नई दिल्ली: संसद के आगामी मॉनसून सत्र के नजदीक आते ही देश के राजनीतिक गलियारों में संविधान संशोधन विधेयक को लेकर कयासबाजियों और कूटनीतिक हलचलों का दौर एक बार फिर शुरू हो गया है। हालांकि, केंद्र सरकार की ओर से अभी तक आधिकारिक तौर पर इस प्रकार का कोई विधेयक लाने की पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन यह अटकलें तेज हैं कि सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) इस सत्र में इसे दोबारा पेश करने की कोशिश कर सकता है। भारतीय संविधान के नियमों के अनुसार, किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—में दो-तिहाई बहुमत की अनिवार्य आवश्यकता होती है। आंकड़ों के लिहाज से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) संसद में सबसे बड़ा दल होने के बावजूद, एनडीए का कुनबा इस जादुई और महत्वपूर्ण आंकड़े से फिलहाल काफी पीछे नजर आ रहा है।
लोकसभा सीटों को 850 तक बढ़ाने का नया फॉर्मूला
इन सब के बीच, सरकार महिला आरक्षण कानून को समय पर धरातल पर उतारने और लोकसभा की सीटों में बढ़ोतरी करने के लिए कई नए नीतिगत फॉर्मूलों पर गंभीरता से विचार कर रही है। सरकार के सामने एक प्रमुख प्रस्ताव यह आया है कि देश के सभी राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या में एक समान 50 प्रतिशत तक की वृद्धि की जाए। इस फॉर्मूले के पीछे मुख्य उद्देश्य दक्षिण भारतीय राज्यों की उन पुरानी चिंताओं और आपत्तियों को दूर करना है, जिनमें कहा जाता रहा है कि आबादी के आधार पर नए सिरे से परिसीमन होने से देश की राजनीति में उनकी हिस्सेदारी और राजनीतिक ताकत कम हो जाएगी। नए प्रस्तावित मसौदे के तहत, 1971 की जनगणना को आधार मानकर राज्यों के बीच सीटों के मौजूदा अनुपात को यथावत बनाए रखा जाएगा, जबकि लोकसभा और विधानसभा सीटों का आंतरिक पुनर्निर्धारण 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर किया जाएगा, क्योंकि वर्तमान में चल रही नई जनगणना के अंतिम आंकड़े आने अभी बाकी हैं। सरकार की रणनीति है कि साल 2029 के आम चुनावों से पहले महिला आरक्षण को हर हाल में प्रभावी किया जाए, जिसके लिए निचली सदन की मौजूदा 543 सीटों की संख्या को बढ़ाकर अधिकतम 850 तक ले जाने की योजना है। इसके अतिरिक्त, मॉनसून सत्र शुरू होने से पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) में हुए हालिया विद्रोह के मामलों पर दल-बदल कानून के तहत अपना अंतिम निर्णय सुनाएंगे, जबकि द्रमुक (DMK) ने सदन में कांग्रेस से अलग बैठने की नई व्यवस्था का आग्रह किया है।
लोकसभा का मौजूदा गणित और एनडीए की चुनौती
निचले सदन यानी लोकसभा के मौजूदा राजनीतिक समीकरणों पर नजर डालें तो यहां कुल 543 सीटें हैं, जिनमें से बशीरहाट, शिलॉन्ग और नौगांव जैसी तीन सीटें रिक्त होने के कारण प्रभावी संख्या 540 रह गई है। इस मौजूदा संख्या के आधार पर किसी भी विधेयक को दो-तिहाई बहुमत से पास कराने के लिए 360 सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी। साल 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों में एनडीए के पास 293 सीटें थीं, जो हाल के दिनों में कुछ अन्य गुटों के समर्थन के बाद बढ़कर 319 तक पहुंच चुकी हैं। इस बढ़े हुए आंकड़े में तृणमूल कांग्रेस के 20 और शिवसेना (यूबीटी) के 6 बागी सांसदों का अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष समर्थन शामिल माना जा रहा है। अलग-अलग दलों की स्थिति देखें तो अकेले भाजपा के पास 240 सीटें हैं, जबकि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस 98 सीटों पर है। अन्य क्षेत्रीय दलों में समाजवादी पार्टी (37), तृणमूल कांग्रेस (28), द्रमुक (22), तेलुगु देशम पार्टी (16), जनता दल यूनाइटेड (12), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी-शरद पवार (8), और शिवसेना-शिंदे गुट (7) सीटों के साथ मौजूद हैं। रणनीतिकारों का मानना है कि यदि वोटिंग के दौरान द्रमुक (DMK) के सांसद मतदान से दूरी बना लेते हैं, तो दो-तिहाई का जादुई आंकड़ा घटकर 342 पर सिमट सकता है। इससे पहले अप्रैल महीने में जब संविधान संशोधन विधेयक को पेश किया गया था, तब एनडीए केवल 298 सदस्यों का समर्थन ही जुटा पाया था, जो विधेयक पारित कराने के लिए नाकाफी था।
उच्च सदन में 164 वोटों की कठिन डगर
संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में भी राह उतनी आसान नहीं है, जहां इस समय कुल मौजूदा सांसदों की संख्या 242 है। इस सदन में संविधान संशोधन को मंजूरी दिलाने के लिए एनडीए को दो-तिहाई बहुमत यानी कम से कम 164 सदस्यों के मतों की दरकार होगी। लोकसभा की तुलना में सत्तारूढ़ गठबंधन राज्यसभा में थोड़ा अधिक मजबूत और सुगठित स्थिति में दिखाई देता है, लेकिन फिर भी वह आवश्यक बहुमत के आंकड़े से कुछ कदम दूर है। उच्च सदन के मौजूदा दलीय ढांचे में भाजपा के पास 114 सांसदों का मजबूत बल है, जबकि कांग्रेस के पास 30, तृणमूल कांग्रेस के पास 10, द्रमुक के पास 8 और बीजू जनता दल (बीजद) के पास 5 सीटें हैं। इनके अलावा अन्नाद्रमुक, जदयू, राकांपा, समाजवादी पार्टी और तेदेपा जैसे दलों के पास 4-4 सांसद मौजूद हैं, जबकि सदन में 7 नामांकित और 4 निर्दलीय या अन्य दलों के सदस्य भी एक महत्वपूर्ण भूमिका में बने हुए हैं।









