आज भी विकास से दूर चंबल के गांव, न सड़क न इलाज; हर दिन चुनौतियों से जूझ रहे लोग

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चंबल: चंबल नदी के किनारे और बीहड़ों की गोद में बसे गांवों के हालात आज भी आजादी के दशकों बाद नहीं सुधरे हैं। ग्राम पंचायत वरेण्ड से करीब 6 किलोमीटर दूर चंबल के बीहड़ों में स्थित इन बस्तियों तक पहुँचना बरसात के दिनों में किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता है। स्थिति इतनी विकट होती है कि स्थानीय ग्रामीणों के साथ-साथ यहाँ पदस्थ शिक्षकों को भी कई-कई दिनों तक मीलों पैदल चलकर स्कूल पहुँचना पड़ता है।

किन गांवों में है सबसे ज्यादा परेशानी?

रिपोर्ट के मुताबिक, चंबल के तटवर्ती इलाकों में बसे झेंद, विरजापुरा, बेदपुरा, जुगरुआपुरा, आमुलीपुरा, होरावारा और मल्लपुरा सहित कई ऐसे गांव हैं जहाँ आज तक पक्की सड़क का नामोनिशान नहीं है। बरसात के मौसम में यहाँ के स्थानीय रास्ते, नाले और बीहड़ के मार्ग पूरी तरह जलमग्न या बाधित हो जाते हैं। इसका सबसे बुरा असर स्कूली बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है, और कई बार लगातार दो से तीन महीने तक बच्चे स्कूल नहीं पहुँच पाते हैं।

कागजी विकास और धरातल की हकीकत

ग्रामीणों का गंभीर आरोप है कि कागजों पर सीसी खरंजा और सड़क निर्माण जैसे कार्य पूर्ण दिखा दिए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। बाढ़ आने पर इन गांवों का संपर्क मुख्य शहरों और कस्बों से कई-कई दिनों के लिए पूरी तरह कट जाता है। इसके अलावा, बिजली आपूर्ति बाधित होने पर यहाँ 8 से 10 दिनों तक अंधेरा रहने की आम शिकायतें सामने आती हैं।

जच्चा-बच्चा की जान पर बना रहता है खतरा

क्षेत्र में सबसे भयावह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब किसी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होती है। पक्की सड़क और यातायात के साधनों के अभाव में एम्बुलेंस का इन गांवों तक पहुँचना असंभव होता है। ऐसे में कई बार मजबूरीवश महिलाओं का प्रसव घर पर ही कराना पड़ता है, जिससे जच्चा और बच्चा दोनों की जान पर हमेशा गंभीर खतरा मंडराता रहता है।

मोबाइल नेटवर्क और ई-अटेंडेंस की चुनौती

इन दूरदराज के इलाकों में कमजोर मोबाइल नेटवर्क के कारण शिक्षकों को भी ऑनलाइन ई-अटेंडेंस (E-Attendance) दर्ज करने में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। बारिश के मौसम में फिसलन भरे रास्तों और घने जंगलों से गुजरकर स्कूल पहुँचना शिक्षकों के लिए भी जोखिम भरा होता है, हालांकि उन पर हर हाल में समय पर उपस्थिति दर्ज कराने का पूरा दबाव रहता है।

पुनर्वास और ठोस कार्रवाई का इंतजार

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन द्वारा कई बार चंबल किनारे की बस्तियों को सुरक्षित स्थानों पर विस्थापित करने के दावे किए गए, लेकिन धरातल पर पुनर्वास के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। बाढ़ और लगातार भू-कटाव के कारण कई बस्तियां उजड़ चुकी हैं और लोग बीहड़ में छिटपुट रूप से दूर-दूर घर बनाकर रहने को मजबूर हैं।

स्थानीय नागरिकों का सवाल है कि आखिर कब तक इन इलाकों तक सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और सुरक्षित पुनर्वास जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुँचेंगी? ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि इन दुर्गम गांवों का शीघ्र सर्वे कराकर स्थायी मार्ग, स्वास्थ्य केंद्र और बाढ़ से सुरक्षित आवास की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।