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साँच कहै ता मारन धावै झूठे जग पतियाना..

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इस बार की कबीर जयंती बिना किसी बड़े सरकारी आयोजन के गुजर गई। पिछले चुनाव के पहले शरद ऋतु में भोपाल के लाल परेड़ में बड़ा आयोजन हुआ था और लोकसभा चुनाव से पहले हमारे प्रधानमंत्री कबीर के मरणस्थल ‘मगहर’ उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने गए थे।
आजकल महापुरुषों के जन्म और मरणदिन वोटीय महत्व के हिसाब से मनाए जाते हैं। इसमें मैं कोई हर्ज नहीं मानता। भले ही कबीर जेष्ठ में उमस के बीच आग बरसते दिनों में काशी में पैदा हुए थे, लेकिन मेरा मानना है कि कबीर जैसे औघड़ महापुरुष का तो नित्यप्रतिदिन आठों याम, चौबीसों घंटे, प्रतिक्षण प्रकटोत्सव मनाया जाना चाहिए।
नाम की ही बड़ी महत्ता होती है, उस बहाने उस महापुरुष के कामों का भी स्मरण हो जाता है। अब कबीर के कहन का सवांश भी स्मरण हो आए तो भला ही भला। कबीर की जिंदगी तो मुक्त छंद है उन्हें कैसे भी गाओ। जिसने उन्हें जिस नजर से देखा उस तरह पाया।
कबीर ऐसे औघड़ हैं कि उनको जप के या उनकी कही कहके काम सधने की बजाय बिगड़ ज्यादा जाता है। इसलिए वे सत्ता को कभी भी नहीं सुहाए। जिनने पकड़ने की कोशिश की वो हाथ जला बैठे।
कबीर आग के गोले की मानिंद हैं, उनसे शीतलता की उम्मीद करना व्यर्थ है। जेठ की पूरी तपन उनमें समाई है। होश सँभालने के बाद से ही उनकी सत्ता से भिडंत शुरू हो गई। आज उनके साखी, सबद, रमैनी और दोहे बम्बगोला की तरह दमदमाते हैं।
मुझे याद है कि एक सरकार ने पाठ्यक्रम से उनके कई दोहे हटवा दिए थे। उनमें से एक दोहा यह भी था-
निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय,
बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय।।
अब भला बताएं इस चापलूस युग में निंदकों की कहां गुंजाइश। इमरजेंसी के दौर के अग्निधर्मा शायर दुष्यंत ने लिखा था-जिसकी नजर उठी वह शख्स गुम हुआ। सो सत्ता की नजर ..ढाई आखर प्रेम.. से पहले निंदक नियरे पर पड़ी और दोहा किताब से गायब। हमारी पीढी ने इसे पढा़ था, नयी पीढी तो ..दुनिया बुरा माने तो गोली मारो.. वाली है।
बहरहाल सरकार द्वारा निंदक नियरे वाले दोहे की कटौती का.. हल्ला विधानसभा में भी मचा था। इसके बाद हल्ला मचाने वालों की सरकार आई तो उसके एक उत्साही मंत्री में भारी कबीर प्रेम जागा। सो उन्होंने ने कबीर की जयंती पर आधिकारिक रूप से जनसंपर्क दिवस मनाने की घोषणा कर दी।
यह भी बड़ा मजेदार वाकया था। जो कबीर मरने के लिए काशी छोड़कर मगहर चले गए उन कबीर को सत्ता के साकेत में सिंहासन पर बैठा दिया गया। इसमें कबीर का तो कोई बस रहा नहीं सो उनकी जयंती में चारण-भाँटों की भाँति सत्ता की उपलब्धियों का उच्चारण होने लगा।
उन दिनों भी मैंने एक विनतीनुमा लेख लिखा था। भाई साहब जनसंपर्क को बरबाद मत करिए। यदि इन लोगों में कबीर की आत्मा उतर आई तो कहीं के नहीं रहोगे। कबीरदास का प्रेत आपको राजनीति नहीं करने देगा।
राजनीति में तो कई-कई मुँहों से अलग-अलग सुविधानुसार बोलना पड़ता है। कबीर तो खुली आँखोँ वाले संत थे। वे तो घर जारकर साथ चलने का आह्वान करते हैं। यहां तो राजनीति में घर बनाने आते हैं लोग। कल तक जो झोपड़े में थे आज महलों में हैं।
अब किसी दिन कबीरदास के प्रेत ने लुकाठी हाथ में थमा दी और कहा ले पहले अपना घर जार फिर चल हमारे साथ तो न तो आपकी राजनीति बचेगी और न ये सरकार।
ये अच्छा हुआ कि वे उत्साही मंत्री जी अगले साल कबीर जयंती को जनसंपर्क दिवस के रूप में नहीं मना पाए। उनकी तरक्की हो गई, वे केन्द्र की राजनीति में चले गए। कबीर दफ्तरों में टँगने से बच गए।
मैंने इस सरकार के एक असरदार नेता को सुझाया कि अपने अधिकारियों के प्रबोधन करने के लिए कविभूषण और चंदबरदाई को पढना अनिवार्य कर दीजिए। क्योंकि जनसंपर्क के अधिकारी/कर्मचारी भी उन्हीं स्कूलों से वही किताबों को पढकर निकले हैं जिनमें ..कबीर का निंदक नियरे वाला दोहा पढा़या जाता था।
सुशासन के लिए ब्रेनवाश जरूरी है।
नेताजी ने जवाब में कहा- अब इसकी जरूरत नहीं हमने सीधे, सीधे भूषण, चंदबरदाई को ही आउटसोर्स कर लिया है। जो ..ठंडा मतलब कोका कोला.. का स्लोगन लिखते थे वही अब अपने लिए लिखा करेंगे। कबीर कितने महान हैं कइयों की आत्मा और दिमाग को ठंडे का तड़का लगने से बचा लिया।
कबीर, तुलसी से ज्येष्ठ थे। तुलसी ने आँखे बंदकर आत्मा से भक्ति करने की बात की। कबीर ने कहा आँखे खोलकर भक्ति करो। जो अच्छा लगे अच्छा कहो, बुरा लगे बुरा बताओ। आँखें भी दोनों खुली रहनी चाहिए। जिससे मस्जिद-मंदिर दोनों दिखें। और उनमें बैठे ढोढकविद्या रचने वाले पंडा मौलवी भी।
कबीर को चाहे निरक्षर लढ़े या डी.लिट वाला पढ़े सबको बराबर समझ में आते हैं। क्योंकि इन्होंने घुमाफिराकर कुछ भी नहीं कहा। कहने का अंजाम भी भोगा और बताया। इन्हें पढने-समझने के लिए किसी विद्वान व्याख्याता की भी कोई जरूरत नहीं।
मैंनें बचपन से अबतक इन्हें पढा़। हजारी प्रसाद द्विवेदी के कबीर को भी और पुरुषोत्तम अग्रवाल की अकथ कहानी प्रेम की भी। कबीर को आप जितना ही पढते जाएंगे कबीर आपमें उतने ही घुसते जाएंगे।
लोककलाओं के विश्वप्रसिद्ध अध्येता कपिल तिवारी जब आदिवासी लोककला परिषद में थे तो उन्होंने मुझे एक विदेशी लिंडा हेस से मिलवाया था। किस देश की थीं यह तो मुझे याद नहीं लेकिन जब मैंने बताया कि मैं रीवा से हूँ तो उन्होंने रीमाराज्य राज्य से कबीर के रिश्ते के बारे में इतना कुछ बता दिया जितना अपने देसी अध्येता भी नहीं जानते।
कबीर का किसी राजव्यवस्था से भी कोई संपर्क हो सकता है यह असहज सी बात है। पर रीमाराज्य जो कि उन दिनों बाँधवगद्दी के नाम से जाना जाता था कबीर का व्यापक प्रभाव था। उन दिनों आधा छत्तीसगढ़ भी बघेल राजाओं के आधीन था। आप देखेंगे की आधे छत्तीसगढ़ और उन दिनों के रीवा राज्य के दूसरे हिस्सों में कबीर की स्मृतियाँ किसी न किसी रूप में हैं। बाबर के समकलीन राजा वीरसिंह देव से लेकर वीरभानु तक की गद्दी कबीर के शिष्यत्व में रही।
बाँधवगढ़ के सेठ धनी धरमदास तो कबीर के उत्तराधिकारी ही बन गए और कबीर पंथ को आगे बढ़ाया। सेन नाई भी बाँधव दरबार के थे। अमरकंटक में कबीर और नानक की भेंट हुई थी। गुरुग्रंथ साहेब में कबीर के सबद, साखियां और दोहे हैं। हमारी माटी में कबीर के संस्कार हैं। उनके सबदों की सुवास है इसलिए मैं ऐलानिया कहा करता हूँ कि ..आपन जात कबीर की..है।
जैसा कि मैंने कहा-कबीर को पढना,कबीर के भीतर घुसना या इसका विलोम भी। याने कबीर का आराधन कबीर को अपने दिलो-दिमाग में बैठाने जैसा है। ये पढकर बिसराए नहीं जा सकते हैं।
दुनिया के ये ऐसे विरले जीव हैं कि लिखा कुछ भी नहीं- मसि कागद छुयो नहिं कलम धरयो नहिं हाथ। इनकी कही बातों को जितना सहेजा गया ऐसा किसी के साथ नहीं हुआ। क्योंकि ये आँखिन देखी बयान करते हैं,कागद लेखी नहीं।
कबीर गरीब गुरबों की उम्मीद हैं। समुंदर के किनारे जलती हुई लाट हैं जो किसी को भटकने नहीं देते। कबीर के कहे को गीता की तरह ग्रहीत करना होगा तभी आत्मा का मैल साफ होगा,दिन की रतौंधी दूर होगी।
कबीर प्रतिक्षण याद किये जाने चाहिए। राजव्यवस्था कबीर से सीख ले तो उसे रामराज्य तक इंतजार ही नहीं करना होगा। कबीर और उनकी वाणी आज भी अमोघ है इसपर ..आधे से कछु आध.. भी अमल हो तो भारतवर्ष ही नहीं संपूर्ण विश्व का कल्याण हो जाए।
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आठ वर्षो में देश का स्वाभिमान – पुनः स्थापित हुआ।

