सरकारी टेंडर में चीनी कंपनियों की वापसी? कांग्रेस ने सरकार पर लगाए बड़े आरोप

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नई दिल्ली। केंद्र सरकार की चीन नीति को लेकर कांग्रेस ने एक बार फिर तीखा हमला बोला है। पार्टी का आरोप है कि नरेंद्र मोदी सरकार का चीन के प्रति नरम रुख लगातार बना हुआ है, जिसका सीधा और विपरीत असर भारतीय उद्योगों, विशेषकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) पर पड़ रहा है। विपक्ष ने एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि सरकार ने भारत में फैक्ट्रियां संचालित करने वाली चीन की चार बिजली उपकरण निर्माता कंपनियों को देश की महत्वपूर्ण सरकारी विद्युत परियोजनाओं के टेंडर में शामिल होने की इजाजत दे दी है।

बढ़ता व्यापार घाटा और घरेलू उद्योगों पर असर

पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व के अनुसार, चीन के प्रति इस कथित ढुलमुल नीति के कारण भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच चुका है। व्यापार के इस असंतुलन से घरेलू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। विपक्ष ने यह भी रेखांकित किया कि एक तरफ देश के बाजार चीनी सामान से प्रभावित हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर चीन की ओर से उकसावे की कार्रवाई और गतिविधियां थमने का नाम नहीं ले रही हैं।

जल सुरक्षा और रणनीतिक क्षेत्रों में चुनौतियां

रणनीतिक मोर्चे पर चिंता जताते हुए दावा किया गया है कि तिब्बत के मेडोग क्षेत्र में दुनिया के सबसे बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट का काम तेजी से चल रहा है। इस विशाल परियोजना से भविष्य में ब्रह्मपुत्र नदी के जल प्रवाह पर असर पड़ सकता है, जो भारत की जल सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है। इसके साथ ही, पूर्वी लद्दाख से लगती सीमाओं पर भी यह आरोप लगाया गया है कि भारतीय पक्ष को उन क्षेत्रों में अपनी पारंपरिक गश्त और स्थानीय चरवाहों को पशु चराने के अधिकारों से हाथ धोना पड़ा है।

राष्ट्रीय सुरक्षा और पूर्व के घटनाक्रमों पर सवाल

विपक्ष ने जून 2020 की गलवान घाटी की हिंसक झड़प का जिक्र करते हुए कहा कि लद्दाख में देश के 20 जांबाज सैनिकों की शहादत के बावजूद, तत्कालीन सरकारी बयानों में पड़ोसी देश को एक तरह से क्लीन चिट देने की कोशिश की गई थी। इसके अलावा, पुराने सैन्य घटनाक्रमों और 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसी गतिविधियों में भी पाकिस्तान के साथ चीन की संलिप्तता का हवाला दिया गया, जिसे सैन्य नेतृत्व द्वारा भी समय-समय पर रेखांकित किया गया है। इन तमाम संवेदनशील मुद्दों के बाद भी चीन को आर्थिक और व्यावसायिक रियायतें दिए जाने पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।