मानवाधिकार कार्यकर्ता पर हमले का मामला, अदालत ने दोषी सैनिकों को सुनाई सजा

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जकार्ता (इंडोनेशिया): इंडोनेशिया की एक सैन्य अदालत ने देश के एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार वकील पर जानलेवा तेजाब (एसिड) हमला करने के जुर्म में सेना के चार जवानों को दोषी करार देते हुए जेल की सजा सुनाई है। पीड़ित एक्टिविस्ट ने घटना से कुछ समय पहले सेना के राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर एक डिजिटल पॉडकास्ट किया था, जिससे नाराज होकर सैनिकों ने इस बर्बर वारदात को अंजाम दिया था। इस एसिड अटैक में एक्टिविस्ट बुरी तरह झुलस गए थे।

देश की शीर्ष खुफिया एजेंसी में तैनात थे चारों हमलावर

दोषी पाए गए सैनिकों में नौसेना के तीन मरीन- सार्जेंट एडी सुडार्को, फर्स्ट लेफ्टिनेंट बुधी हरियांतो विधी काह्योंनो, कैप्टन नंदाला ड्वी प्रासेत्या और वायु सेना के अधिकारी लेफ्टिनेंट सामी लक्का शामिल हैं। ये चारों इंडोनेशियाई राष्ट्रीय सशस्त्र बल की बेहद संवेदनशील खुफिया इकाई (इंटेलिजेंस एजेंसी) में तैनात थे। अदालत ने इन चारों को एक्टिविस्ट एंड्री यूनुस पर घात लगाकर हमला करने का मुख्य आरोपी माना है।

पॉडकास्ट में सेना के बढ़ते प्रभाव को उजागर करने पर मिली सजा

पीड़ित एंड्री यूनुस 'कमीशन फॉर द डिसअपियर्ड एंड विक्टिम्स ऑफ वायलेंस' (KontraS) नामक प्रतिष्ठित मानवाधिकार संस्था के वरिष्ठ सदस्य हैं। उन्होंने अपने एक पॉडकास्ट कार्यक्रम में इंडोनेशियाई हुकूमत और नागरिक व्यवस्था पर सेना के अत्यधिक प्रभाव की तीखी आलोचना की थी। इसी बात से खुन्नस खाकर चारों खुफिया अधिकारियों ने उनके खिलाफ साजिश रची। जब 27 वर्षीय यूनुस वाहन चलाकर जा रहे थे, तभी मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने उनके चेहरे पर एसिड फेंक दिया। इस कायराना हमले में यूनुस का चेहरा बुरी तरह झुलस गया और उनकी दाहिनी आंख की रोशनी हमेशा के लिए चली गई।

अदालत ने कहा- 'सैनिकों ने सेना की छवि को पहुंचाई ठेस'

जकार्ता की सैन्य अदालत की तीन सदस्यीय जजों की पीठ ने आरोपियों को निम्नलिखित सजा सुनाई:

  • सार्जेंट एडी सुडार्को: 3 वर्ष की सश्रम जेल।

  • लेफ्टिनेंट काह्योंनो: ढाई वर्ष की कैद।

  • कैप्टन प्रासेत्या: 2 वर्ष की जेल।

  • लेफ्टिनेंट सामी लक्का: 18 महीने के कारावास की सजा।

फैसला सुनाते हुए सैन्य न्यायाधीश फ्रेडी इस्नार्टांतो ने सख्त लहजे में कहा, "देश की सेना का हिस्सा होने के बावजूद, आरोपियों ने एक नागरिक पर जानबूझकर तेजाब फेंककर अपने दायित्वों और देश के भरोसे के साथ गद्दारी की है। इस कृत्य से इंडोनेशियाई सेना की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगा है और पीड़ित को जीवनभर की असहनीय शारीरिक व मानसिक पीड़ा मिली है।"

न्याय प्रणाली पर उठे सवाल: मानवाधिकार संगठनों ने बताया 'दिखावा'

इस अदालती फैसले के बाद वैश्विक और स्थानीय मानवाधिकार संगठनों ने असंतोष जाहिर किया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडोनेशिया ने इस पूरी न्यायिक प्रक्रिया को महज एक दिखावा करार देते हुए कहा कि सरकारी वकीलों ने बेहद कम सजा (ढाई साल) की मांग की थी। संगठनों का आरोप है कि इस हमले के पीछे सेना के कुछ बेहद रसूखदार और उच्च पदों पर बैठे मास्टरमाइंड शामिल हैं, जिन्हें बचाने के लिए जांच को दबा दिया गया।

इंडोनेशियाई मानवाधिकार आयोग (Komnas HAM) की स्वतंत्र जांच रिपोर्ट में भी यह बात सामने आई है कि यह हमला पूरी तरह से सुनियोजित (वेल-प्लान्ड) और बकायदा फंडेड था, जिसकी सिविल कोर्ट (नागरिक अदालत) में दोबारा निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि पर्दे के पीछे छिपे असली गुनहगार बेनकाब हो सकें।