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सुधीर पाण्डे

पिछले आठ सालों में इस देश को ऐसा क्या मिला, जो आज़ादी के बाद के सात दशक के इतिहास में हासिल न हो सका। स्वतंत्रता के बाद भारत को विकास की ओर ले जाने वाला बुनियादी ढांचा कितना सही था और कितना गलत, इसकी समीक्षा 70 सालों के दौरान कभी नहीं कि गई। यह मान लिया गया कि भारत के नवनिर्माण की जो राह बनी थी, उसे ही विकास की धारा मानकर निरन्तर मजबूत बनाये रखना है।

पिछले आठ सालों के दौरान इन पुरानी अवधारणाओं को तोड़ा गया, इनकी समीक्षा की गई और विकास को अवरूद्ध न करते हुए नई तकनिकी और प्रयोगों के दम पर तेजी से आगे ले जाने की कोशिश की गई। आठ वर्ष का समय किसी भी बिगड़ी हुई धारा को सुधारने के लिए प्रयाप्त नहीं कहा जा सकता। इन परिस्थितियों में जब पुरानी धारा के आवेग को बिना रोके उनमें सुधार और नई धाराओं का प्रादुलभाव किया जा सके। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आठ वर्ष पूर्व जिन प्रयोगों को भारत में प्रारंभ किया वे प्रथम दृष्टि में स्वीकार्य नहीं माने गये। यही कारण था कि इन प्रयोगों के दीर्घकालीक की समीक्षा के स्थान पर इन्हें घातक करार दे दिया गया।
समय के साथ स्थितियों में परिवर्तन आया है, जो भारत आठ वर्ष पूर्व विश्व के सामने एक अपरिचित अभिव्यक्ति था। उसे ना सिर्फ पहचान मिली बल्कि नये पंखों के भरोसे उसने उड़ान भरना भी सीख लिया।
आठ वर्ष की अवधि में यदि मोदी सरकार की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि पर गौर न किया जाए तो वह बैमानी होगा। अंग्रेजों के शासनकाल की पूर्व अवधि से क्रमशः भारत में अपनी पहचान खो दी थी, आत्मविश्वास के स्तर पर हम विश्व में सांप और बंदर नचाने वाले देशों के रूप में अपनी पहचान रखते थे। विश्व का कोई भी देश इतनी बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद हमारी आर्थिक अर्थ व्यवस्था को महत्व नहीं देता था। दूसरे अर्थो में कहे तो समूचा विश्व भारत का उपयोग करता था, पर भारत को अपने समकक्ष पहुंचने देना नहीं चाहता था। नागरिक चेतना केवल अपने स्वार्थपूर्ती पर आकर ठहर जाती थी, और राष्ट्रहित नागरिक के व्यक्तिगतहित के साथ जुड़ जाता था। परिणाम यह होता था कि कोई राजनैतिक दल गरीबी हटाओं का नारा देकर देश में अपनी सरकार दशकों तक चलाने में सक्षम हो जाता था।
आठ वर्ष पूर्व चंद नाम ही ऐसे होते थे, जिन्हें इस देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाले नेताओं के रूप में जाना जाता था। यह कैसे भूला जा सकता है कि क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद की मां अपने पूरे जीवन काल में आज़ादी के बाद भी डकैत की मां के रूप में अपने जीवन यापन के लिए निम्नतम स्तर का संघर्ष करती रही। देश में इन चंद जमीदारों को आज़ादी के लिए नेता मान कर उनकी महिमा मंडित की गई। पर उन अज्ञात और ज्ञात संघर्षशील व्यक्तियों को स्वाधीनता के युद्ध में एक सेनानी तक की जगह नहीं दी गई। यह बात अलग है कि स्वाधीनता संग्राम सेनानी को आजीवन पेंशन के नाम पर राशि ताम्र पत्र के साथ दी गई थी। पिछले आठ वर्षो में समाज के विभिन्न वर्गो से आज़ादी के संघर्ष की वास्तविक गाधा को निकाला गया, तो वर्षो से चला आ रहा एक बड़ा झूठ समूचे भारत के सामने आकर खड़ा हो गया, कि चंद लोगों ने नहीं समूचे भारत ने अलग-अलग प्रेरणाओं को माध्यम से दो सौ वर्ष की आज़ादी के संघर्ष को अपना सब कुछ खो कर जिया था।
आठ वर्षो में भारत को स्वाभिमान दिया है, अपने गुजरे हुए कल की वास्तविक पहचान दी है और भविष्य में इस विश्व में अपनी पताखा फैलाने के लिए एक मजबूत आधार दिया है। नई राह पर भारत क्रमशः एक नई इबारत लिखेगा इसमे संदेह नहीं होना चाहिए।

