भोपाल। राजधानी भोपाल में गणेश विसर्जन की स्थायी और पर्यावरण-अनुकूल व्यवस्था के लिए मंजूर की गई करोड़ों रुपये की योजना प्रशासनिक सुस्ती की भेंट चढ़ती दिख रही है। भोपाल नगर निगम द्वारा जुलाई 2025 में 25 करोड़ 8 लाख 55 हजार 101 रुपये का भारी-भरकम बजट स्वीकृत किए जाने के बावजूद, 14 महीने बीत जाने के बाद भी पांच में से चार स्थानों पर नए विसर्जन कुंडों का निर्माण कार्य शुरू तक नहीं हो सका है।
परिणामस्वरूप, इस वर्ष भी गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन पारम्परिक एवं पुराने घाटों पर ही कराने की विवशता बन गई है।
25 करोड़ के प्रोजेक्ट की वर्तमान स्थिति
नगर निगम के प्रस्ताव के अनुसार शहर के चारों कोनों को कवर करने के लिए 5 प्रमुख स्थानों पर स्थायी विसर्जन कुंड और संबंधित इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाना था:
| स्थान | स्वीकृत राशि | वर्तमान स्थिति |
|---|---|---|
| मालीखेड़ी | ₹2.49 करोड़ | कार्य लगभग पूर्ण |
| प्रेमपुरा | ₹7.34 करोड़ | काम शुरू नहीं हुआ |
| नीलबड़ | ₹6.01 करोड़ | काम शुरू नहीं हुआ |
| संजीव नगर | ₹4.77 करोड़ | काम शुरू नहीं हुआ |
| बरकतउल्ला विश्वविद्यालय | ₹4.45 करोड़ | काम शुरू नहीं हुआ |
निगम अधिकारियों द्वारा भूमि चिह्नित किए जाने के बाद भी निर्माण कार्य अटका हुआ है। गत वर्ष भी समय की कमी का हवाला देकर पुराने घाटों का उपयोग किया गया था, और इस वर्ष भी वही स्थिति दोहराई जा रही है। वर्तमान में निगम द्वारा प्रेमपुरा, कमलापति और खटलापुरा घाटों पर क्रेन, पोकलेन और 24 घंटे गोताखोरों की अस्थायी व्यवस्था की जा रही है।
पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता: जलस्रोतों पर गंभीर खतरा
पर्यावरणविद सुभाष सी. पाण्डेय के अनुसार, पीने के पानी के प्राथमिक जलस्रोतों में सीधे प्रतिमा विसर्जन राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की गाइडलाइंस का स्पष्ट उल्लंघन है।
जलीय जीवन पर संकट: मूर्तियों में इस्तेमाल होने वाला प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP), घातक रासायनिक रंग और डाइज़ पानी में घुलकर जलीय पारिस्थितिकी को नष्ट कर रहे हैं। इससे झीलों में मछलियों और कछुओं की मौत का खतरा बना रहता है।
भूजल प्रदूषण: जलस्रोतों में जमा होने वाला विषैला गाद आसपास के भूजल (Groundwater) को प्रदूषित कर सकता है, जो अंततः जनस्वास्थ्य को प्रभावित करता है।
CPCB की 2020 गाइडलाइन की अनदेखी: नियमों के अनुसार विसर्जन कुंडों में 'सिंथेटिक लाइनर' बिछाया जाना अनिवार्य है, ताकि विसर्जन के बाद अवशेषों को आसानी से बाहर निकालकर वैज्ञानिक रूप से निस्तारित किया जा सके। साथ ही, विसर्जन से पूर्व वस्त्र व आभूषण हटाने के नियम का कड़ाई से पालन होना चाहिए।
समाधान: 40 से 50 विसर्जन कुंडों की आवश्यकता
विशेषज्ञों का मानना है कि भोपाल जैसे 25 से 28 लाख की आबादी वाले शहर में विसर्जन के दबाव को बांटने के लिए शहर के विभिन्न हिस्सों में कम से कम 40 से 50 अलग-अलग विसर्जन कुंड बनाए जाने चाहिए। इससे:
मुख्य पेयजल जलस्रोतों पर विसर्जन का सीधा बोझ खत्म होगा।
आम नागरिकों को दूरस्थ घाटों तक नहीं जाना पड़ेगा।
त्यौहारों के दौरान शहर की यातायात व्यवस्था और पुलिस बल पर दबाव काफी हद तक कम होगा।







