इंदौर में कृषि शिक्षा का गौरवशाली इतिहास, 1924 में शुरू हुई थी पहल

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इंदौर। ब्रिक्स देशों के एग्रीकल्चर वर्किंग ग्रुप की बैठक का आयोजन इस शहर के कृषि क्षेत्र में छिपे ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्व को रेखांकित करता है। देश को स्वतंत्रता मिलने से काफी पहले ही इंदौर की तत्कालीन होलकर रियासत ने कृषि और इससे जुड़े उद्योगों को बढ़ावा देने में दूरंदेशी दिखाई थी। मालवा और निमाड़ अंचल में बड़े पैमाने पर होने वाली कपास की उत्कृष्ट पैदावार को देखते हुए वर्ष 1867 में यहां 'स्टेट कॉटन मिल' की नींव रखी गई थी। इसके बाद वर्ष 1909 में मालवा मिल सहित कुल सात सूती कपड़ा मिलें धीरे-धीरे अस्तित्व में आईं। इसी औद्योगिक जरूरत को पूरा करने और कृषि पद्धतियों को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से वर्ष 1924 में इंदौर में एक कृषि शिक्षण एवं अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई थी, जो आगे चलकर वर्ष 1959 में शासकीय कृषि महाविद्यालय के रूप में तब्दील हुआ।

होलकर शासकों का विजन और इंस्टिट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री का उदय

कपड़ा मिलों को उच्च गुणवत्ता वाला कच्चा माल (कपास) उपलब्ध कराने के लिए तत्कालीन महाराजा तुकोजीराव तृतीय ने वर्ष 1924 में 300 एकड़ बेशकीमती भूमि 99 वर्ष की लीज पर मात्र 300 रुपये सालाना किराए पर कृषि अनुसंधान के लिए दान कर दी थी। इसी भूमि पर 'इंस्टिट्यूट ऑफ… प्लांट इंडस्ट्री' की स्थापना हुई, जिसके पहले निदेशक के रूप में विदेशी विशेषज्ञ हॉवर्ड को नियुक्त किया गया। भारतीय केंद्रीय कॉटन कमेटी ने इस संस्थान के भवन निर्माण के लिए ₹3 लाख और अन्य खर्चों के लिए ₹1 लाख की वित्तीय सहायता दी थी। लालबाग पैलेस के गुलाब उद्यान और शहर के अन्य पार्कों की देखरेख के लिए विदेशी उद्यान विशेषज्ञ डब्ल्यू.एफ. विस्को की सेवाएं ली गईं, ताकि किसानों को खेती की उन्नत तकनीकों से अवगत कराया जा सके।

महात्मा गांधी का दौरा और विश्व प्रसिद्ध नगर नियोजक की रिपोर्ट

इस संस्थान की वैज्ञानिक साख इतनी मजबूत थी कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अप्रैल 1935 में अपनी दूसरी इंदौर यात्रा के दौरान विशेष रूप से इस परिसर का दौरा किया था। गांधी जी यहां के निदेशक एफ.के. जैक्सन के कार्यों से बेहद प्रभावित हुए और उन्होंने इस दौरान मल-मूत्र से जैविक खाद तैयार करने की वैज्ञानिक संभावनाओं पर व्यापक विचार-विमर्श किया था। इस ऐतिहासिक दौरे में उनके साथ मीरा बेन और महादेव देसाई भी मौजूद थे। इससे पूर्व, वर्ष 1818 में दुनिया के विख्यात नगर नियोजक सर पैट्रिक गिडीज ने अपनी इंदौर नगर नियोजन रिपोर्ट में एक आधुनिक 'कृषि संग्रहालय' का प्रस्ताव रखा था, जिसमें प्राचीन तौर-तरीकों के स्थान पर नए उपकरणों के प्रयोग और कृषि शिक्षा पर विशेष बल दिया गया था।

वैश्विक मंच पर इंदौर की धमक और ब्रिक्स संगठन का विस्तार

आज भी इंदौर का शासकीय कृषि महाविद्यालय हजारों युवाओं को कृषि विज्ञान की शिक्षा दे रहा है। इसके साथ ही वर्ष 2007 से रंगवासा में स्थापित जैविक ग्राम संस्थान और सनावदिया में डॉ. जनक पलटा मगिलिगन का 'जिम्मी मगिलिगन फाउंडेशन' प्राकृतिक व जैविक खेती के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अलख जगा रहे हैं। यही कारण है कि खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण-अनुकूल कृषि और किसान सशक्तिकरण जैसे गंभीर विषयों पर मंथन के लिए अंतरराष्ट्रीय संगठन ब्रिक्स (BRICS) ने इंदौर को चुना। ज्ञात हो कि वर्ष 2006 में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका द्वारा गठित इस समूह का हाल ही में विस्तार कर मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब को शामिल किया गया है, जिससे अब इसके सदस्य देशों की कुल संख्या 11 हो गई है।