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‘जो कबिरा काशी मरै रामहि कौन निहोर’

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“छोटे शहरों में हो रहे हैं बड़े काम पर गुन के गाहक ही नहीं..।”
जयराम शुक्ल
मेरे कई मित्र स्नेहवश अक्सर कहा करते हैं कि आप जैसे आदमी को तो किसी महानगर में होना चाहिए दिल्ली, मुम्बई छोड़ के यहाँ कहाँ रीवा में घुसे रहते हैं। ऐसे मित्रों को आभार के साथ कबीर का ये दोहा सुना दिया करता हूँ- जो कबिरा काशी मरै रामहि कौन निहोर..! कबीरदास मरने के लिए काशी छोंड़कर मगहर चले गये थे। किस्सा मशहूर है, कि मगहर में जो मरता है उसे रौरव नरक मिलता है, काशी में मरने वाले को सीधे सरग का दरवाजा खुल जाता है। कबीर कहते हैं कि काशी में मर के स्वर्ग जाने में ईश्वर की क्या बड़ाई है, वो तो काशी का महात्म है। इसीलिए देश भर के पापी चाहते हैं कि उनके प्राण यहीं छूटें। मगहर में मरने से स्वर्ग मिले तब तो ईश्वर की महत्ता है, पुरषार्थ का कोई मतलब है।
अपने देश के महानगर कवि, कलाकारों, मीडियाकरों के लिए काशी ही है। कस्बे से निकलकर दिल्ली पहुँचे सीधे राष्ट्रीय हो गए। दिल्ली की छींक भी राष्ट्रीय प्रभाव डालती है। छह-सात साल पहले दिल्ली में निर्भया कांड हुआ, देश हिल गया। हमारे शहर की भी किट्टी पार्टी वाली मैडमों ने कैंडल जुलूस निकाला था। हमारे अपने शहर-कस्बे गाँव में निर्भया जैसी कितनी ही बालिकाएं आए दिन दुराचार की शिकार होती हैं। कुएं-बावड़ी-तलाबों में रोज-ब-रोज लाशें मिलती हैं।
हाल ही मैहर(सतना) में मजूरी माँगने गई महिला को एक ठेकेदार ने इतना पीटा कि उसकी मौत हो गई। डाक्टरों ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि उसके पेट में इतने लात-घूँसे पड़े कि आँतें फट गई। बेचारी पेट के वास्ते मजूरी माँगने गई थी उसका पेट ही फाड़ दिया..ले मजूरी। ऐसे मुसीबत के मारों के लिए लिए कैंडल जुलूस नहीं निकलते।
अभी एक अखबार पढ़ रहा था कि अपने मध्यप्रदेश में 11 प्रतिशत की ग्रोथरेट से दुराचार बढ़ रहे हैं। अपराधों का भी ग्रोथरेट से वास्ता होता है। बाजार और अपराध दोनों की ग्रोथरेट रेलपटरी की भाँति समानांतर चलती है।
काशी और मगहर की परंपरा आजादी के बाद और भी पुख्ता होती गई। इस हिसाब से देखें तो गाँव मगहर हैं और शहर काशी। इसीलिए गाँव का हर समर्थवान शहर में चैन से मरना चाहता है। गाँव वीरान होते जा रहे हैं। अब बच रहे हैं खेती से निष्कासित हो चुके बैल या कि वो किसान जिनका कोई घनीघोरी नहीं।
आजादी के बाद गाँधी ने कहा सुराज मगहर पहुँचे तभी तो असली आजादी का स्वाद मिलेगा। नेहरू ने सुराज को शहरों के परकोटे में घेर दिया। आर्थिक हदबंदी तो हुई ही साहित्यिक और साँस्कृतिक केंद्रीकरण भी हो गया। अपने गाँव अर्थव्यवस्था भर के ही कच्चामाल नहीं हैं, वे अब राजनीति, साहित्य, सँस्कृति के लिए भी हैं। गाँवों की दुर्दशा कथा, कविताओं, नाटकों, फिल्मों में परोसने से वाहवाही भी मिलती है दाम और इनाम भी। ओटीटी पर पंचायत सीरीज को कितनी वाहवाही मिल रही है। हमारे देश का प्रभुवर्ग काशी और मगहर की परंपरा को और भी संपुष्ट बनाए रखना चाहता है। काशी में रहने का सुख तभी तक सुख है जबतक नरक भोगने वालों के लिए मगहर साबुत बचा रहे।
गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों में भी बड़े और रचनात्मक काम हो रहे हैं पर वे चर्चाओं से खारिज रहते हैं। उनके हिस्से का यश महानगर हड़प लेते हैं। मध्यप्रदेश के कटनी जैसे छोटे शहर में भी लिटफेस्ट और पुस्तकमेला भरा करता है तो सीधी में सौ दिन का महाउर उत्सव होता है। मुझे वहां जाने, भाग लेने और कुछ टूटेफूटे शब्द बयान करने का सौभाग्य मिलता रहता है। पुस्तकों और रंगकर्म के प्रति इन छोटे से नगरों के लोगों का प्रेम स्तुत्य होता है।
गाँवों में रहकर रचना व रंगकर्म करने वाले कवि-कलाकारों ने अपनी-अपनी प्रस्तुतियाँ देते हैं। मैं पक्के यकीन के साथ कह सकता हूँ- यदि इन लोगों की प्रस्तुतियाँ जयपुर या दिल्ली के लिटफेस्ट में होता तो ये भी राष्ट्रीय हो जाते। जयपुर के लिटफेस्ट में जयपुर का महात्म है साहित्य का नहीं। वो एक साहित्यिक पर्यटन है जिससे नामाजादिक साहित्यकार और विचारक खिंचे चले आते हैं। रात में दारूपार्टी और सुबह खुमारी में राष्ट्र और समाज के नैतिक पतन पर गंभीर चिंतन। इन चिंतनों में हर साल जानबूझकर कुछ ऐसी कलाकारी कर दी जाती है कि वे विवाद के रूप में महीनों खबरों में छाए रहते हैं।
खबरों में छाने के लिए विवाद जरूरी है और ये पहले से ही फिक्स रहते हैं। आयोजन होते हैं विमर्श के लिए, बाहर निकलकर आते हैं विवाद। सो मेरी दृष्टि में कटनी ज्यादा अहम् है बनिस्बत जयपुर के। ऐसे आयोजन शहर की पहचान बनाते हैं। दूसरे कस्बों को भी कटनी से प्रेरणा लेना चाहिए।
देश का अत्यंत पिछड़ा जिला है सीधी। जमीन के भीतर विपुल कोयला भंडार और घने जंगल न होते तो इस जिले को कोई जानने की जरूरत भी नहीं समझता, सरकार भी नहीं। जाने के लिए खास साधन भी नहीं। उखड़ी सड़कें और धूल धक्कड़ से अटा पड़ा कस्बेनुमा जिला जिसे राजनीति में अर्जुन सिंह के कारण जाना जाता रहा है। इसी सीधी में रंगमंच के क्षेत्र में बड़ा काम हो रहा है। बड़ा याने विश्वस्तर का। पिछले सालों 111 दिन के रंगमंच का अनुष्ठान महाऊर रचा जा रहा है। पूरे देशभर से कलामंडलियाँ आईं। हर दिन दर्शक उमड़े और दूसरी भाषाओं के भी नाटक देखे। संभवतः इस आयोजन को गिनीज बुक में भी जगह मिल चुकी है या मिलने की प्रक्रिया में है।
सीधी के सीधेसाधे तीन छोकरे मिलकर प्रयास कर रहे हैं। इनके खजाने में हजारों की संख्या में लोकगीत,लोकनाट्य, लोककथाएं, संस्कृति और परंपरा के आख्यान हैं। ये वो काम कर रहे हैं जिनके लिए सरकारें कला अकादमियाँ खोला करती हैं। बड़ा काम छोटी जगह भी हो तो ज्यादा दिन दबाए नहीं दबता। आज स्थिति यह है कि जो भी रंगमंच जानता है वह सीधी को अवश्य ही जानता है। इस जानने के पीछे सीधी का महात्म नहीं है, रंगकर्म और यहां के कलाकारों का परिश्रम है। इसलिए सीधी का महाउर रंगजगत की सुर्खियाँ बने न बने लेकिन यह भारत भवन और एनएसड़ी की प्रतिष्ठा से किसी भी सूरत में कम नहीं।
कभी-कभी छोटे शहरों के ये काम बड़े लोगों को अखरने लगता है। उसका परिणाम भी सीधी जैसी निंदनीय घटना सा होता है। यहां के एक नेता जी उन रंगकर्मियों से इसलिए गुस्सा गए कि वे अब पहले की तरह सिर्फ उनके लिए ही क्यों नहीं गाते बजाते। शहर हमारा, रसूख हमारा और कोई दूसरा मुख्य अतिथि बने, भाषण दे यह कैसे संभव है। नेता जी ने पुलिस को लखा दिया सो पुलिस ने उन्हीं रिकार्डधारी रंगकर्मियों की नंगी परेड़ निकाल दी। फोटो खींची और सोशल मीडिया में निपर्द कर दिया। मगहर को ऐसे खतरों से प्रायः बबास्ता होना ही पड़ता है। पर मगहर की महत्ता यूँ ही तो खारिज नहीं की जा सकती।
मेरी मूल चिंता काशी और मगहर की संस्कृति के बने रहने की है। आजादी और अँग्रेजों के पहले यह नहीं था। मध्ययुग के प्रायः सभी कवि, कलाकार, सर्जक छोटी जगहों के थे। तुलसी को काशी के पंडों ने तंग किया तो वे चित्रकूट आ गए। रामचरित मानस यहीं पूरी की। सूर भी किसी महानगर में नहीं रहे। पर तब गुन के गाहक थे, इसलिए ये और इनके समकालीन आज तक चलते चले आए। अब जगह का महत्व ज्यादा है। जो जितने बड़े शहर में रहे, वो उतना बड़ा कलाकार। इसीलिए मैं अक्सर ये विनती करता हूँ- हे दिल्ली के देवों अपनी-अपनी काशी पर प्रमुदित तो रहो पर हम मगहर वासियों की भी सुधि ले लिया करो कभीकभार।
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हिंदी पत्रकारिता का 196 साल का गौरवमयी इतिहास से लेकर नैतिक मूल्य हनन तक सफर

