रसोई में बड़ा बदलाव, पानी से बनेगी हाइड्रोजन गैस; भारत में तैयार हुआ नया स्टोव

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नई दिल्ली | एलपीजी की लगातार बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच खाना पकाने के लिए अब एक नया और अत्याधुनिक विकल्प देश के सामने आ रहा है। भारत में अब सामान्य पानी से हाइड्रोजन गैस तैयार कर उससे गैस स्टोव और चूल्हे चलाने की अनूठी तकनीक पर काम शुरू हो चुका है। फरीदाबाद की ग्रीनवाइज समेत कई तकनीकी कंपनियां ऐसे हाइड्रोजन स्टोव विकसित कर रही हैं। हालांकि, इनकी शुरुआती कीमत और लंबे समय तक इस्तेमाल से जुड़े रख-रखाव की जानकारी अभी आम लोगों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है, लेकिन पारंपरिक सिलेंडरों की झंझट से मुक्ति पाने के लिए यह एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है।

सिलेंडर की लंबी लाइनों और महंगाई से राहत

बिहार के वैशाली जिले के रहने वाले विकास कुमार का अनुभव इस बदलाव का एक सीधा उदाहरण है। एलपीजी की कम आपूर्ति के दौरान जब उन्हें एक सिलेंडर के लिए भारी-भरकम कीमत चुकानी पड़ी और लंबी कतारों में घंटों खड़ा होना पड़ा, तब उन्होंने हर महीने की इस भागदौड़ से स्थायी रूप से छुटकारा पाने का फैसला किया। उन्होंने फरीदाबाद के एक टेक स्टार्टअप द्वारा तैयार किया गया पानी से चलने वाला हाइड्रोजन स्टोवटॉप खरीदा। अब वे किसी भी गैस सिलेंडर के बिना अपने घर में रोज का खाना बेहद आसानी से पका रहे हैं।

किस तरह काम करता है यह हाइड्रोजन स्टोव?

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो हाइड्रोजन ब्रह्मांड में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, लेकिन यह पानी के रूप में संयुक्त अवस्था में पाई जाती है। इस स्टोव के भीतर एक विशेष इन-बिल्ट पीएम यानी प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन इलेक्ट्रोलाइजर लगा होता है, जो पूरी प्रक्रिया को संचालित करता है:

  • पानी भरना: सबसे पहले स्टोव में बने टैंक में सामान्य पानी डाला जाता है।

  • बिजली से अलगाव: इलेक्ट्रोलाइजर बिजली की मदद से पानी के अणुओं को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन गैस में अलग कर देता है।

  • सुरक्षा मानक: हाइड्रोजन गैस बनने के बाद वह बफर टैंक और मल्टी-स्टेज फ्लेम बैक अरेस्टर जैसे उन्नत सुरक्षा उपायों से गुजरती है।

  • स्वच्छ लौ: महज तीस सेकंड के भीतर हाइड्रोजन बर्नर तक पहुंच जाती है और पूरी तरह साफ व धुआं-रहित नीली लौ के साथ जलने लगती है।

इस पूरी तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसे जलाने पर किसी भी प्रकार का जहरीला धुआं या कार्बन पैदा नहीं होता, बल्कि उप-उत्पाद के रूप में केवल शुद्ध जलवाष्प निकलती है।

आईआईटी बॉम्बे का सफल प्रयोग और लद्दाख में सेना की रसोई

इस स्वदेशी तकनीक को धरातल पर मजबूत बनाने में देश के प्रतिष्ठित संस्थानों की बड़ी हिस्सेदारी है। आईआईटी बॉम्बे के ऊर्जा विज्ञान विभाग ने हाल ही में पच्चीस किलोवाट क्षमता वाली सौर ऊर्जा से संचालित ग्रीन हाइड्रोजन इकाई का सफल प्रदर्शन किया था। इस सिस्टम के माध्यम से प्रतिदिन ढाई से तीन किलो ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन किया गया, जिससे संस्थान की कैंटीन में रोज दो सौ से ढाई सौ लोगों का खाना आसानी से तैयार किया गया।

इसके अलावा, इस तकनीक को व्यावसायिक पहचान तब मिली जब ग्रीनवाइज स्टार्टअप ने अपने पहले हाइड्रोजन स्टोव भारतीय सेना को सौंपे। वर्तमान में यह तकनीक जम्मू और लद्दाख के अत्यधिक ऊंचाई वाले और दुर्गम सैन्य इलाकों में पूरी तरह सफलतापूर्वक उपयोग में लाई जा रही है। इसके साथ ही, मेघालय जैसे राज्यों में रेस्टोरेंट संचालित करने वाले कमर्शियल उपयोगकर्ता भी इसे पारंपरिक एलपीजी की तुलना में कहीं अधिक तेज और सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं।

कीमत से जुड़ी चुनौतियां और भविष्य की राह

फिलहाल इस नई तकनीक को अपनाना हर आम भारतीय के बजट के लिहाज से थोड़ा महंगा जरूर है। वर्तमान में घरेलू मॉडल, जिसमें तीन लीटर का टैंक होता है, उसके सिंगल बर्नर स्टोव की कीमत लगभग एक लाख पांच हजार रुपए और डबल बर्नर की कीमत डेढ़ लाख रुपए तक है। वहीं, व्यावसायिक यानी कमर्शियल उपयोग वाले मॉडल की कीमत करीब साढ़े तीन लाख रुपए है।

विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती और एक एक्सक्लूसिव उत्पाद होने के कारण इसकी निर्माण लागत अधिक है। आने वाले समय में जब बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन शुरू होगा, तो इसकी कीमतें तेजी से नीचे आएंगी। भारत सरकार के नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के अंतर्गत वर्ष 2030 तक पचास लाख टन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है, जिसके तहत इस सेक्टर को बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया जा रहा है। नीदरलैंड्स की कंपनियों के साथ हुए रणनीतिक समझौतों के जरिए भारत को हाइड्रोजन कुकस्टोव का ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की भी पूरी तैयारी चल रही है। आने वाले दिनों में इसमें एआई और आईओटी तकनीक जोड़कर इसे वाई-फाई व मोबाइल ऐप आधारित स्मार्ट स्टोव बनाने का लक्ष्य है, साथ ही मालदीव जैसे पड़ोसी देशों को इसके अंतरराष्ट्रीय निर्यात की शुरुआत भी की जा रही है।