त डॉक्टर कुमार और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने मौके का मुआयना किया। इस हादसे को लेकर हलासुर पुलिस थाने में मामला दर्ज कर आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

माहरंग बलूच को उम्रकैद की सजा, पाकिस्तान की मुश्किलें हुईं दोगुनी

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क्वेटा/इस्लामाबाद: बलूचिस्तान में मानवाधिकारों और स्थानीय अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली 'बलूच यकजेहती कमेटी' (BYC) की प्रमुख नेता माहरंग बलूच और उनके साथी कार्यकर्ताओं को पाकिस्तान की एक आतंकवाद रोधी अदालत द्वारा उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद पूरे प्रांत में भारी उबाल है। इस फैसले के विरोध में बुधवार को बलूचिस्तान के कोने-कोने में ऐतिहासिक और पूर्ण चक्का जाम व बंद देखा गया। इस दौरान सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा और बाजार व व्यावसायिक प्रतिष्ठान पूरी तरह ठप रहे। एक तरफ बलूचिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में आंतरिक असंतोष गहराता जा रहा है, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस न्यायिक फैसले को लेकर पाकिस्तान सरकार और वहां के सैन्य नेतृत्व की कड़ी निंदा शुरू हो गई है।

बंद से पाकिस्तान की आर्थिक रीढ़ पर सीधा असर

क्षेत्रफल के लिहाज से बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, जो प्राकृतिक संसाधनों और रणनीतिक नजरिए से बेहद खास महत्व रखता है। यह क्षेत्र भले ही विकास के मामले में काफी पिछड़ा हो, लेकिन इसे पाकिस्तान की आर्थिक रीढ़ माना जाता है। बलूचिस्तान के सुई इलाके से निकलने वाली प्राकृतिक गैस पूरे पाकिस्तान के घरों और उद्योगों को ऊर्जा देती है, जबकि रेको दिक जैसी जगहों पर सोने और तांबे के विशाल भंडार मौजूद हैं। इस ऐतिहासिक बंद के कारण खदानों में काम रुक गया है और माल की सप्लाई चेन पूरी तरह टूट गई है। जानकारों के मुताबिक, इस बड़े चक्का जाम से आर्थिक तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान को हर दिन करोड़ों रुपये का सीधे तौर पर नुकसान झेलना पड़ रहा है, जिससे चीनी निवेश और आंतरिक सुरक्षा पर भी गहरा असर पड़ने की आशंका है।

फ्रंटियर कॉर्प्स अधिकारी की हत्या का मामला और बंद कमरे में सुनवाई

यह पूरा विवाद सोमवार को पाकिस्तान की एक आतंकवाद रोधी अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले के बाद शुरू हुआ। स्थानीय मीडिया के अनुसार, यह मामला फ्रंटियर कॉर्प्स के एक सैन्य अधिकारी की कथित हत्या से जुड़ा हुआ था। इस मामले में अदालत ने बीवाईसी की फायरब्रांड नेता माहरंग बलूच, बलूच स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (BSO) के अध्यक्ष बलाच कादिर, केंद्रीय नेता अबू बकर कलांची और बीवाईसी के एक अन्य नेता सिबगतुल्लाह शाह को उम्रकैद की सजा सुनाई है। बीवाईसी ने इस फैसले को पूरी तरह 'अन्यायपूर्ण' और 'राजनीतिक बदले की भावना' से प्रेरित बताया है। संगठन का आरोप है कि क्वेटा जेल के अंदर बंद कमरे में हुई यह सुनवाई पूरी तरह अपारदर्शी थी, जिसका मकसद केवल बलूचिस्तान की लोकतांत्रिक आवाजों को दबाना था।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने जताई गंभीर चिंता

इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी पाकिस्तान की किरकिरी शुरू हो गई है। एमनेस्टी इंटरनेशनल और इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन जैसे वैश्विक मानवाधिकार संगठनों ने इस न्यायिक प्रक्रिया की कड़ी आलोचना करते हुए इसे निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का खुला उल्लंघन बताया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की दक्षिण एशिया की कार्यवाहक क्षेत्रीय निदेशक इसाबेल लासी ने अपने बयान में कहा कि यह फैसला साफ तौर पर दिखाता है कि पाकिस्तान किस तरह अपने आतंकवाद विरोधी कानूनों का दुरुपयोग कर शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज कराने वाले राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं की आवाजों को कुचलने का प्रयास कर रहा है।

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