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!….खत्म होता चौथा स्तम्भ ?
दायित्व, कृतव्य, नैतिक मूल्य यह अब किताबी बातें रह गयी है। आजादी के पहले जब पत्रकारिता की नींव डली तो देश के प्रति कृतव्यनिष्ठता अपने दायित्व और नैतिक मूल्यों के आधार पर पत्रकारिता की जाती थी। पत्रकारिता का यह स्वर्णिम युग था जिसने बिना किसी अधिकारों के भी पत्रकारों को चौथा स्तम्भ माना गया। देश आजाद हुआ तो पत्रकारिता भी सत्ता के साथ चलकर देश की प्रगति का हिस्सा बनने लगी। सत्ता में दखलंदाजी किसी को नही सुहाती और अंततः तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को इमरजेंसी लगा दी। इमरजेंसी के दौर में जो भी छापना होता था पहले दिखाना पड़ता था फिर कांट छांट कर प्रकाशन करना पड़ता था।
इस दौर के बाद पत्रकारिता पर अंकुश लगता गया। इस अंकुश से पत्रकारिता में निखार आया और लोग पत्रकारों पर सत्ता से अधिक विश्वास करने लगे। यह वह दौर था जब एक चार लाइन के समाचार में कलेक्टर तक कि कुर्सी हिलने लगती थी। लेकिन 90 के दशक के बाद कारपोरेट सेक्टर हावी होने लगा और पत्रकारिता का व्यवसायीकरण होता गया। साल 2010 तक यही चलता रहा। इस दौरान भी संपादक नैतिक मूल्यों का ध्यान रखते थे। लेकिन 2010 के बाद निचले स्तर पर जिला स्तरों पर भी पत्रकारिता को कमाई के जरिये के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। यहीं से पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों का हनन होने लगा और आज चंद लोगों के कारण पत्रकारिता को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। आलम यह है कि पत्रकारिता में चापलूसी बढ़ने लगी। बात कड़वी जरूर है पर आज के दौर में पत्रकार देश हित जनहित की पत्रकारिता को नही खुद को बचाने की पत्रकारिता करने लगे है।
संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करने वाली धारा 19 का प्रयोग करने वाला हर व्यक्ति पत्रकार है। इसके लिए किसी के अधिकार पत्र द्वारा प्रमाणित करने की जरूरत नही है। संविधान का पालन करते हुए ईमानदारी से सत्ता को आईना दिखाना पत्रकारिता है। लेकिन क्या हुआ। आप राजगढ़ जिला ही देखें 18 अप्रैल को मैने कलेक्ट्रेट से फेसबुक लाइव दिखाया। हजारों लोगों ने देखा । सब जानते है लाइव में जो होता है वही दिखता है। लेकिन 4 मई को मेरी शिकायत की गई। मेरे द्वारा सीएम हेल्पलाइन का उपयोग किया गया और शपथपत्र एवं आवेदन से जांच की मांग की गई। मुझ पर ब्लैकमेलिंग के आरोप लगाए गए। में आज भी कहता हूं भृष्टाचार देख देख 2 सालों से कलेक्ट्रेट जाना ही बंद कर दिया था। 17 सितंबर 2021 को एक आवेदन भेजने के बाद में अहमदबाद चला गया था। 1 नवम्बर 2021 से पुनः कलेक्ट्रेट जाना शुरू किया। कलेक्ट्रेट में कैमरे लगे हुए है 1 नवम्बर से 4 अप्रैल 30 अप्रैल 2022 तक कि हर टेबल की रिकार्डिंग की जांच होना चाहिए। 4 मई को मेरे खिलाप झूठा आवेदन बाबुओं ने दिया। में गारंटी देता हूँ मेरे खिलाप एक भी बाबू एक छोटा सा भी सबूत पेश कर दे तो में उसी समय देह त्याग कर दूंगा। लेकिन मेरे द्वारा उजागर किए गए भृष्टाचार की फाइलों से घबराकर षड्यंत्र किया गया। में षड्यंत्रों से दूर रहना चाहता हूं। और उसी हथियार का इस्तेमाल किया गया। मैने उसी दिन से कलेक्ट्रेट ही नही राजगढ़ जाना भी छोड़ दिया।
आज हिंदी पत्रकारिता दिवस पर में पत्रकारिता को त्यागकर आरटीआई एक्टिविस्ट की भूमिका में इंदौर से नया जीवन जीना शुरू करूँगा। एक साधारण मानव के लिए संविधान में दिए अधिकारों का उपयोग करते हुए भृष्टाचारियो की पोल खोलने में किसी संस्था का ठप्पा या पत्रकार होना जरूरी नही है। हर बात को न्यायालय की शरण मे ले जाइए न्यायालय हमेशा संविधान की रक्षा करता आया है। मेरी कर्मभूमि राजगढ़ जिले से दूर रहकर भी वही करूँगा जो नीति नियम नैतिकता कहती है।

