Vijay की एंट्री से बढ़ा सियासी रोमांच, भाजपा-कांग्रेस की बढ़ी टेंशन

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चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति इस वक्त एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहाँ हर पल समीकरण बदल रहे हैं। विधानसभा चुनाव के नतीजों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने के कारण पैदा हुआ गतिरोध अब टूटने के संकेत दे रहा है। द्रमुक (डीएमके) की हालिया विधायक दल की बैठक में पारित 'रिजॉल्यूशन 3' ने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। इस प्रस्ताव के माध्यम से एमके स्टालिन को भविष्य के फैसलों के लिए असीमित अधिकार दिए गए हैं, जिसे जानकार विजय की पार्टी टीवीके को बाहर से समर्थन देने की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं। राज्य में स्थिरता की दुहाई देते हुए द्रमुक ने स्पष्ट कर दिया है कि वह तमिलनाडु को दोबारा चुनाव की आग में नहीं झोंकना चाहती, भले ही इसके लिए उसे किंगमेकर की भूमिका क्यों न निभानी पड़े।

सत्ता के समीकरण और स्टालिन का मास्टरस्ट्रोक

द्रमुक के इस बदले हुए रुख के पीछे एक गहरी सियासी समझ नजर आती है। वर्तमान परिस्थितियों में विजय की पार्टी टीवीके सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, लेकिन बहुमत के जादुई आंकड़े से दूर है। स्टालिन द्वारा बाहर से समर्थन देने की संभावना ने विजय के लिए सत्ता की राह आसान कर दी है। इस रणनीति से द्रमुक को दोहरी जीत मिल सकती है क्योंकि वह सरकार का हिस्सा न होकर भी अपनी महत्वाकांक्षी कल्याणकारी योजनाओं, जैसे महिलाओं को मासिक सहायता और मुफ्त नाश्ता योजना को जारी रखने का दबाव बना पाएगी। इसके साथ ही विपक्ष में बैठकर सरकार की लगाम अपने हाथ में रखने का विकल्प भी खुला रहेगा, जिससे जरूरत पड़ने पर सत्ता संतुलन को प्रभावित किया जा सके।

भाजपा को रोकने की कवायद और कांग्रेस से बढ़ती तल्खी

इस पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा पहलू सांप्रदायिक ताकतों को राज्य की सत्ता से दूर रखना भी है। द्रमुक के प्रस्ताव में छिपे संकेत साफ करते हैं कि स्टालिन किसी भी कीमत पर भाजपा को तमिलनाडु की राजनीति में पिछले दरवाजे से प्रवेश करने का मौका नहीं देना चाहते। टीवीके को समर्थन देकर वह भाजपा को गठबंधन के गणित से पूरी तरह बाहर कर सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, वर्षों पुराने साथी कांग्रेस के साथ द्रमुक के रिश्तों में आई खटास अब जगजाहिर हो चुकी है। कांग्रेस पर विश्वासघात का आरोप लगाकर द्रमुक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य की राजनीति में पुराने समीकरणों की जगह अब नए गठबंधन लेंगे, जिसमें कांग्रेस की भूमिका काफी सीमित हो सकती है।

द्रविड़ राजनीति का नया अध्याय और भविष्य की राह

तमिलनाडु में दशकों तक चली करुणानिधि बनाम जयललिता की विरासत अब एक नए युग में प्रवेश कर रही है। एआईएडीएमके के साथ गठबंधन की अटकलों को दरकिनार करते हुए द्रमुक ने अपने कार्यकर्ताओं की भावनाओं का सम्मान किया है और कट्टर प्रतिद्वंद्वी से हाथ मिलाने के बजाय रणनीतिक समर्थन को प्राथमिकता दी है। स्टालिन की यह नई राजनीति उन्हें एक जिम्मेदार और दूरदर्शी नेता के रूप में पेश करती है जो सत्ता के मोह से ऊपर उठकर राज्य की स्थिरता को महत्व दे रहे हैं। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो तमिलनाडु में एक ऐसा प्रशासनिक मॉडल देखने को मिलेगा जहाँ सत्ता की बागडोर विजय के हाथ में होगी, लेकिन उसकी दिशा और दशा का नियंत्रण पर्दे के पीछे से एमके स्टालिन तय करेंगे।