बाबा महाकाल की दूसरी सवारी में उमड़ा आस्था का जनसैलाब, भगोरिया नृत्य ने बांधा समां

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उज्जैन: सावन माह के दूसरे सोमवार को महाकालेश्वर मंदिर से भगवान महाकाल की भव्य सवारी पूरी गरिमा और उत्साह के साथ निकाली गई। शाम लगभग 4 बजे भगवान चंद्रमौलेश्वर पालकी में सवार होकर अपनी प्रजा का हालचाल जानने के लिए नगर भ्रमण पर रवाना हुए। सवारी प्रस्थान करने से पूर्व मंदिर परिसर में पंडितों और पुजारियों ने मंत्रोच्चार के साथ भगवान का विधि-विधानपूर्वक पूजन किया। इस दौरान गूंजती बैंड-बाजे की मधुर ध्वनियों ने वातावरण को शिवभक्ति के रंग में रंग दिया।

सवारी में बिखरे लोक संस्कृति के रंग

इस बार महाकाल की सवारी में मालवा और निमाड़ की अनूठी लोक संस्कृति का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। झाबुआ और पेटलावद से आए जनजातीय कलाकारों ने ढोल-ताशों की थाप पर पारंपरिक भगोरिया नृत्य प्रस्तुत कर समां बांध दिया। इस सांस्कृतिक प्रस्तुति में महिला कलाकारों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया और अपनी लोक कला के जरिए बाबा के प्रति आस्था प्रकट की। सवारी मार्ग के दोनों ओर देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा। 'हर-हर महादेव' और 'जय श्री महाकाल' के गगनभेदी जयकारों से पूरी धर्मनगरी गुंजायमान हो उठी।

शिप्रा तट पर हुआ जलाभिषेक

भगवान चंद्रमौलेश्वर की पालकी लगभग ढाई किलोमीटर का मुख्य मार्ग तय करते हुए पावन शिप्रा नदी के तट रामघाट पहुंची। रामघाट पर विद्वान पुरोहितों ने मां शिप्रा के पवित्र जल से भगवान का अभिषेक कर विशेष आरती उतारी। पूजन-अर्चन का यह धार्मिक क्रम पूर्ण होने के बाद सवारी अपने तय रास्तों से होती हुई पुनः महाकाल मंदिर परिसर के लिए वापस लौट गई।

तड़के कपाट खुलते ही शुरू हुई भस्म आरती

सावन सोमवार के पावन अवसर पर मंदिर में श्रद्धालुओं का प्रवेश तड़के से ही शुरू हो गया था। रात 2:30 बजे महाकाल मंदिर के विशाल कपाट खोल दिए गए। परंपरा अनुसार सभा मंडप में स्थित शिवगण वीरभद्र जी के कान में स्वस्ति वाचन कर अनुमति ली गई, जिसके बाद मंदिर के चांदी के मुख्य द्वार खोले गए और कर्पूर आरती संपन्न हुई। इसके पश्चात नंदी हॉल में विराजमान भगवान नंदी का जलाभिषेक, ध्यान और पूजन किया गया।

पंचामृत अभिषेक और दिव्य श्रृंगार

प्रातःकालीन आरती के समय सबसे पहले बाबा महाकाल का शीतल जल से स्नान कराया गया। इसके बाद दूध, दही, देसी घी, शक्कर, शहद और ताजे फलों के रस से तैयार पंचामृत से भगवान का दिव्य अभिषेक हुआ। पूजन के पश्चात बाबा महाकाल का भांग, चंदन, सूखे मेवों और ताजे पुष्पों से नयनाभिराम श्रृंगार किया गया। इस दौरान उन्हें शेषनाग का रजत मुकुट, मुंडमाल, रुद्राक्ष की माला और त्रिशूल धारण कराया गया। अंत में महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा को भस्म अर्पित की गई और फल-मिष्ठान का महाभोग लगाया गया।

ओंकारेश्वर में दिखा भक्ति का उल्लास

सावन सोमवार और प्रदोष व्रत के दुर्लभ संयोग के कारण मध्य प्रदेश की दूसरी प्रसिद्ध शिवनगरी ओंकारेश्वर में भी भक्तों का भारी जमावड़ा रहा। नर्मदा तट पर स्थित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का विशेष महाश्रृंगार किया गया और भगवान को छप्पन भोग अर्पित किए गए। तड़के से ही नर्मदा स्नान कर श्रद्धालुओं ने ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर पुण्य लाभ कमाया।