माखन विजयवर्गीय की कलम से……

सस्ता डीजल पेट्रोल… मोदी ने छीना विपक्ष से मुद्दा

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ना काहू से बैर/राघवेंद्र सिंह

देश में सुरसा के मुंह की तरह बढ़ रहे पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दामों में जो आग लगी थी उस पर वित्त मंत्री ने पिछले दिनों राहत की जो बौछार की उससे सभी ने ठंडक महसूस की है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सस्ता ईंधन करने के ऐलान को प्रधानमंत्री मोदी का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है। ऐसा लगा मानो ईंधन के दाम घटने पर मानसून भी प्रसन्न हो गया और आसमान पर बादल छाए और राहत की बारिश करने लगे। लेकिन इसे केंद्र सरकार की तरफ से राहत की बेमौसम बारिश भी माना जा रहा है। क्योंकि अभी किसी राज्य में कोई चुनाव नही हैं। लेकिन महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में अलबत्ता सर्वोच्च अदालत के आदेश पर जून में पंचायत व नगरीय निकायों के चुनाव होने वाले हैं। मगर बिना किसी जन आंदोलन के ईंधन के सस्ता करने पर राजनीतिक हलकों में हैरत जरूर हो रही है। इस बीच एक अफवाह यह भी चली कि मप्र सरकार ने भी डीजल पेट्रोल पर टैक्स घटाया है। जब पड़ताल की गई तो वह फर्जी साबित हुई। लेकिन लोगों का ख्याल है कि ओबीसी आरक्षण और पंचायत व नगर सरकारों के चुनाव के चलते शायद मुख्यमंत्री मामा शिवराज भी सबके ख्याली पुलाव को सही साबित कर दें।

Raghavendra Singh

वैसे यूक्रेन – रूस युद्ध के चलते आशंका यह थी कि अभी ईंधन के दाम नहीं घटेंगे। असमय – बिना की वजह के ईंधन को सस्ता कर मोदी सरकार ने एक नई लाइन खींचने की भी कोशिश की है। बहुत संभव है सरकार को या खबर लगी हो क्विड डीजल पेट्रोल के मुद्दे पर विपक्ष देश में बड़े आंदोलन की तैयारी कर रहा है इसलिए सरकार के खिलाफ माहौल बनाने वाले गुब्बारे की दाम घटाकर मोदी ने पहली हवा निकाल दी उसके पहले मुख्यमंत्रियों से बातचीत में प्रधानमंत्री ने कहा था कि राज्य सरकार अपने हिस्से के टैक्स में कमी कर डीजल पेट्रोल सस्ता कर सकते हैं । मगर इस पर किसी भी राज्य भी ने दाम नहीं घटाएं। पहले से आर्थिक तंगी से दो चार हो रहे भाजपा शासित राज्यों ने भी टैक्स में कोई कटौती नही की। इंतजार के बाद केंद्र सरकार ने अचानक दाम घटाकर सबको इसके पीछे कारण खोजने के लिए एक मुद्दा दे दिया। बहरहाल प्रतिबंध झेल रहे रूस से सस्ता तेल लेकर मोदी सरकार अपनी जनता की थोड़ी मुश्किल कम करती जरूर दिख रही है।

योगी की धमक और मामा की बमक…
भाजपा शासित राज्य के दो मुख्यमंत्री खूब चर्चाओं में है। गुंडे बदमाशों की कमर तोड़ने के लिए अवैधानिक कारोबारियों को 24 घंटे में काबू में करने का उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी का अल्टीमेटम खूब सुर्खियां बटोर रहा है उन्होंने कहा कि जो गुंडे बदमाश शहरों से लेकर कस्बों तक गैर कानूनी तरीके से स्कूटर कार स्टंट और यात्री वाहनों का संचालन करते हैं उन पर कठोर कार्रवाई की जाए आर्थिक वितरण की कमर तोड़ दी जाए ताकि समाज विरोधी गतिविधियां बाबू में लाई जा सके साथ ही जिन अपात्र लोगों के पास मुफ्त और सस्ते राशन पाने के कार्ड बने हुए हैं वह अपने राशन कार्ड जमा करा दें अन्यथा उनके खिलाफ कठोर कार्यवाही की जाएगी इसमें उनके खिलाफ बाजार दर से राशन की कीमत वसूलने की बात की गई इसका असर यह हुआ इस सरकारी दफ्तरों में अपात्र राशन कार्ड धारियों की जमा करने के लिए कतारें लग गई यह देख कर आम लोगों को अच्छा लगा उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जबरदस्त धमक है ।
मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री मामा शिवराज सिंह अपने प्रशासन को जगाने और सक्रिय करने के लिए सुबह 6:30 बजे मुख्यमंत्री निवास में बैठक कर कलेक्टर एसपी और वरिष्ठ अधिकारियों से वीडियो कॉलिंग कर जनता की दिक्कत कम करने के लगातार निर्देश दे रहे हैं। एक तरह से यह उन्होंने सोते हुए अफसरों को मुस्तेद करने का नवाचार शुरू किया है। जनता की नब्ज पकड़ने वाले मुख्यमंत्री के रूप में जान शिवराज सिंह की अलग पहचान है। अब जनता उम्मीद कर रही है कि मामा जिस तरह से अधिकारियों क्लास लेकर काम करने के लिए विवश कर रहे हैं उससे लगता है कानून व्यवस्था बेहतर होगी और भ्रष्टाचार में कमी आएगी।

कांग्रेस को कमल का डर दिखा रहे हैं नाथ…
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ साफगोई के लिए मशहूर है पिछले दिनों उन्होंने कांग्रेस के एक बैठक में अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के लिए भाजपा और उसके संगठन की खासियत बताई।उन्होंने कहा कांग्रेस को भाजपा से नहीं बल्कि उसके संगठन से खतरा है। लब्बोलुआब है था कि हमें भाजपा का संगठन ही हरा सकता है। इसलिए मंडल स्तर पर कार्यकर्ता और जनता से संपर्क व संवाद करने की जरूरत है। जनता के हित में संघर्ष करने में कांग्रेस आगे आती है तो फिर जीतने से कोई नहीं रोक सकता। उनकी ये नसीहत अच्छी तो है लेकिन इस पर अमल करने की शुरुआत खुद कमलनाथ और प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज नेताओं से करने की जरूरत है। कार्यकर्ताओं को प्रतीक्षा है कि कौन नेता अपने भाषाओं पर सबसे ज्यादा अमल करके बताता है।

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लोहिया के एक नारे ने देश की दिशा ही बदल दी!

