भोपाल। देश में 25 जून 1975 को लगाए गए आपातकाल की बरसी पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने लोकतंत्र प्रहरियों को नमन करते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला दिन बताया है। उन्होंने कहा कि तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के अहंकार के कारण देश पर आपातकाल थोपा गया था, जिसने संविधान की आत्मा और लोकतांत्रिक मूल्यों को गंभीर आघात पहुंचाया। मुख्यमंत्री ने नागरिकों से लोकतंत्र की रक्षा और राष्ट्रसेवा के लिए निरंतर समर्पित रहने का संकल्प लेने का आह्वान किया। गौरतलब है कि केंद्र की भाजपा सरकार ने साल 2024 में 25 जून को हर वर्ष “संविधान हत्या दिवस” के रूप में मनाने की घोषणा की थी।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने लोकतंत्र सेनानियों को दी श्रद्धांजलि
आपातकाल की 51वीं बरसी पर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इसे भारतीय राजनीति का एक ऐसा काला अध्याय बताया जिसने देश के स्वाभिमान को गहरी चोट पहुँचाई थी। उन्होंने अपने संदेश में कहा, "इस विभीषिका के विरुद्ध डटकर खड़े होने वाले सभी लोकतंत्र योद्धाओं और प्रहरियों का देश सदैव ऋणी रहेगा। आइए, हम सब यह संकल्प लें कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए सदैव समर्पित होकर देश की सेवा करते रहेंगे।" मुख्यमंत्री ने आगे जोड़ा कि 25 जून 1975 को तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने संविधान की मूल भावना को पूरी तरह कुचल दिया था। उन्होंने यह भी भरोसा जताया कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नया भारत संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों को सर्वोच्च मानते हुए आगे बढ़ रहा है।
आपातकाल: भारतीय राजनीति का सबसे विवादित दौर
भारतीय इतिहास में 25 जून 1975 का दिन एक अमिट और विवादित मोड़ लेकर आया था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर देश में इमरजेंसी की घोषणा की गई थी। यह आपातकाल 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक (करीब 21 महीने) लागू रहा। इस दमनकारी दौर के दौरान:
देश के प्रमुख विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मुखर पत्रकारों को बिना शर्त गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया गया था।
मीडिया और प्रेस पर सख्त सेंसरशिप लागू कर दी गई थी, जिससे अभिव्यक्ति की आजादी पूरी तरह छिन गई थी।
आम नागरिकों को संविधान से मिलने वाली बुनियादी स्वतंत्रताओं और अधिकारों पर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया गया था।
अनुच्छेद 352 और लोकतंत्र की सीख
तकनीकी रूप से देश में यह आपातकाल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 (Article 352) के तहत आंतरिक अशांति के आधार पर घोषित किया गया था। राजनीतिक विश्लेषकों और इतिहासकारों का मानना है कि आपातकाल की ये ऐतिहासिक घटनाएं आज भी देश को लोकतंत्र के प्रति हमेशा सतर्क रहने की सीख देती हैं। उस दौर की कड़वी स्मृतियां हमें याद दिलाती हैं कि संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा और जिम्मेदारी होती है।









