रायपुर|भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी 'पीरिऑडिक लेबर फोर्स सर्वे' (PLFS) 2025 की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी की दर 2.3 प्रतिशत दर्ज की गई है। हालांकि यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत की तुलना में काफी बेहतर नजर आता है, लेकिन इसने प्रदेश में रोजगार की गुणवत्ता और वास्तविक स्थिति को लेकर एक नई चर्चा छेड़ दी है।
शहरों की तुलना में गांवों की स्थिति बेहतर
रिपोर्ट के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच बड़ा अंतर देखने को मिलता है:
ग्रामीण क्षेत्र: यहाँ बेरोजगारी दर मात्र 1.8 प्रतिशत है। विशेषज्ञों का मानना है कि गांवों में लोग खेती-किसानी और छोटे स्वरोजगार से जुड़े रहते हैं, जिससे वे तकनीकी रूप से 'रोजगारशुदा' की श्रेणी में आते हैं।
शहरी क्षेत्र: शहरों में यह आंकड़ा 5.7 प्रतिशत तक पहुँच गया है, जो दर्शाता है कि शहरी युवाओं को अपनी योग्यता के अनुरूप काम खोजने में अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
महिलाओं की भागीदारी और आंकड़े
सर्वे के अनुसार, पुरुषों की तुलना में महिलाओं में बेरोजगारी दर कम (2.2%) पाई गई है। हालांकि, जानकार इस पर सावधानी बरतने की सलाह देते हैं क्योंकि एक बड़ा महिला वर्ग श्रम बल (Labor Force) का हिस्सा ही नहीं माना जाता, जिससे आंकड़ों और हकीकत में अंतर हो सकता है।
क्या है 2.3% बेरोजगारी दर का असली अर्थ?
तकनीकी रूप से 2.3 प्रतिशत बेरोजगारी का मतलब यह है कि सक्रिय रूप से काम तलाश रहे 100 लोगों में से केवल 2.3 लोगों को काम नहीं मिल पा रहा है। इसका अर्थ यह हुआ कि लगभग 97.7 प्रतिशत श्रमबल किसी न किसी आर्थिक गतिविधि में लगा हुआ है।
विशेषज्ञों की राय: कम बेरोजगारी दर का मतलब हमेशा अच्छी और स्थायी नौकरी नहीं होता। छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्य में लोग लंबे समय तक खाली नहीं बैठ सकते, इसलिए वे कम आय या असंगठित क्षेत्र के कार्यों में जुड़ जाते हैं, जिससे दर तो कम दिखती है, लेकिन आर्थिक मजबूती वैसी नहीं होती।
पड़ोसी राज्यों से तुलना
PLFS 2025 की रिपोर्ट में अन्य राज्यों की स्थिति भी स्पष्ट की गई है:
गुजरात: 0.9 प्रतिशत (मजबूत औद्योगिक आधार के कारण)।
मध्य प्रदेश: 1.5 प्रतिशत।
रोजगार की गुणवत्ता बनी चुनौती
आंकड़ों के सामने आने के बाद अब बहस केवल 'काम मिलने' पर नहीं, बल्कि 'काम के स्तर' पर केंद्रित हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अल्प-रोजगार (Under-employment) और प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment) जैसी समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आने वाले समय में सरकार और नीति निर्माताओं के लिए चुनौती केवल रोजगार संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि युवाओं को स्थायी और बेहतर वेतन वाली नौकरियां उपलब्ध कराना होगा।









