नई दिल्ली. पेपर लीक और परीक्षाओं में हुई गड़बड़ियों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग तेज हो गई है। इसी कड़ी में 'कॉकरोच जनता पार्टी' द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शन पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश की बड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने बातचीत करते हुए कहा कि यह एक स्वाभाविक आंदोलन है, जिसे लेकर लोगों की अलग-अलग राय हैं। कुछ लोग इसे 'डीप स्टेट' द्वारा प्रायोजित बता रहे हैं, तो कुछ इसे देश के युवाओं की हताशा और गहरी नाराजगी का रूप मान रहे हैं।
आंदोलन ने मीडिया में बनाई जगह
जयराम रमेश ने आगे कहा कि इस आंदोलन ने मीडिया और सोशल मीडिया पर काफी सुर्खियां बटोरी हैं और लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि यह कोई राजनीतिक दल नहीं है। उनके मुताबिक, लोकतंत्र में आखिरी फैसला और सबसे महत्वपूर्ण भूमिका राजनीतिक दलों और उनकी संगठनात्मक संरचना की ही होती है।
राजनीतिक दलों को निभानी चाहिए जिम्मेदारी
कांग्रेस नेता ने दावा किया कि यह आंदोलन युवाओं की निराशा और व्यवस्था के प्रति उनके असंतोष को सामने लाने का एक बड़ा माध्यम बना है। उन्होंने कहा कि युवाओं के इस संदेश को आगे बढ़ाने की असली जिम्मेदारी अब राजनीतिक दलों को निभानी होगी। लोकतंत्र में आंदोलनों की अपनी एक खास भूमिका होती है, लेकिन पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था केवल आंदोलनों के भरोसे नहीं चल सकती, इसकी असली नींव राजनीतिक दल ही होते हैं।
सोनिया गांधी के साथ काम करने का अनुभव
इस बातचीत के दौरान जयराम रमेश ने सोनिया गांधी के साथ काम करने के अपने अनुभवों को भी साझा किया। उन्होंने साल 2004 के दौर को याद करते हुए कहा कि उस समय किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि कांग्रेस चुनाव जीत पाएगी। अटल बिहारी वाजपेयी एक बेहद मजबूत, प्रभावशाली और करिश्माई नेता थे, जिसके कारण किसी को कांग्रेस की जीत का भरोसा नहीं था। लेकिन कांग्रेस ने एक बड़ा चमत्कार कर दिखाया और 145 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरकर यूपीए सरकार का गठन किया, जिसके बाद अगले 10 वर्षों तक डॉ. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री रहे।
सोनिया ने पार्टी को रखा एकजुट
उन्होंने सोनिया गांधी की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने पार्टी को हमेशा एकजुट बनाए रखा और एक सही दिशा दी। उन्होंने याद दिलाया कि एक समय ऐसा था जब देश में कांग्रेस के 15 मुख्यमंत्री थे और उनके लिए खास सम्मेलन आयोजित किए जाते थे। पहला सम्मेलन गुवाहाटी में, दूसरा श्रीनगर में और उसके बाद दिल्ली में हुआ था। जयराम रमेश के मुताबिक, इन्हीं सम्मेलनों के दौरान ही 'मनरेगा' और 'वन अधिकार अधिनियम' जैसी बड़ी और ऐतिहासिक योजनाओं के विचारों की नींव पड़ी थी।









