सूअरों की मौत ने बढ़ाई चिंता, जांच में सामने आया अफ्रीकन स्वाइन फीवर

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रायपुर। छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले में 'अफ्रीकन स्वाइन फीवर' (African Swine Fever) के संक्रमण की पुष्टि के बाद प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है। भाटापारा विकासखंड के ग्राम टेहका स्थित एक निजी सूअर फार्म में इस महामारी के फैलने से अब तक 130 सूअरों की मौत हो चुकी है।

भोपाल स्थित केंद्रीय प्रयोगशाला से आई जांच रिपोर्ट में सभी नमूनों में अफ्रीकन स्वाइन फीवर वायरस की पुष्टि हुई है।

संक्रमण का घटनाक्रम और विभागीय कार्रवाई

  • शुरुआती लक्षण: ग्राम टेहका निवासी किसान समीर ध्रुव के सूअर फार्म में गत 30 अगस्त से पशु बीमार होने लगे थे, जिसके बाद 1 सितंबर से मौतें शुरू हुईं।

  • लैब जांच में पुष्टि: पशुधन विकास विभाग द्वारा 5 और 9 सितंबर को भेजे गए सैंपल की जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद कार्रवाई तेज की गई।

  • मास कलिंग (Culling): फार्म में 70 सूअरों की स्वाभाविक मौत के बाद शेष बचे 60 संक्रमित सूअरों को प्रोटोकॉल के तहत जहर का इंजेक्शन देकर वैज्ञानिक तरीके से निस्तारित किया गया।

10 किमी का दायरा निगरानी में, 6 महीने का प्रतिबंध

पशुधन विकास विभाग के उप संचालक डॉ. नरेंद्र सिंह ने स्पष्ट किया है कि यह बीमारी स्वाइन फ्लू से अलग है और केवल सूअरों को प्रभावित करती है। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सख्त कदम उठाए गए हैं:

  1. 1 किमी रेडियस में बैन: प्रभावित फार्म के 1 किलोमीटर के दायरे को हॉटस्पॉट चिह्नित कर सूअर पालन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है।

  2. 10 किमी का सर्विलांस जोन: आसपास के 10 किलोमीटर दायरे में आने वाले सभी सूअर फार्मों की गहन निगरानी की जा रही है।

  3. मुआवजा व रोक: नियमों के अनुसार प्रभावित फार्म संचालक को हुए नुकसान का मुआवजा दिया जाएगा, परंतु इस फार्म में अगले 6 महीनों तक किसी भी प्रकार के पशुपालन पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।

सुरक्षा मानकों और पारदर्शिता पर उठे सवाल

निस्तारण (Culling) अभियान के दौरान गंभीर लापरवाही और पारदर्शिता की कमी के आरोप भी सामने आए हैं:

  • पीपीई किट के बिना काम: मौके पर तैनात प्रशासनिक अधिकारी तो पीपीई किट (PPE Kit) में नजर आए, लेकिन संक्रमित सूअरों को ठिकाने लगा रहे फार्म के कर्मचारी बिना किसी सुरक्षा उपकरण के कार्य करते दिखे।

  • मीडिया पर रोक: कार्रवाई के दौरान नियमों का हवाला देकर मीडियाकर्मियों को मौके से दूर रखा गया, जिससे पूरे निस्तारण प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं।