कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में आयोजित एक विशेष बौद्धिक मंच पर अपने संबोधन के दौरान निर्वासित बांग्लादेशी साहित्यकार तस्लीमा नसरीन ने पड़ोसी देश में जारी धार्मिक और सामाजिक परिस्थितियों पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने बांग्लादेश में निवास करने वाले हिंदू समुदाय की सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पारंपरिक शिक्षण संस्थानों की भूमिका पर बेबाक टिप्पणियां कीं। तस्लीमा नसरीन ने आरोप लगाया कि बांग्लादेश की बदलती राजनीतिक व्यवस्थाओं के बावजूद वहां अल्पसंख्यकों पर अत्याचारों का सिलसिला थमा नहीं है। उन्होंने वर्तमान अंतरिम प्रशासन के प्रमुख मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल के दौरान भी हिंदू आबादी के उत्पीड़न की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की।
पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चिंता और बुनियादी शिक्षा सुधार की अपील
सार्वजनिक संबोधन में अपनी बात रखते हुए तस्लीमा नसरीन ने वैश्विक समुदाय से एक विशेष आग्रह किया। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के इतिहास में हिंदुओं के प्रति अन्याय और दमन की घटनाएं पहले भी घटित होती रही हैं और वर्तमान समय में भी इस स्थिति में कोई ठोस सुधार नहीं आया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में भी अल्पसंख्यक समाज उत्पीड़न झेलने को विवश है। उनके अनुसार, इस तरह की संकीर्ण मानसिकता और कट्टरपंथी सोच को जड़ से मिटाने के लिए देश की आधारभूत शिक्षा प्रणाली में सुधार लाना सबसे अनिवार्य कदम है।
पश्चिम बंगाल आगमन पर जताई प्रसन्नता और अभिव्यक्ति की आजादी पर रखी राय
लंबे अंतराल के बाद कोलकाता आगमन पर अपनी असीम प्रसन्नता जाहिर करते हुए तस्लीमा नसरीन ने भारत की विभिन्न सरकारों के रुख का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अतीत में एक सरकार ने उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर किया, दूसरी सरकार ने प्रवेश की अनुमति नहीं दी, जबकि वर्तमान व्यवस्था ने उन्हें भारत आने का अवसर प्रदान किया। उन्होंने विभिन्न सरकारों की नीतियों में अंतर को रेखांकित करते हुए उम्मीद जताई कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और वैचारिक मतभेदों का सदैव सम्मान करेंगी।
पारंपरिक शिक्षण व्यवस्था को आधुनिक स्कूलों में बदलने की मांग और वैचारिक पृष्ठभूमि
संबोधन के अंतिम भाग में तस्लीमा नसरीन ने धार्मिक शिक्षण संस्थानों के संदर्भ में अपनी बात रखते हुए कहा कि मदरसों की व्यवस्था को समाप्त कर उन्हें पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक विद्यालयों में रूपांतरित कर दिया जाना चाहिए। उनका दृढ मत था कि शिक्षा का मूल उद्देश्य आने वाली पीढ़ी को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रगतिशील विचार और आधुनिक मूल्य प्रदान करना होना चाहिए। उल्लेखनीय है कि तस्लीमा नसरीन लंबे समय से धार्मिक कट्टरवाद के विरोध और महिला अधिकारों के पक्ष में अपने प्रखर विचारों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रही हैं, जिसको लेकर अक्सर वैचारिक बहसें छिड़ती रही हैं।









