दतिया: हमारे बुंदेलखंड के तीन शहरों की तासीर बताने वाली यह बहुत पुरानी कहावत है। मगर आज चर्चा सिर्फ दतिया की करेंगे, क्योंकि यहां उपचुनाव हो रहा है और दतिया के ‘दादा’ कहे जाने वाले नरोत्तम मिश्रा को ही साइडलाइन कर दिया गया है। यही वजह है कि इस छोटे से चुनाव पर देश और प्रदेश, दोनों की निगाहें टिकी हैं। हालांकि ‘जेन जी जंतर-मंतर’ के सफल आंदोलन के बाद इन उपचुनावों की अहमियत और भी बढ़ गई है।
दिल्ली के आंदोलन का असर और किले की राजनीति
वैसे दतिया की आबोहवा में भी यही सवाल घूम रहा है कि दतिया से साढ़े चार सौ किलोमीटर दूर दिल्ली में हुआ आंदोलन क्या इस चुनाव पर भी असर डाल रहा है। दतिया शहर के ठीक बीचों-बीच बना प्रतापगढ़ किला वैसे तो महाराजा दलपत राव ने करीब आठ सौ साल पहले बनवाया था, जहां आज कांग्रेस प्रत्याशी कुंवर घनश्याम सिंह रहते हैं। मगर किले के मुख्य प्रवेश द्वार पर जिस तरह छोटी-बड़ी दुकानों का अतिक्रमण है, उससे साफ हो जाता है कि यह किला यहां रहने वाले राजा-महाराजाओं की प्राथमिकता नहीं रहा है। किले के भीतर लोहे की कीलों से जड़े विशाल राजगढ़ दरवाजे और पास रखी विशाल तोप पुराने वैभव की याद तो दिलाते हैं, लेकिन दरवाजा पार करते ही बड़ा बाजार बता देता है कि किले की शान-शौकत पर बाजार हावी हो चुका है।
बदले राजनीतिक समीकरण और नरोत्तम मिश्रा का फैक्टर
मध्य प्रदेश की राजनीति के कद्दावर नेता और पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा छह बार विधायक रहे हैं, जिनमें तीन बार दतिया से चुने गए हैं। मगर बीजेपी ने ऐन वक्त पर फैसला बदलते हुए उनकी टिकट काट दी और आरएसएस पृष्ठभूमि के कार्यकर्ता आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बना दिया। इसके बाद नरोत्तम समर्थकों ने आपा खो दिया और शहर से गुजरने वाले हाईवे को करीब आठ घंटे तक जाम रखा। नामांकन के बाद हुई सभा में नरोत्तम मिश्रा मंच से भावुक होकर रो पड़े, हालांकि उन्होंने कहा कि उनके आंसू पुलिसिया अत्याचार के खिलाफ थे। इस चुनाव में नरोत्तम मिश्रा अपने आप में एक बड़ा मुद्दा बने हुए हैं, जिसे बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही नजरअंदाज नहीं कर पा रही हैं।
चुनावी मैदान में दलों की रणनीतियां और तीसरा कोण
बीजेपी ने सतर्कता बरतते हुए चुनाव अभियान की बड़ी जिम्मेदारियां बाहर से आए भरोसेमंद नेताओं को सौंप रखी हैं, वहीं कांग्रेस की ओर से भी जीतू पटवारी और उमंग सिंघार जैसे नेता पूरी ताकत झोंक रहे हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों की नाराजगी उसे फायदा पहुंचा सकती है। इसके अलावा, आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव इस मुकाबले का तीसरा कोण बनकर उभरे हैं, जो 10 से 12 हजार वोट हासिल कर दोनों दलों का समीकरण बिगाड़ सकते हैं। दतिया के लोग फिलहाल खामोश हैं और असली तस्वीर 30 जुलाई को होने वाले मतदान और 3 अगस्त की मतगणना के बाद ही साफ होगी।








