“न स्मार्टफोन का चस्का, न सोशल मीडिया का नशा; फौजी के लाल ने JEE Advanced में गाड़ा झंडा, हासिल की ऑल इंडिया तीसरी रैंक”

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सीकर। कड़े परिश्रम, अटूट अनुशासन और अपने मुकाम को हासिल करने के जुनून की एक बेमिसाल इबारत लिखते हुए शेखावाटी के होनहार छात्र जतिन चाहर ने देश की सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा 'जेईई एडवांस्ड 2026' में ऑल इंडिया तीसरी (3rd) रैंक हासिल कर इतिहास रच दिया है। जतिन की इस कामयाबी की सबसे अनूठी और हैरान कर देने वाली बात यह है कि इस डिजिटल युग में भी उन्होंने आज तक कभी मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं किया और न ही किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनका कोई अकाउंट है।

बीएसएफ जवान के बेटे ने किया टॉप, मां के साथ रहकर की तैयारी

मूल रूप से झुंझुनूं जिले के गोठ गांव के रहने वाले जतिन पिछले कुछ समय से शिक्षा नगरी सीकर में अपनी मां मोनिका के साथ एक किराए के मकान में रहकर पढ़ाई कर रहे थे। जतिन के पिता दिनेश कुमार देश की सीमाओं की रक्षा में मुस्तैद सीमा सुरक्षा बल (BSF) में हेड कांस्टेबल के पद पर तैनात हैं। पिता की देश सेवा के जज्बे से प्रेरणा लेकर जतिन ने भी अपनी पढ़ाई को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया और आखिरकार देश के शीर्ष छात्रों में अपनी जगह बनाई।

स्मार्टफोन और सोशल मीडिया से बनाई दूरी, रोज 12 घंटे का कड़ा कूटनीति चक्र

देर रात जैसे ही आईआईटी मद्रास द्वारा जेईई एडवांस्ड के परिणाम जारी किए गए, जतिन का घर बधाइयों से गूंज उठा। अपनी अनूठी रणनीति का खुलासा करते हुए जतिन ने बताया कि मोबाइल और रील-शॉर्ट्स की दुनिया से पूरी तरह दूरी बनाए रखने की वजह से उनका ध्यान कभी नहीं भटका। वे रोजाना कोचिंग क्लासेस के अलावा 6 से 7 घंटे की सेल्फ स्टडी करते थे, जिससे उनकी कुल पढ़ाई हर दिन करीब 12 घंटे तक पहुंच जाती थी। जतिन का मानना है कि पढ़ाई के दौरान आने वाले किसी भी छोटे-बड़े संशय (डाउट) को वे उसी समय अपने फैकल्टी मेंबर्स से मिलकर हल कर लेते थे और जब तक टॉपिक पूरी तरह साफ नहीं होता था, तब तक आगे नहीं बढ़ते थे।

सफलता का पूरा श्रेय माता-पिता और गुरुजनों के त्याग को दिया

इस ऐतिहासिक गौरव का सेहरा जतिन ने अपनी मां के अटूट विश्वास और शिक्षकों के सही मार्गदर्शन के सिर बांधा है। उनकी मां मोनिका ने भावुक होते हुए बताया कि वे बेटे की पढ़ाई और मानसिक सेहत को लेकर लगातार उससे बातचीत करती थीं ताकि उस पर किसी तरह का दबाव न बने। वहीं सरहद पर तैनात पिता दिनेश कुमार ने कहा कि ड्यूटी की व्यस्तता के कारण वे भले ही जतिन के पास ज्यादा नहीं रह पाए, लेकिन जब भी छुट्टियों में घर आते थे, तो बेटे के भविष्य और उसकी पढ़ाई पर लंबी चर्चा करते थे। जतिन की इस स्वर्णिम सफलता ने साबित कर दिया है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो बिना किसी चमक-दमक के भी देश के सबसे ऊंचे शिखर पर पहुंचा जा सकता है।