अजमेर दरगाह मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को होगी

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अजमेर। ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह में हिंदू मंदिर होने के दावों को लेकर चल रहे कानूनी विवाद में स्थानीय अदालत ने एक बड़ा और निर्णायक आदेश दिया है। सिविल न्यायाधीश एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट (अजमेर पश्चिम) की अदालत ने 'भगवान श्री संकटमोचन व अन्य बनाम दरगाह कमेटी' मामले की सुनवाई करते हुए कई नए संगठनों और व्यक्तियों को पक्षकार बनाने की अनुमति दे दी है, जिससे इस हाई-प्रोफाइल मामले में कानूनी हलचल और तेज हो गई है।

अदालत ने इन्हें बनाया मामले का हिस्सा

न्यायालय ने मामले की व्यापकता को देखते हुए हिंदू सेना के विष्णु गुप्ता और राजवर्धन सिंह परमार को वादी (शिकायतकर्ता) पक्ष में शामिल करने की मंजूरी दी है। वहीं, प्रतिवादी पक्ष (बचाव पक्ष) के रूप में दरगाह से जुड़ी प्रमुख संस्थाओं को शामिल किया गया है, जिनमें:

  • दीवान सैयद जैनुल आबेदीन

  • अंजुमन यादगार चिश्तियां शेखजादगान

  • मोईनिया फखरिया चिश्ती खुद्दाम सैयदजादगान

  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और अल्पसंख्यक विभाग (दरगाह कमेटी)

अदालत का मानना है कि मामले की संवेदनशीलता और प्रकृति को देखते हुए सभी संबंधित पक्षों को सुना जाना न्यायसंगत होगा।


9 आवेदनों को किया खारिज, लगाया 2.70 लाख का जुर्माना

सुनवाई के दौरान अदालत ने उन लोगों के प्रति सख्त रुख अपनाया जिन्होंने बिना किसी ठोस आधार के पक्षकार बनने के लिए आवेदन किया था। न्यायालय ने इसे समय की बर्बादी करार देते हुए 9 आवेदकों के प्रार्थना पत्र खारिज कर दिए। अनुशासन कायम रखने के लिए अदालत ने प्रत्येक पर 30-30 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। जुर्माने की यह कुल 2.70 लाख रुपये की राशि जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा करानी होगी।


अगली सुनवाई अब 22 जुलाई को

अदालत ने वादी पक्ष को निर्देशित किया है कि वे संशोधित दस्तावेज तैयार कर नए पक्षकारों को उपलब्ध कराएं। फिलहाल, 'आदेश 7 नियम 11 सीपीसी' (वाद की पोषणीयता) से जुड़ी बहस पूरी हो चुकी है। अब अन्य लंबित तकनीकी पहलुओं पर अगली सुनवाई 22 जुलाई को तय की गई है। धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील माने जा रहे इस विवाद पर अब पूरे देश की कानूनी विशेषज्ञों की निगाहें टिकी हुई हैं।