भोपाल। त्योहारों के सीजन में ऑनलाइन शॉपिंग पर मिलने वाले आकर्षक ऑफर्स और डिस्काउंट के बीच साइबर अपराधियों ने ठगी का एक नया और चालाक जाल बिछा दिया है। अब ये शातिर ठग केवल सामान की खरीदारी के समय ही नहीं, बल्कि सामान वापस करने और उसका रिफंड प्राप्त करने के दौरान भी मासूम ग्राहकों को अपना निशाना बना रहे हैं। रिफंड के लंबे इंतजार से परेशान होकर ग्राहक जैसे ही सहायता के लिए इंटरनेट पर कस्टमर केयर नंबर की खोज शुरू करता है, ठग उसे अपने चंगुल में फंसाने का खेल शुरू कर देते हैं। कोई किसी मशहूर ई-कॉमर्स कंपनी से मिलती-जुलती फर्जी वेबसाइट बना लेता है, तो कोई खुद को कंपनी का प्रतिनिधि बताकर सीधे कॉल करता है। इसके बाद रिफंड दिलाने के नाम पर फर्जी लिंक भेजना, ओटीपी हासिल करना या फिर मोबाइल में संदिग्ध एप डाउनलोड करवाकर सीधे बैंक खातों पर डाका डाला जा रहा है। भोपाल में ही रिफंड और ऑनलाइन शॉपिंग के नाम पर धोखाधड़ी की 10 से अधिक नई शिकायतें दर्ज की जा चुकी हैं।
इस तरह से दिया जा रहा है ठगी की वारदातों को अंजाम
साइबर अपराधियों के काम करने का तरीका इतना शातिर होता है कि शुरुआती दौर में पीड़ित को किसी भी तरह के फ्रॉड का अहसास तक नहीं होता। ठग खुद को संबंधित ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म का अधिकृत अधिकारी बताकर बेहद पेशेवर अंदाज में बातचीत करते हैं। वे ग्राहक को झांसा देते हैं कि तकनीकी कारणों से उनका पैसा अटका हुआ है और रिफंड पाने के लिए एक छोटी-सी प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसके बाद व्हाट्सएप या मैसेज के जरिए एक लिंक भेजा जाता है और उस पर क्लिक करने के लिए कहा जाता है। कई मामलों में बैंक अकाउंट, डेबिट-क्रेडिट कार्ड विवरण और यूपीआई पिन हासिल करने की कोशिश की जाती है। इतना ही नहीं, कुछ ठग मोबाइल में कोई एपीके फाइल डाउनलोड करवाने या स्क्रीन शेयरिंग एप शुरू करवाने का निर्देश देते हैं। जैसे ही ग्राहक ऐसा करता है, उसके फोन की सारी निजी जानकारी और बैंकिंग गतिविधियों का नियंत्रण ठगों के हाथ में चला जाता है, जिससे पलक झपकते ही बड़ा आर्थिक नुकसान हो जाता है।
इंटरनेट सर्च में दिखने वाले हर नंबर पर न करें विश्वास
इस प्रकार के साइबर अपराधों का एक मुख्य जरिया फर्जी वेबसाइट्स और सर्च इंजन पर दिखने वाले गलत हेल्पलाइन नंबर भी हैं। ठग जानी-मानी कंपनियों के मिलते-जुलते नाम और लोगो का इस्तेमाल कर आकर्षक नकली वेबसाइटें तैयार करते हैं और उन पर अपने संपर्क नंबर डाल देते हैं। जब कोई ग्राहक रिटर्न या ऑर्डर से जुड़ी समस्या के समाधान के लिए इंटरनेट पर नंबर खोजता है, तो वह अनजाने में सीधे इन अपराधियों से जुड़ जाता है। इसके बाद ग्राहक को भरोसे में लेकर गोपनीय जानकारी हासिल की जाती है। इसलिए केवल किसी वेबसाइट पर कंपनी का नाम या लोगो देखकर उसे असली समझ लेना भारी पड़ सकता है। हेल्पडेस्क नंबर हमेशा संबंधित कंपनी के वेरिफाइड मोबाइल एप या आधिकारिक पोर्टल से ही लेना चाहिए।
सतर्कता और सावधानी ही है बचाव का मुख्य जरिया
इस प्रकार की धोखाधड़ी से सुरक्षित रहने के लिए ग्राहकों का जागरूक होना बेहद जरूरी है। किसी भी अधिकृत कंपनी की तरफ से रिफंड जारी करने के लिए किसी अनजान लिंक पर क्लिक करने, संदिग्ध एप इंस्टॉल करने या पैसे भेजने की मांग नहीं की जाती। यदि कोई व्यक्ति रिफंड के बदले पहले भुगतान करने, यूपीआई पिन दर्ज करने या ओटीपी साझा करने की बात करे तो तुरंत सतर्क हो जाएं। एडिशनल डीसीपी क्राइम ब्रांच शैलेंद्र सिंह चौहान ने भी आम नागरिकों को सचेत करते हुए कहा है कि ऑनलाइन खरीदारी और रिफंड के दौरान विशेष सतर्कता बरतें। रिफंड या रिटर्न प्रक्रिया के नाम पर कभी भी अपनी गोपनीय बैंकिंग जानकारी किसी से साझा न करें और केवल आधिकारिक एप या वेबसाइट का ही इस्तेमाल करें।









