विधानसभा में राज्यपाल के तंज, टीकाराम जूली पर हंसी-ठिठोली

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जयपुर। राजस्थान विधानसभा में आयोजित एक विशेष गरिमामयी कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े का एक बेहद अनूठा और मजाकिया अंदाज देखने को मिला। अपने संबोधन में उन्होंने नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली पर हल्के-फुल्के अंदाज में ऐसी राजनीतिक चुटकी ली कि पूरा सदन ठहाकों से गूंज उठा। राज्यपाल ने प्रदेश के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री टीकाराम पालीवाल का स्मरण करते हुए कहा कि जब उन्होंने इस कार्यक्रम में 'टीकाराम' नाम सुना, तो उन्हें लगा ही नहीं कि बात प्रतिपक्ष के नेता टीकाराम जूली की हो रही है, क्योंकि वे उम्र में अभी काफी छोटे हैं। उन्होंने मुस्कुराते हुए आगे कहा, "आगे बहुत लंबी लाइन है, इनका नंबर कब आएगा पता नहीं। वैसे भी ये मुख्यमंत्री बनने वाले लगते नहीं हैं।"

महाराष्ट्र का अनुभव साझा कर बोले- विपक्ष का कोई भरोसा नहीं

अपने संबोधन के दौरान राज्यपाल बागड़े ने महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष पद पर रहने के अपने पुराने दिनों को भी याद किया। उन्होंने कहा कि राजनीति के गलियारों में प्रतिपक्ष का कोई भरोसा नहीं होता। महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि उनके कार्यकाल के दौरान विपक्ष के दो बड़े नेता इस्तीफा देकर सत्ता पक्ष में शामिल हो गए थे और बाद में सरकार में मंत्री पद की शपथ भी ली। राज्यपाल की इस बात पर भी सदन में मौजूद तमाम विधायकों और नेताओं के चेहरे खिल उठे।

"विधानसभा अध्यक्ष का सबसे बड़ा काम- विधायकों को नीचे बैठाना"

राज्यपाल ने बेहद रोचक तरीके से विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) की भूमिका और उनकी जिम्मेदारियों पर भी टिप्पणी की। उन्होंने एक मजेदार वाकया सुनाते हुए कहा कि जब वे महाराष्ट्र में स्पीकर बने और अपने गांव लौटे, तो उनके मित्रों ने उनसे पूछा था कि आखिर इस पद का सबसे मुख्य और बड़ा काम क्या होता है? इस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए अपने दोस्तों को जवाब दिया था कि, "सदन में बार-बार खड़े होने वाले विधायकों को 'नीचे बैठ जाओ' कहना ही अध्यक्ष का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण काम है।"

शून्य छात्र संख्या वाले विश्वविद्यालयों पर जताई गहरी चिंता

हंसी-मजाक के बीच राज्यपाल ने राजस्थान की उच्च शिक्षा और विश्वविद्यालयों की वर्तमान स्थिति को लेकर बेहद गंभीर चिंता भी प्रकट की। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि राज्य में कई यूनिवर्सिटीज अब सिर्फ कागजों और नाम मात्र की रह गई हैं, जहां पिछले कई सालों से एक भी छात्र ने एडमिशन नहीं लिया है। इसके बावजूद वहाँ कुलपति, रजिस्ट्रार और पूरा प्रशासनिक अमला शान से काम कर रहा है और वेतन उठा रहा है। उन्होंने एक बड़ी यूनिवर्सिटी को बांटकर कई छोटे संस्थान बनाने की नीति पर भी सवाल उठाए, जिससे वित्तीय प्रबंधन बिगड़ा है।

"गोल्ड मेडलिस्ट युवा भी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं से डर रहे हैं"

शिक्षा की गिरती बुनियादी गुणवत्ता पर ध्यान आकर्षित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि दीक्षांत समारोहों के दौरान जब वे गोल्ड मेडल जीतने वाले होनहार छात्र-छात्राओं से बात करते हैं, तो वे यूपीएससी (UPSC) या आरपीएससी (RPSC) जैसी प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने से कतराते हैं। छात्रों का मानना होता है कि वे इन परीक्षाओं को पास नहीं कर पाएंगे। राज्यपाल ने साफ किया कि युवाओं में पैदा हो रहा यह डर देश की शिक्षा व्यवस्था के बुनियादी ढांचे की कमजोरी को दर्शाता है, जिसे सुधारना बेहद जरूरी है।