मध्यस्थता विफल होने के बाद ज्ञानवापी केस ने लिया नया मोड़, दोनों पक्ष अपने रुख पर कायम

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वाराणसी: देश के सबसे चर्चित और संवेदनशील कानूनी मामलों में शुमार ज्ञानवापी परिसर विवाद के समाधान के लिए शुरू की गई मध्यस्थता (सुलह-समझौते) की पहली गंभीर पहल पूरी तरह से विफल साबित हुई है। इस जटिल विवाद को कानूनी मुकदमेबाजी से इतर आपसी सहमति से सुलझाने के उद्देश्य से स्थानीय कचहरी परिसर के मनोरंजन कक्ष (रिक्रिएशन रूम) में एक विशेष बैठक बुलाई गई थी।

इस बैठक में दोनों ही पक्षों के प्रतिनिधि और उनके अधिवक्ता उपस्थित हुए, लेकिन लंबी बातचीत और प्रारंभिक चर्चा के बाद भी सहमति का कोई रास्ता नहीं निकल सका। दोनों ही पक्षों ने स्पष्ट और दो टूक शब्दों में कह दिया है कि वे इस संवेदनशील विषय पर किसी भी तरह के समझौते या मध्यस्थता के लिए तैयार नहीं हैं और अपनी कानूनी लड़ाई को न्यायालय के भीतर ही जारी रखेंगे।

सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पहल पर आयोजित की गई थी बैठक; जिला न्यायालय वाराणसी में खुला था लोक अदालत का मंच

वाराणसी: उल्लेखनीय है कि इस अत्यंत संवेदनशील और ऐतिहासिक विवाद का स्थायी व शांतिपूर्ण हल निकालने के उद्देश्य से देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने एक महत्वपूर्ण पहल की थी। उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार, इस विवाद को लोक अदालत के माध्यम से सुलझाने की रूपरेखा तैयार की गई थी:

  • पहली बैठक रही बेनतीजा: इसी के तहत जिला एवं सत्र न्यायालय वाराणसी में पहली औपचारिक बैठक का आयोजन किया गया था।

  • सुलह की मेज से दूरी: बैठक का मुख्य उद्देश्य दोनों पक्षों को एक मेज पर लाकर बातचीत के जरिए बीच का रास्ता निकालना था। हालांकि, शुरुआती दौर की बातचीत में ही दोनों पक्षों का अड़ियल रुख सामने आ गया और मध्यस्थता का यह बड़ा शासकीय प्रस्ताव पहली ही मुलाकात में धराशायी हो गया।

मुस्लिम पक्ष का कड़ा रुख; कहा- मालिकाना हक और पूजा स्थल अधिनियम जैसे संवैधानिक मामलों में समझौता मुमकिन नहीं

वाराणसी: बैठक में शामिल होने से पहले और चर्चा के दौरान मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ताओं और अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी के सचिव एसएम यासीन ने अपने रुख को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था:

  • शांतिपूर्ण हल का सम्मान लेकिन कानून सर्वोपरि: मुस्लिम पक्ष की ओर से कहा गया कि वे समाज में शांति और सौहार्दपूर्ण समाधान का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन ज्ञानवापी का मामला अत्यंत संवेदनशील है।

  • दावा छोड़ने से साफ इनकार: यह मामला सीधे तौर पर भूमि के मालिकाना हक और ऐतिहासिक 'पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991' (Places of Worship Act, 1991) जैसी संवैधानिक धाराओं से जुड़ा हुआ है। इसलिए, इस तरह के संवैधानिक और कानूनी रूप से जटिल मामलों का फैसला किसी लोक अदालत या बंद कमरे में होने वाली मध्यस्थता वार्ताओं के जरिए नहीं किया जा सकता। उन्होंने साफ घोषणा की कि वे किसी भी कीमत पर अपना मालिकाना हक और दावा नहीं छोड़ेंगे और देश की अदालतों में अपनी कानूनी लड़ाई को पूरी ताकत से जारी रखेंगे। ऐसे में उनके लिए इस तरह की सुलह वार्ताओं में शामिल होने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है।

हिंदू पक्ष भी समझौते के मूड में नहीं; मुख्य पैरोकार बोलीं- पूरी भूमि पर चाहिए सिर्फ बाबा विश्वनाथ का अधिकार

वाराणसी: दूसरी ओर, हिंदू पक्ष भी इस मामले में किसी भी तरह के समझौते या बीच का रास्ता निकालने के पक्ष में बिल्कुल नहीं है। इस विवाद की मुख्य महिला वादिनी और पैरोकारों ने भी इस मध्यस्थता बैठक को लेकर अपनी असहमति खुलकर जाहिर की है:

  • समझौते की कोई गुंजाइश नहीं: ज्ञानवापी मामले की मुख्य वादिनी लक्ष्मी देवी ने साफ शब्दों में कहा कि वह किसी भी प्रकार के समझौते, समझौते के फॉर्मूले या मध्यस्थता के विचार के सख्त खिलाफ हैं।

  • साक्ष्यों का दिया हवाला: उन्होंने परिसर के भीतर मिले विभिन्न पुरातात्विक साक्ष्यों और धार्मिक प्रतीकों का हवाला देते हुए कहा कि हिंदू समाज अब किसी भी तरह का आधा-अधूरा समझौता नहीं चाहता है। उनकी मांग अत्यंत स्पष्ट और दृढ़ है कि पूरी ज्ञानवापी विवादित भूमि पर केवल और केवल आदि विश्वेश्वर (हिंदू मंदिर) का ही पूर्ण और वैधानिक अधिकार बहाल होना चाहिए, जिसके लिए वे सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी संघर्ष करने को तैयार हैं।