हिंद महासागर में सुरक्षा से साइबर खतरों तक, भारत-आसियान ने रक्षा सहयोग बढ़ाने का बनाया प्लान

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नई दिल्ली| नई दिल्ली में आयोजित 'आसियान-भारत रक्षा थिंक टैंक फोरम' को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत और आसियान देशों के बीच रक्षा संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए संयुक्त शोध, तकनीकी साझेदारी और समुद्री सुरक्षा में मिलकर काम करने का एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पेश किया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद, साइबर अपराध, समुद्री सुरक्षा की चुनौतियों और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए सभी देशों को एकजुट होकर काम करना होगा। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि फोरम की चर्चा केवल विचारों तक सीमित न रहे, बल्कि ऐसे व्यावहारिक सुझाव सामने आएं, जिन्हें सरकारें और रक्षा संस्थान मिलकर प्रभावी ढंग से लागू कर सकें।

सदियों पुराने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध

रक्षा मंत्री ने रेखांकित किया कि भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच संबंध सदियों पुराने और बेहद प्रगाढ़ हैं। प्राचीन काल में बंगाल की खाड़ी के समुद्री मार्गों से दोनों क्षेत्रों के बीच व्यापार, ज्ञान, कला और संस्कृति का निरंतर आदान-प्रदान होता रहा है। चोल और पल्लव जैसे महान भारतीय राजवंशों के भी इस पूरे क्षेत्र से मजबूत समुद्री और व्यापारिक संबंध थे। उन्होंने कहा कि यही हमारी समृद्ध साझा विरासत आज पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता और विकास का एक मजबूत आधार बनी हुई है।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आसियान की केंद्रीय भूमिका

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत की 'एक्ट ईस्ट नीति' (Act East Policy) और 'सागर' (SAGAR) परिकल्पना खुले, समावेशी और बहुध्रुवीय सहयोग को बढ़ावा देती है। इस पूरी रणनीति में आसियान देश भारत की हिंद-प्रशांत नीति के केंद्र में स्थित हैं। उन्होंने 'आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक-प्लस' (ADMM-Plus) जैसे बहुपक्षीय मंचों को और अधिक सशक्त बनाने पर जोर दिया। इसके साथ ही उन्होंने सभी सदस्य देशों से संप्रभुता का सम्मान करने, अंतरराष्ट्रीय नियमों व कानूनों का पालन करने और किसी भी तरह के मतभेदों को आपसी बातचीत व कूटनीति के जरिए सुलझाने की अपील की।

वर्ष 2026 को आसियान-भारत समुद्री सहयोग वर्ष के रूप में प्राथमिकता

रक्षा मंत्री ने कहा कि हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया के समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और आवश्यक सामग्रियों के परिवहन के दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने वर्ष 2026 को 'आसियान-भारत समुद्री सहयोग वर्ष' बताते हुए यह प्रस्ताव दिया कि:

  • दोनों क्षेत्रों के बीच समुद्री सूचनाओं का आदान-प्रदान बढ़ाया जाए।

  • नौसेनाओं और तटरक्षक बलों के बीच रणनीतिक तालमेल मजबूत किया जाए।

  • संयुक्त खोज और बचाव अभ्यास (Search and Rescue Exercises) आयोजित किए जाएं। इसके साथ ही उन्होंने समुद्री डकैती, अवैध तस्करी, गैर-कानूनी ढंग से मछली पकड़ने और महत्वपूर्ण समुद्री ढांचागत परिसंपत्तियों की सुरक्षा पर एकजुट होकर काम करने की आवश्यकता जताई।

ड्रोन और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में संयुक्त शोध

रक्षा तकनीक में आ रहे तेजी से बदलावों पर चर्चा करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ड्रोन तकनीक, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष आधारित प्रणालियां आधुनिक रक्षा क्षेत्र का नक्शा बदल रही हैं। वर्तमान समय में कम लागत वाले ड्रोन महंगे रक्षा तंत्रों के सामने बड़ी चुनौती प्रस्तुत कर रहे हैं, इसलिए किफायती और सटीक रक्षा समाधान विकसित करना बेहद जरूरी है।

उन्होंने भारत की 'iDEX' पहल और 'तकनीकी विकास कोष' (Technology Development Fund) का उल्लेख करते हुए भारतीय और आसियान स्टार्टअप्स, प्रमुख विश्वविद्यालयों व शोध संस्थानों के बीच संयुक्त अनुसंधान परियोजनाओं, तकनीकी परीक्षणों और युवा शोधकर्ताओं के आदान-प्रदान का प्रस्ताव दिया।

रक्षा सामग्री की खरीद से आगे बढ़कर संयुक्त विनिर्माण पर जोर

राजनाथ सिंह ने स्पष्ट किया कि 'आत्मनिर्भर भारत' का अर्थ दुनिया से अलग-थलग पड़ना नहीं है, बल्कि घरेलू क्षमताओं को मजबूत कर वैश्विक स्तर पर सहयोग बढ़ाना है। भारत आसियान देशों की आवश्यकताओं के अनुसार उन्नत गश्ती जहाजों, रडार प्रणालियों, वायु रक्षा प्रणालियों, हेलीकॉप्टरों और ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में सहयोग प्रदान करने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि यह साझेदारी केवल सैन्य उपकरणों की खरीद-बिक्री तक सीमित न रहकर संयुक्त विकास, उत्पादन, रखरखाव, प्रशिक्षण और दीर्घकालिक तकनीकी सहायता के स्तर तक विस्तारित होनी चाहिए, जिससे स्थानीय उद्योगों को भी बढ़ावा मिले।