लालू यादव की जमानत बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की

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नई दिल्ली। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले के देवघर कोषागार से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में देश की सर्वोच्च अदालत से बहुत बड़ी राहत मिली है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल राजद सुप्रीमो की जमानत को रद्द करने से पूरी तरह इनकार कर दिया है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए जमानत के आदेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की मुख्य याचिका को भी स्वीकार नहीं किया, जिसे लालू प्रसाद यादव के लिए एक बड़ी कानूनी और राजनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है।

केंद्रीय जांच ब्यूरो की विशेष याचिका को अदालत ने किया खारिज

दरअसल, देश की शीर्ष जांच एजेंसी सीबीआई ने झारखंड हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके तहत लालू प्रसाद यादव को देवघर कोषागार से अवैध निकासी के मामले में नियमित जमानत प्रदान की गई थी। केंद्रीय एजेंसी ने अपनी दलील में राजद प्रमुख की जमानत को तुरंत रद्द कर उन्हें वापस न्यायिक हिरासत में भेजने की जोरदार मांग की थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले पर विचार करने के बाद स्पष्ट किया कि इस मौजूदा स्तर पर उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने का कोई ठोस या तार्किक आधार नजर नहीं आता है।

झारखंड हाईकोर्ट को छह महीने के भीतर सुनवाई पूरी करने का अल्टीमेटम

यद्यपि सर्वोच्च अदालत ने सीबीआई की फौरी मांग को ठुकरा दिया है, लेकिन इसके साथ ही झारखंड उच्च न्यायालय को इस पूरे प्रकरण से जुड़ी मुख्य अपीलों पर अपनी कार्रवाई तेज करने का एक कड़ा निर्देश भी जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि देवघर कोषागार मामले से जुड़े जितने भी कानूनी विवाद और अपीलें वर्तमान में हाईकोर्ट के समक्ष लंबित हैं, उन पर बेहद तेजी से और प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई की जाए। अदालत ने इसके लिए एक निश्चित समय सीमा तय करते हुए कहा कि यदि संभव हो, तो अगले छह महीनों के भीतर इन सभी लंबित अपीलों का अंतिम रूप से निपटारा कर दिया जाए।

हाईकोर्ट के जमानत आधार पर केंद्रीय एजेंसी ने उठाए गंभीर सवाल

इस बेहद संवेदनशील मामले की अदालती कार्यवाही के दौरान केंद्रीय एजेंसी की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने झारखंड हाईकोर्ट के फैसले की वैधानिकता पर कई गंभीर सवाल खड़े किए। सरकारी वकील ने कोर्ट रूम में दलील दी कि लालू प्रसाद यादव की सजा को निलंबित करने का उच्च न्यायालय का यह आदेश तथ्यात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण और गलत गणना के आधार पर पारित किया गया था। उन्होंने पीठ को अवगत कराया कि इससे पहले इसी आधार पर दोषी की दो अलग-अलग अर्जियां खारिज की जा चुकी थीं, लेकिन तीसरी बार में उन्हें इस तकनीकी आधार पर राहत दे दी गई कि उन्होंने अपनी कुल सजा का ५० प्रतिशत हिस्सा जेल में काट लिया है, जो कि तर्कों के विपरीत है।

कानूनी बारीकियों और मुख्य संवैधानिक मुद्दों पर आगे भी जारी रहेगी बहस

सर्वोच्च न्यायालय ने इस राहत के साथ ही यह भी पूरी तरह साफ कर दिया है कि इस पूरे घोटाले और सजा के निलंबन से जुड़े जो भी बड़े संवैधानिक और कानूनी सवाल उठाए गए हैं, उन पर अभी कोई अंतिम मुहर नहीं लगाई गई है। अदालत का मानना है कि आधी सजा काटने के बाद जमानत मिलने के नियम और सीबीआई द्वारा उठाए गए तकनीकी बिंदुओं पर अभी और अधिक कानूनी विमर्श की आवश्यकता है। इसलिए, इन तमाम महत्वपूर्ण और संवेदनशील नीतिगत मुद्दों पर आने वाले दिनों में निर्धारित की जाने वाली अगली सुनवाइयों के दौरान दोनों पक्षों की मौजूदगी में बेहद विस्तार से और गहराई से विचार किया जाएगा।