कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर जारी वर्चस्व की जंग अब एक बेहद संगीन और कानूनी मोड़ ले चुकी है। ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पर हुई पार्टी विधायकों की गुप्त बैठकों से जुड़े कुछ बेहद संवेदनशील दस्तावेज सोशल मीडिया पर लीक हो गए हैं, जिससे बंगाल के सियासी गलियारों में भारी हड़कंप मच गया है। इन वायरल कागजों में बैठकों में शामिल विधायकों के हस्ताक्षर और उनकी मौजूदगी का दावा किया गया है। दूसरी ओर, बागी गुट के मुखिया और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रितब्रत बनर्जी ने इन दस्तावेजों को पूरी तरह फर्जी बताते हुए इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग कर दी है।
क्या है 'हरीश चटर्जी स्ट्रीट' के दस्तावेजों का सीक्रेट?
सोशल मीडिया पर तैर रहे ये विवादित दस्तावेज 6 मई और 19 मई को हुई दो बेहद महत्वपूर्ण बैठकों के बताए जा रहे हैं। ये बैठकें कोलकाता के 30बी हरीश चटर्जी स्ट्रीट स्थित ममता बनर्जी के निजी आवास पर आयोजित की गई थीं।
दस्तावेजों का दावा: कागजों के मुताबिक, 6 मई की बैठक में पार्टी के 67 विधायक मौजूद थे। इसमें विधायकों के दस्तखत, उनकी विधानसभा सीट का नाम और तारीख दर्ज है। दावा है कि इसी बैठक में विधायक दल के नेता प्रतिपक्ष, उपनेता और मुख्य सचेतक (विप) का चुनाव किया गया था।
अनुपस्थित विधायकों का जिक्र: कागजों में यह भी लिखा है कि जो विधायक किन्हीं कारणों से कोलकाता नहीं आ सके, उन्होंने भी लिखित में अपना समर्थन भेजा था।
फर्जी दस्तखत का आरोप: 'पन्नों का रंग अलग, विधायकों की टावर लोकेशन जांचो'
बागी नेता रितब्रत बनर्जी ने इन दस्तावेजों की प्रामाणिकता को सिरे से खारिज करते हुए ममता खेमे पर गंभीर जालसाजी के आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा:
"मामले की जांच पहले से चल रही है और जांच एजेंसियों के हाथ अब ये नए दस्तावेज भी लग चुके हैं। इन हस्ताक्षरों की असलियत का पता लगाने के लिए हैंडराइटिंग एक्सपर्ट्स (फोरेंसिक टीम) की मदद ली जानी चाहिए। सिर्फ इतना ही नहीं, दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए उन तारीखों में संबंधित विधायकों की मोबाइल टावर लोकेशन भी खंगाली जानी चाहिए कि वे असल में कालीघाट में थे या कहीं और।"
रितब्रत ने यह भी दावा किया कि वायरल पीडीएफ (PDF) में अलग-अलग पन्नों का रंग आपस में मेल नहीं खा रहा है और कुछ पन्नों पर तो जरूरी हस्ताक्षर तक गायब हैं, जो साफ तौर पर फर्जीवाड़े की ओर इशारा करता है।
ममता बनाम रितब्रत गुट: नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर फंसा पेंच
साल 2026 के चुनावी नतीजों के बाद टीएमसी के भीतर की गुटबाजी अब खुलकर सड़क पर आ चुकी है। ममता बनर्जी खेमा और रितब्रत बनर्जी गुट आमने-सामने हैं। विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) द्वारा रितब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दिए जाने के बाद से यह विवाद कोर्ट-कचहरी तक पहुंच चुका है। ममता खेमा इस फैसले को असंवैधानिक बताकर कानूनी चुनौती दे रहा है, जबकि बागी विधायकों का आरोप है कि पार्टी के भीतर तानाशाही चल रही है और आंतरिक लोकतंत्र को पूरी तरह कुचल दिया गया है।
CID जांच की एंट्री, बढ़ सकती हैं मुश्किलें
फर्जी हस्ताक्षर के इस हाई-प्रोफाइल मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने इसकी जांच सीआईडी (CID) को सौंप दी है। सीआईडी की टीम अब तक कई विधायकों के हैंडराइटिंग सैंपल ले चुकी है। इसी बीच एक बागी विधायक ने बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि 19 मई की बैठक में चालाकी से दो अलग-अलग कोरे कागजों पर दस्तखत कराए गए थे—एक सिर्फ हाजिरी के लिए था और दूसरे का इस्तेमाल नेता प्रतिपक्ष के चुनाव के प्रस्ताव के रूप में कर लिया गया।
यह साफ है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति का यह ड्रामा अब सिर्फ एक पार्टी का आंतरिक विवाद नहीं रहा, बल्कि यह जांच एजेंसियों, विधानसभा की नियमावली और अदालतों के फेर में बुरी तरह उलझ चुका है। आने वाले दिनों में इसके छींटे कई बड़े चेहरों पर पड़ना तय है।