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जयराम शुक्ल

‘पिछड़ा पावै सौ में साठ’ का नारा देने वाले सोशलिस्ट नेता डाक्टर राममनोहर लोहिया ने कहा था ‘लोग मेरी बात सुनेंगे लेकिन मेरे मरने के बाद’ आज लोहिया का यह नारा राजनीतिक दलों और नेताओं के सिर पर चढ़कर बोल रहा है।
उत्तरप्रदेश और बिहार के बाद अब मध्यप्रदेश में पिछड़े वर्ग की राजनीति परवान पर है। फौरी सबब है नगरीय निकाय और पंचायत के चुनाव का। कांग्रेस और भाजपा बढ़चढ़कर ऐसे पैरवी कर रही हैं कि यदि उनका बस चले तो समूचा आरक्षण ही ओबीसी के चरणों में रख दें।

Jay Ram Shukla सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश सरकार से 27% ओबीसी आरक्षण देने का तार्किक आधार माँगा था, जो सरकार देने में विफल रही। सुप्रीमकोर्ट के अंतरिम आदेश के अनुसार कहा गया जितना आरक्षण देना हो दीजिए लेकिन यह सीमा 50% पार नहीं होना चाहिए। भाजपा ढोल बजाकर नाच रही है- हम जीत गए, हम जीत गए।
लेकिन हकीकत यह कि चुनाव में पिछड़ों के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण बहाल हो गया जो पहले से था। यह जानते हुए भी कि सुप्रीम कोर्ट को 27 प्रतिशत पिछड़ावर्ग आरक्षण स्वीकार्य नहीं होगा लेकिन कमलनाथ की अल्पकालिक सरकार ने यह रायता फैलाया। इसके बाद दोनों पार्टियों के नेताओं ने झूठ पर झूठ बोलकर समाज को भ्रम के कुहासे में धकेल दिया।
पिछडों के हितैषी दिखने की राजनीति सिरपर चढकर झूठ पर महाझूठ इसी तरह बोलती रहेगी और यही 2023 के विधानसभा व लोकसभा का आधार भी बनने वाला है।
पिछड़ों की यह राजनीति आजादी मिलने के कुछ बरस बाद से ही शुरू हो गई। डाक्टर राममनोहर लोहिया आजादी मिलने के एक वर्ष पूर्व ही पंडित नेहरू से राजनीतिक मतभेदों के चलते अलग हो गए। जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, अशोक मेहता, आचार्य नरेन्द्र देव के साथ मिलकर सोशलिस्ट पार्टी बना ली।
डाक्टर लोहिया जातितोड़ों का आंदोलन जरूर चलाते थे पर उनका मानना था कि यह प्रवृति तभी खत्म होगी जब पिछड़ेवर्ग लोग सामाजिक और राजनीतिक रूप से बराबरी पर आ जाएंगे।
लोहिया के पिछड़े लोगों में जाति नहीं थी बल्कि वंचित समुदाय था जिसमें महिलाएं भी शामिल थीं। लोहिया की परिभाषा में दलित कोई जाति नहीं वरन् वे लोग थे जिन्हें सदियों से दबाया और कुचला गया था, जो शोषित थे। इसी परंपरा को यमुना प्रसाद शास्त्री ने शोषितोदय कहकर आगे बढ़ाया।
63 में वे फरुख्खाबाद से उप चुनाव में जीतकर लोकसभा पहुँचे। वे मानते थे कि कांग्रेस वोट तो दलितों और पिछड़ों से लेती है पर उसका नेतृत्व कुलीन हाथों में है। वामपंथियों को भी इसी श्रेणी का मानते थे। यद्यपि लोहिया स्वयं कुलीन मारवाड़ी थे।
1965 के आसपास उन्होंने दो नारे दिए पहला नारा था- संसोपा ने बाँधी गाठ, पिछड़ा पावै सौ में साठ, दूसरा नारा था- मँहगी रोको बाँधों दाम, वरना होगा चक्का जाम। पहले नारे को कांग्रेस के भीतर ही पिछड़ा वर्ग के लोगों ने जाति को आधार बनाकर सूत्रवाक्य बना लिया।
कांग्रेस के भीतर से ही चौधरी चरण सिंह ने लोहिया के इस नारे को बुलंद किया और प्रकारान्तर मेंं उत्तरप्रदेश की चन्द्रभानु गुप्त की सरकार गिरा दी। बिहार में पिछड़े वर्ग के कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने। पिछड़ों की यह राजनीति सैलाब की तरह ऐसी बढ़ी कि गैर कांग्रेसवाद के अश्वमेधी घोड़े पर सवार हो गई।
67 तक कांग्रेस की नौ राज्यों की सरकारें बेदखल हो गईं। गैर कांग्रेसवाद के इस नारे को जनसंघ का साथ मिला। पंडित दीनदयाल उपाध्याय लोहिया के साथ हो लिए। वही क्रम 77 में दोहराया गया जब जेपी और नानाजी की जोड़ी बनी।
दरअसल लोहिया पंडित नेहरू से इस बात से भी नाखुश रहे कि 1955 पिछड़ावर्ग के हितों के लिए गठित काका साहब कालोलकर की सिफारिशों को दरकिनार कर दिया गया था।
1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो सबसे बड़ा काम 1978 में बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में आयोग गठित कर दिया जिसे पिछड़े वर्ग के लिए सिफारिशें देनी थी।
मंडल साहब ने जनता पार्टी की सरकार के गिरते -गिरते अपनी सिफारिशें पेश की। 1980 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार पुनः आ गई। मंडल कमीशन की रिपोर्ट राजीव गाँधी के शासन काल तक दबी रही।
1989 में जब वीपी सिंह की जनमोर्चा सरकार बनी तो मंडल कमीशन फिर याद आया।
मंडल साहब ने 1931 की जातीय जनगणना को आधार मानकर रिपोर्ट दी कि देश में 52 प्रतिशत आबादी पिछड़ों की है। आरक्षण में 50 प्रतिशत की सीमा और जातीय आबादी को ध्यान में रखते हुए केन्द्र सरकार की ओर से 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का आदेश जारी हुआ।
इस आदेश से देश में भूचाल सा आ गया। सवर्ण युवाओं ने आत्महत्याएं की..। लेकिन पिछड़ा वर्ग की राजनीति का सिक्का चल निकला।
1990 के बाद लालू यादव और मुलायम सिंह का राजनीति में अभ्युदय हुआ। दोनों राज्यों की पिछड़े वर्ग की राजनीति की हवा मध्यप्रदेश आ पहुंची। 1990 के बाद इन तीनों राज्यों में एक भी ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना। एक दो अपवाद छोड़ दें तो अदल-बदलकर पिछड़े वर्ग से ही मुख्यमंत्री बनते रहे।
1991 में नरसिंह राव की सरकार आने के बाद सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत का आरक्षण देकर मामले को ठंडे करने की कोशिश की लेकिन पिछड़े वर्ग की राजनीति तबतक धधक चुकी थी।
सभी राज्यों ने मंडल कमीशन के 52 प्रतिशत और केन्द्र के 27 प्रतिशत आरक्षण की बात को पकड़ लिया। जबकि हर राज्यों में जातीय आबादी का प्रतिशत अलग-अलग है। लेकिन फिर भी सभी दलों ने पिछड़ों को लुभाने के लिए आरक्षण का खेल शुरू कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट की वैधानिक चेतावनी के बाद भी तामिलनाडु और राजस्थान ने तो आरक्षण का दायरा 67 तक पहुंचा दिया।
इस बीच 2018 में जब कांग्रेस की सरकार बनी तब कमलनाथ ने पिछड़े वर्ग की आबादी की दुहाई देते हुए आरक्षण को 14 से 27 प्रतिशत बढ़ा दिया। मध्यप्रदेश में अजाजजा हेतु वैसे भी 36 प्रतिशत का आरक्षण है। इसमें 27 प्रतिशत जोड़ देने से यह दायरा 63 प्रतिशत पहुँच जाता है। जबकि अभी भी संविधान में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत की है।
यह सीमा तब तक रहेगी जबतक कि संविधान में संशोधन न लाया जाए। गुस्से में सुप्रीम कोर्ट यह बात कई बार और बार-बार दुहरा चुका है।
कांग्रेस और भाजपा दोनों इस वास्तविकता को जानती हैं पर पिछड़े वर्ग को अपने पाले में लाने की होड़ के चलते हालात को इस मुकाम तक पहुंचा दिया। आरक्षण की इस अतार्किक लड़ाई में पिछड़े वर्ग के युवा भी वैसे ही फँसकर पिस रहे हैं जैसे कि सामान्य वर्ग के।
गैर कांग्रेसवाद की रौ पर लोहिया ने यह नारा तो उछाल दिया कि ‘पिछड़ा पावै सौ में साठ’ लेकिन उसकी परणति का आँकलन अपने जीते जी नहीं कर पाए। जिस सामाजिक विषमता के खिलाफ जिन्हें लेकर उन्होंने राजनीतिक युद्ध छेड़ा था वही आज जातीय राजनीति के सबसे बड़े झंडा बरदार बन गए। पर वे यह बात सही कह गए- लोग मेरी बात सुनेंगे लेकिन मेरे मरने के बाद।
◆और अंत में
पंचायत चुनावों में हम ओबीसी को
27% टिकट देंगे: कांग्रेस
और हमने 27% से ज्यादा देना तय कर रखा है: भाजपा
अब आगे…
महाजन आयोग की रिपोर्ट देखेंगे कि वे कितने प्रतिशत की बात कर गए: कांग्रेस
बिसेन आयोग ने अभी-अभी 35% देने की बात की है : भाजपा
हम मंडल आयोग की सिफारिश के अनुसार 52% देने जा रहे हैं: कांग्रेस
लोहिया जी कह गए थे पिछड़ा पावै सौ में साठ सो अब भाजपा ने है बाँधी गाँठ..
मोदी राज में 10% धनी 90% के मालिक हैं सो हम उन 90% वालों को आरक्षण देंगे: कांग्रेस
तन समर्पित मन समर्पित और पिछड़ों के लिए जीवन समर्पित
लो 100% दिया: भाजपा
इसमें 10% प्रवासियों को भी जोड़कर हम 110% आरक्षण देंगे: कांग्रेस
कोई शक……!!!
संपर्कः8225812813

