नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक प्रेरक संस्कृत सुभाषित साझा करते हुए जीवन में धैर्य और निरंतर कर्म के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने अपने संदेश के जरिए यह स्पष्ट किया कि विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य को संयम और धैर्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। सतत प्रयास और अटूट धैर्य के बल पर प्रतिकूल परिस्थितियों को भी अपने अनुकूल बदला जा सकता है।
एक्स पर साझा किया प्रेरक संस्कृत श्लोक
प्रधानमंत्री ने अपने आधिकारिक पोस्ट में संस्कृत का एक प्रसिद्ध सुभाषित "त्याज्यं न धैर्यं विधुरेऽपि दैवे धैर्यात्कदाचित्स्थितिमाप्नुयात्सः। याते समुद्रेऽपि च पोतभङ्गे सांयात्रिको वाञ्छति कर्म एव।।" साझा किया। इसका हिंदी भावार्थ समझाते हुए उन्होंने लिखा कि जब भाग्य साथ न दे रहा हो, तब भी व्यक्ति को धैर्य बनाए रखना चाहिए। जिस तरह समुद्र के बीचों-बीच जहाज के क्षतिग्रस्त होने पर भी एक कुशल नाविक हिम्मत हारने के बजाय जीवित रहने के लिए तैरने का प्रयास जारी रखता है, ठीक उसी तरह कठिन से कठिन समय में भी मनुष्य को निरंतर कर्म करते रहना चाहिए।
सुभाषितों के जरिए लगातार दे रहे नैतिक संदेश
प्रधानमंत्री मोदी पिछले कुछ समय से लगातार संस्कृत के सुभाषितों के माध्यम से देशवासियों के साथ सामाजिक और नैतिक संदेश साझा कर रहे हैं। इससे पूर्व 29 जुलाई को गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर उन्होंने गुरु के महत्व को रेखांकित करते हुए एक श्लोक पोस्ट किया था। उसमें उन्होंने लिखा था कि गुरु केवल ज्ञान का प्रसार ही नहीं करते, बल्कि अपने शिष्यों में सकारात्मक ऊर्जा, सद्विचार और उत्तम संस्कारों का बीजारोपण भी करते हैं। उस श्लोक में गुरु के छह विभिन्न स्वरूपों—प्रेरणा, मार्गदर्शक, शिक्षा और आत्मबोध—का उल्लेख किया गया था।
पर्यावरण और प्रकृति संरक्षण पर भी केंद्रित रहा संदेश
इसी श्रृंखला में 28 जुलाई को प्रधानमंत्री ने प्रकृति संरक्षण और भारतीय संस्कृति के पर्यावरण-प्रेमी दृष्टिकोण को लेकर एक अन्य संस्कृत सुभाषित साझा किया था। उन्होंने कहा था कि प्रकृति का सम्मान और उसका संरक्षण करने में ही संपूर्ण मानवता का हित निहित है। प्रकृति, ऋतुओं और धर्म के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीना ही मानव जीवन में सुख, सुरक्षा और वास्तविक समृद्धि का मूल आधार है।









