रायपुर। मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की तर्ज पर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सटे अमलेश्वर में स्थित 'श्री महाकाल धाम' श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। वेद-पुराणों के अनुसार इस पावन धाम की महत्ता शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों से जुड़ी मानी जाती है। यहां दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर मुड़कर बहती खारून नदी इस स्वयंभू महाकाल क्षेत्र को और भी पवित्र बना देती है।
महाकाल का अर्धनारीश्वर से लेकर बाल रूप में श्रृंगार
अमलेश्वर के इस महाकाल धाम में भगवान शिव का नियमित रूप से कई मनमोहक रूपों में श्रृंगार किया जाता है। यहाँ महादेव के बाल रूप से लेकर अर्धनारीश्वर रूप तक के दिव्य दर्शन होते हैं। सुबह-शाम जागरण, भोग और शयन आरती के दौरान वैदिक मंत्रोच्चार के बीच छत्तीसगढ़ सहित अन्य राज्यों से बड़ी संख्या में कांवड़िए और श्रद्धालु खारून नदी में डुबकी लगाकर भगवान महाकाल के दर्शन करने पहुंचते हैं।
नारायण नागबली और अर्क-कुंभ विवाह के अनुष्ठान
इस धाम में विद्वानों के मार्गदर्शन में सभी प्रकार के धार्मिक और कार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए जाते हैं। पिछले 20 वर्षों से अनवरत जारी इस व्यवस्था के तहत पलाश विधि से नारायण नागबली और कालसर्प दोष निवारण पूजा की जाती है। इसके अलावा विवाह की बाधाएं दूर करने के लिए युवाओं का अर्क विवाह और कन्याओं का कुंभ विवाह भी शास्त्रोक्त विधि से कराया जाता है।
झाड़ियों और मिट्टी में दबा मिला था स्वयंभू शिवलिंग
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, अमलेश्वर का शिवलिंग स्वयंभू है। सौ वर्ष पूर्व घने जंगलों के बीच चूने की भट्ठियों में काम करने वाले मजदूर इसकी पूजा करते थे, जो बाद में मिट्टी में दब गया। साल 2004 में छत्तीसगढ़ के दानवीर दाऊ कल्याण सिंह के अग्रज अशोक अग्रवाल को स्वप्न में आदेश मिला। जिसके बाद खारून नदी के तट पर नीम के पेड़ के पास खुदाई कर इस शिवलिंग को पुनः प्रकट किया गया। जनवरी 2024 से इस भव्य दरबार को 'श्री महाकाल धाम अमलेश्वर' नाम दिया गया।
विंध्य पर्वत की तपस्या से जुड़ा है नाम का रहस्य
पौराणिक कथाओं के अनुसार, विंध्य पर्वत की 6 महीने की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग को दो भागों में विभक्त किया था—एक ओंकारेश्वर और दूसरा अमलेश्वर। संत कनकधारी स्वामी स्वदेशानंद के अनुसार 'अमलेश्वर' का अर्थ 'पाप रहित परमात्मा' होता है।
रुद्राक्ष की छांव में शनिदेव और महामाया विराजित
मंदिर के भव्य गर्भगृह में कैलाशपति शिव के साथ भगवान गणेश और महामाया चतुर्भुजी दुर्गा मां विराजित हैं। धाम के मुख्य द्वार पर नंदी महाराज और ठीक सामने अमलेश्वर क्षेत्र के अधिपति भगवान शनिदेव की अद्भुत प्रतिमा स्थापित है, जो रुद्राक्ष जैसे वृक्षों की शीतल छाया में इस प्रांगण को और भी अलौकिक बनाती है।