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मतदाता के पक्ष में नहीं है – कांग्रेस या भाजपा

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भोपाल: मध्यप्रदेश में राजनीति के विचार को और चिंतकों का बदलती हुई परिस्थितियों पर गहन परिक्षण चल रहा है। विभिन्न तथ्यों के अन्वेषन के उपरांत दो दलीय शासन प्रणाली पर आधारित मध्यप्रदेश की राजनीति को बारीकी से और तथ्यों के आधार पर परीक्षित किया जा रहा है। अलग-अलग समूहों में राजनीति को लेकर चलने वाली चर्चाओं और भविष्य में पड़ने वाले उनके प्रभावों को भी इतिहास की कसौटी में तोलने की कोशिश की जा रही है।
अब तक हुई चर्चाओं के अनुसार मध्यप्रदेश जैसे राज्य जहां समूचे भारत की विभिदताएं छोटे समूह में उपस्थित है। एतिहासिक तथ्यों और आकड़ों से अलग कोई बड़े परिवर्तन की संभावना नहीं नजर आती है। चर्चाओं के दौरान यह भी पाया गया कि मध्यप्रदेश की सरकारों का गठन या राजनैतिक दलों के बहुमत के निर्धारण के मूल में जिस मतदाता का प्रभाव है वह अस्थिर, दबा और कुचला हुआ या अन्य उपेक्षित जाति समूह का प्रतिनिधि है। भावना प्रधान मतों के संग्रह में वैचारिक अस्थिरता बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बहुत कम अवसर ऐसे पाये जाते है जब मध्यप्रदेश का मतदाता नेतृत्व के किसी चेहरे या उसके कृत्यों से प्रभावित होकर मतदान करता है।

Sudhir Pandeyसर्वप्रथम कांग्रेस के संदर्भ में देखे तो चिंतन से यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान में कांग्रेस के पास इस सहज सरल मतदाता के लिए कोई चेहरा नेतृत्व के रूप में सामने नहीं है। ऐसा कोई चित्र भी नहीं है जिस पर मतदाता भरोसा कर सके। इन स्थितियों में जमीनी कार्यकर्ताओं की सक्रियता और उनका आम जनमानस से जुड़ाव केवल कांग्रेस के पक्ष मे माहोल बना सकता है। कांग्रेस के पास कार्यकर्ता है नहीं और कांग्रेस से अधीक कांग्रेस के नेताओं के जुड़ाव अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धी में है अर्थात कांग्रेस को अहंकार के आकाश से निचे उतर कर जमीन पर आना होगा जो अब उसके लिए संभव नहीं है।
दूसरी और भारतीय जनता पार्टी पिछले लगभग दो दशक से शासन में रहते हुए अब चारित्रिक रूप से शासक बन गई है। ऊंची आवाज में माइक के सामने मुक्के पटक कर दावेदारी करने से इस संवेदनशील मतदाता पर कोई प्रभाव डाला जा सकेगा वह संभव नहीं है। कहावत है फल से लदे हुए वृक्ष का झुकना जरूरी होता है, संभवतः यह प्रकृति द्वारा बनाये गये विनम्रता के सिद्धांत का उदाहरण है। बीस वर्ष की सत्ता के बाद अब भाजपा में मुख्यमंत्री पद के लिए एक दौड़ शुरू हो गई है, जिस पर आने वाले दिनों में न संघ का और नाही संगठन का कोई नियंत्रण रहेगा। इसका प्रमुख कारण विभिन्न नेताओं से जुड़े हुए कल तक अनुशासित रहे कार्यकर्ताओं का महत्वकांशा के कारण अनुशासनहीन हो जाना होगा।
उपरोक्त दोनों ही दल राजनीति की परिभाषा और सिद्धांतों में विश्वास नहीं रखते या यह कहे कि दोनों ही दलों के नेता क्षणिक स्वार्थ पूर्ति के लिए राज्य को पुनः भुलावे की गलत फहमी पाले अपनी भविष्य की योजनाओं को कागजी तौर पर पूरा कर रहे है। कांग्रेस के पास न कोई योजना है और नाही कोई लक्ष्य है तो केवल अहंकारपूर्ण दावे और इन दावों की बुनियान कार्यकर्ताओं के बिना खोखली है। दूसरी और सत्ताधारी भाजपा संघ के सिद्धंतों से अलग हटकर अब राजनीति सेवा के लिए नहीं व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए कर रही है। जहां से भी आम मतदाता को और वह विशेष कर मध्यप्रदेश के मतदाता को कुछ भी मिल पाने की संभावना नहीं है। राजनीति का चिंतन लगातार जारी है और यही चिंतन चुनाव के काफी पूर्व भविष्य की धारा का भी निर्धारण कर देगा।

