पंचायत चुनाव पर सस्पेंस बढ़ा, 31 जुलाई की समयसीमा को लेकर BJP नेता के बयान से बवाल

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भीलवाड़ा। राजस्थान में लंबे समय से अटके पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों को लेकर सियासी पारा एक बार फिर चढ़ गया है। राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष और भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अरुण चतुर्वेदी के एक ताजा बयान ने नए विवाद को जन्म दे दिया है। भीलवाड़ा में केंद्र सरकार के कार्यकाल से जुड़े एक कार्यक्रम के दौरान चतुर्वेदी ने दावा किया कि प्रदेश में पंचायत और निकाय चुनाव अक्टूबर से दिसंबर 2026 के बीच संपन्न कराए जाएंगे। उनके इस बयान पर पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने तीखी आपत्ति जताई है। हाईकोर्ट में इस मामले के याचिकाकर्ता रहे लोढ़ा ने चतुर्वेदी के बयान को अदालत की अवमानना करार देते हुए उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की चेतावनी दी है।

संवैधानिक पद की गरिमा और कोर्ट के आदेश का हवाला

संयम लोढ़ा ने डॉ. अरुण चतुर्वेदी के बयान को गैर-जिम्मेदाराना बताते हुए कहा कि वे एक संवैधानिक पद पर आसीन हैं। ऐसे में उन्हें पता होना चाहिए कि राजस्थान हाईकोर्ट इस मामले में पहले ही बेहद कड़े निर्देश दे चुका है। अदालत ने राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग को आगामी 31 जुलाई तक हर हाल में चुनाव कराने का आदेश दिया है। लोढ़ा के अनुसार, कोर्ट की तय समय-सीमा के बावजूद नवंबर-दिसंबर में चुनाव कराने की बात कहना सीधे तौर पर सरकार को न्यायिक आदेशों की अवहेलना करने के लिए उकसाने जैसा है। उन्होंने इसे महज एक सियासी बयान मानने से इनकार करते हुए न्यायिक प्रक्रिया में सीधा दखल बताया है। उन्होंने मांग की है कि चतुर्वेदी 15 दिनों के भीतर अपना बयान वापस लेकर सार्वजनिक रूप से कोर्ट के आदेशों के सम्मान की बात कहें, अन्यथा उनके खिलाफ हाईकोर्ट में अवमानना का मुकदमा दर्ज कराया जाएगा।

हाईकोर्ट की डेडलाइन और सरकार की दलीलें

गौरतलब है कि राजस्थान में स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनाव काफी समय से टल रहे हैं। इस संबंध में दायर 439 जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पिछले साल 14 नवंबर 2025 को सरकार को 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव कराने की मोहलत दी थी। हालांकि, सरकार इस समय-सीमा में चुनाव नहीं करा सकी और उसने अदालत में तर्क दिया कि ओबीसी आरक्षण से जुड़ी प्रक्रियाएं और पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट आना अभी बाकी है। इस पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए अंतिम राहत के रूप में 31 जुलाई 2026 की नई डेडलाइन तय कर दी। साथ ही ओबीसी आयोग को 20 जून तक अपनी रिपोर्ट सौंपने का आदेश देते हुए साफ किया कि आयोग की देरी के कारण लोकतांत्रिक संस्थाओं के चुनावों को अनिश्चितकाल के लिए नहीं रोका जा सकता।

'वन स्टेट-वन इलेक्शन' का दावा और विपक्ष के आरोप

विवादित बयान को लेकर जब चर्चाएं तेज हुईं तो डॉ. अरुण चतुर्वेदी ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि सरकार और ओबीसी आयोग इस दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं। उनका इरादा "एक प्रदेश-एक चुनाव" की तर्ज पर अक्टूबर से दिसंबर के बीच सभी स्थानीय चुनाव कराने का है, हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि अंतिम फैसला और तारीखों का एलान करना राज्य निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है। दूसरी ओर, कांग्रेस सहित पूरा विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को घेरने में जुटा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि भाजपा अपनी संभावित राजनीतिक हार के डर से और "वन स्टेट-वन इलेक्शन" का बहाना बनाकर जानबूझकर इन चुनावों को टाल रही है, जबकि सरकार का कहना है कि बिना आरक्षण प्रक्रिया पूरी किए निष्पक्ष चुनाव कराना मुमकिन नहीं है।