चीनी की कीमतों में उछाल पर खरगे का वार, केंद्र से मांगा जवाब

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नई दिल्ली: रसोई के सबसे अहम बजट पर मिठास भारी पड़ती दिख रही है। देश के खुदरा बाजारों में चीनी की कीमतें पिछले एक सप्ताह के भीतर ही 55 रुपये से बढ़कर 70 रुपये प्रति किलो तक के आंकड़े को छू चुकी हैं। भाव में आई इस अचानक तेजी ने उपभोक्ता वर्ग को परेशानी में डाल दिया है। वहीं दूसरी ओर, इस मुद्दे को लेकर अब राजनीतिक सरगर्मियां भी तेज हो गई हैं और विपक्षी दल नीतिगत कमियों को लेकर सरकार पर हमलावर हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष ने चीनी के गिरते भंडार पर जताई चिंता

घरेलू बाजार में गहराते शक्कर संकट और बढ़ती कीमतों पर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सख्त ऐतराज जताया है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बयान जारी कर कहा कि देश के भीतर चीनी का मौजूदा स्टॉक बीते 9 सालों के सबसे निचले स्तर पर खिसक आया है। खरगे ने सवाल खड़ा किया कि एक तरफ आम आदमी शक्कर के बढ़ते दामों से परेशान है, वहीं दूसरी तरफ पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) की नीति की दोबारा समीक्षा क्यों नहीं की जा रही।

विपक्ष ने पूछे तीन सीधे सवाल

आगामी त्यौहारी सीजन का जिक्र करते हुए विपक्ष ने केंद्र की रणनीतियों पर सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस नेतृत्व ने सरकार के सामने ये तीन मुख्य प्रश्न रखे:

  1. दुनिया के प्रमुख उत्पादक देशों में शुमार भारत में चीनी का स्टॉक 9 साल के न्यूनतम स्तर पर कैसे पहुंच गया? ऐसी क्या वजह रही कि निर्यात पर रोक लगाने के साथ-साथ 10 लाख टन चीनी बिना शुल्क (ड्यूटी-फ्री) आयात करने की नौबत आ बनी?

  2. बीते तीन महीनों के अंतराल में चीनी के दामों में लगभग 40 फीसदी का उछाल दर्ज किया गया है। त्योहारों से ठीक पहले आम जनता पर पड़ी इस महंगाई की जिम्मेदारी किसकी है?

  3. जब देश खुद शक्कर की कमी से जूझ रहा है और बाहर से आयात की नौबत आ गई है, तो गन्ने की फसल का इस्तेमाल एथेनॉल बनाने में जारी रखने की नीति पर पुनर्विचार क्यों नहीं हो रहा?

नीतियों पर सवाल और 'आत्मनिर्भर भारत' का मुद्दा

विपक्षी नेताओं का आरोप है कि केंद्र की असंतुलित नीतियों के चलते आज देश में चीनी का उत्पादन प्रभावित हुआ है। उत्पादन घटने से बफर स्टॉक रसातल में चला गया और स्थिति को संभालने के लिए विदेशों से खरीदारी करनी पड़ रही है। उन्होंने कहा कि एक तरफ उपभोक्ता महंगाई की मार झेलने को मजबूर है, वहीं दूसरी तरफ ईंधन नीति के नाम पर गन्ने की खपत को दूसरी दिशा में मोड़ा जा रहा है।