चंडीगढ़। पंजाब में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस पार्टी के भीतर बड़े संगठनात्मक फेरबदल की सुगबुगाहट तेज हो गई है। पार्टी के भीतर पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के बीच अंदरूनी कलह और गुटबाजी की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। बताया जा रहा है कि चन्नी गुट लगातार राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग कर रहा है, जिसके बाद अब राजनीतिक परिस्थितियों को भांपते हुए पार्टी हाईकमान वड़िंग की जगह किसी नए चेहरे को कमान सौंपने का मन बना रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस संवेदनशील मुद्दे पर हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल और वरिष्ठ नेता सचिन पायलट के बीच वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए एक उच्चस्तरीय बैठक भी हो चुकी है।
वड़िंग के हटने से क्या हो सकता है कांग्रेस को नुकसान?
गौरतलब है कि साल 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा था, जहां पार्टी महज 18 सीटों पर सिमट गई थी, जो अब तक का उसका सबसे खराब प्रदर्शन था। चुनाव से ठीक पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया था, लेकिन यह दांव उल्टा पड़ गया और चन्नी खुद अपनी दोनों सीटों पर चुनाव हार गए थे।
हालांकि, इसके विपरीत अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के नेतृत्व में पार्टी ने लोकसभा चुनावों में शानदार वापसी करते हुए 7 सीटों पर दमदार जीत दर्ज की थी। ऐसे में यदि हाईकमान वड़िंग को पद से हटाता है, तो इसके कई दूरगामी और नकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं:
संगठन में अस्थिरता: प्रदेश अध्यक्ष बदलने से केवल शीर्ष नेतृत्व नहीं बदलेगा, बल्कि जिला और ब्लॉक स्तर तक के संगठन में उथल-पुथल मच जाएगी। वर्तमान अध्यक्ष के कार्यकाल में सक्रिय रहे नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए नई कार्यशैली और व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाना एक बड़ी चुनौती होगी।
गुटबाजी का और अधिक बढ़ना: पार्टी के भीतर मौजूदा कलह मुख्य रूप से वड़िंग और चन्नी गुट के बीच है। केवल वड़िंग को हटाने से अंतर्कलह समाप्त नहीं होगी, बल्कि इससे नाराजगी और बढ़ सकती है, जिसका सीधा नुकसान आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को उठाना पड़ सकता है।
2022 की गलतियों से सबक का संकट
आपको बता दें कि साल 2022 के चुनाव में भी कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच की खुलकर सामने आई आपसी कलह ने पार्टी की नैया डुबोई थी। उस समय डैमेज कंट्रोल के तहत हाईकमान ने दलित चेहरा के रूप में चरणजीत सिंह चन्नी को आगे किया था, लेकिन गुटबाजी के चलते पार्टी जीत हासिल नहीं कर पाई थी। अब एक बार फिर वही पुरानी गलतियां और आपसी खींचतान पार्टी के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।