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पूरे कुएं में अनाड़ीपन की भांग…हर घण्टे नुकसान

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ना काहू से बैर/ राघवेंद्र सिंह

मध्य प्रदेश का सियासी सीन कुछ इस तरह का है कि संगठन में मजबूत भाजपा बदलाव के नाम पर खरगोश की तरह उछलते – कूदते काम कर रही हैं। निर्णयों में समझदारी और समन्वय की अपेक्षा विमर्श कम विवाद ज्यादा की तर्ज पर सब चल रहा है। सुबह कमेटियों का गठन और शाम को उन्हें भंग करने से अनाड़ीपन का जो नया चलन शुरू हुआ है उससे नुकसान प्रति घन्टे की रफ्तार से हो रहा है। पीढ़ी परिवर्तन के जिस काम का चहुंओर स्वागत होना चाहिए था वह इतना बेशऊर किया गया कि उसकी प्रशंसा के बजाए जी भरकर निंदा हो रही है। बदलाव की तेज रफ्तार ने पूरे घर के संगठक बदल तो दिए मगर उससे जो रायता फैल रहा है उसे समेटने के लिए संघ के सिफारिश करने वाले नेताओं को भी कुछ समझ सूझ नही पड़ रहा है। बदहवासी का आलम यह है कि रायता हाथ से तो कोई जुबान से समेटने का प्रयास कर रहा है। आम कार्यकर्ताओं से लेकर संघ के दिग्गजों की चिंता कमजोर और बद से बदतर होते संगठन की तरफ इशारा करती है। जिन विष्णुदत्त शर्मा की भाजपा आयु 10 वर्ष की थी उन्हें प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बना कर पार्टी में सकारात्मक क्रांति का सपना देखा गया था अब उसे बुरे सपने की तरह टूटता हुआ भी देखा जा रहा है। संघ के एक दिग्गज के साथ प्रदेश भाजपा की समीक्षा में माना गया कि अधेड़ और साठ की उम्र वाले स्वस्थ व सक्रिय पके नेताओं को अनुभवहीन युवाओं को लाने के नाम पर जिस जल्दबाजी के साथ साइड लाइन किया गया उससे पार्टी को प्रति घन्टे के हिसाब से नुकसान हो रहा है। भोपाल से लेकर पूरे सूबे में जिस तरह संगठन चल रहा है उससे लगता है आने वाले नगरीय चुनाव में भाजपा सबसे कमजोर प्रदर्शन करे तो किसी को आश्चर्य नही होगा। बस इसी बात का डर संघ परिवार और भाजपा के प्रमुख नेताओं की नींद उड़ाए हुए है।

Raghavendra Singh

भाजपा में पहली बार हुआ…
पिछले दिनों दिल्ली में भाजपा की समीक्षा बैठक में जिस रिपोर्ट कार्ड पर बात हुई उसमे पहली बार संघ नेताओं की भी उपस्थिति रही। यह कई अर्थों में बेहद अहम है। इसे भाजपा में संघ का सीधा दखल भी माना गया। अर्थात संघ अपने जिन प्रिय पात्रों को भाजपा में संगठन महामंत्री के अलावा जिन पदों पर बैठाएगा उनकी असफलताओं को ढकने के लिए खुद भी मौजूद रहेगा। पहले इस तरह के संरक्षण का भाव केवल संगठन मंत्रियों के लिए ही देखा जाता था लेकिन अब यह दायरा बढ़ कर पब्लिक पॉलिटिक्स से सीधे जुड़े रहने वाले पदों तक जा पंहुचा है। बस यहीं से संगठन की दुर्गति का बैंडबाजा बारात निकलने के हालात बन गए हैं । दिल्ली बैठक में संघ ने भी अनुभवी नेताओं को हाशिए पर लाने को अच्छा नही मानते हुए अप्रसन्नता व्यक्त की। बताते हैं इस बैठक में मुख्यमंत्री से लेकर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भी शरीक थे। सीएम- अध्यक्ष में समन्वय बढाने की बातें भी हुईं।

सुबह समिति बनी और शाम को भंग…
भाजपा में निंदक नियरे राखिए …की बात तो अब दूर की कौड़ी है। जो अखबार, पत्रकार, नेता- कार्यकर्ता सच्ची और अच्छी बात कहे उसे पार्टी विरोधी या कुंठाग्रस्त बता घर बैठाने की राह पर लगता है पूरी टीम चल पड़ी है।
एक बैठक में प्रभारी मुरलीधर राव को कहना पड़ा- ये क्या तमाशा चल रहा है कि भाजपा, युवा मोर्चा, प्रकोष्ठों की कार्यकारणी का गठन नही हो पा रहा है। 2023 में चुनाव होना है। जिलों की कार्यकारणी सुबह गठित होती है और शाम को भंग हो जाती है।
दूसरी तरफ हकीकत यह है कि भाजपा की मीडिया/प्रवक्ताओं की टीम जो कभी बहुत स्ट्रांग होती थी वह बिखरी सी है। मीडिया फ्रेंडली मुद्दों के जानकार खांटी भाजपाई उपेक्षित और उदास हैं । पूर्व संवाद प्रमुखों से लेकर मीडिया प्रमुख रहने वाले नेताओं में विजेंद्र सिंह सिसोदिया, दीपक विजयवर्गीय, गोविं मालू, डॉ हितेष वाजपेई से लेकर राजो मालवीय, प्रखर नेता रजनीश अग्रवाल को उनकी विशेषज्ञता के अनुरूप काम नही मिला। जिन शैलेन्द्र शर्मा को 2004- 05 में रोजगार बोर्ड का अध्यक्ष बनाया था उन्हें संगठन में जब कोई जिम्मेदारी नही मिली तो फिर उन्हें रोजगार बोर्ड का जिम्मा सौंप दिया गया।

राजनीति में नाबालिगों के जिम्मे भाजपा…
संघ परिवार में अक्सर प्रचारकों की संग आयु पूछी जाती है। उसी के हिसाब से उनका महत्व होता है ऐसे ही भाजपा में भी पार्टी के लिए काम करने वालों की आयु पुष्टि आती है आमतौर से आज की तारीख में जो भाजपा में संगठन के कर्ताधर्ता है उनकी भाजपा आयु दो से लेकर 12 वर्ष तक की है और उनके अधीनस्थ काम करने वालों की पार्टी में प्रदेश जे लेकर मंडल तक काम करने वालों की राजनीतिक आयु 30 से 40 साल तक की है। ऐसे में उन्हें जो ऊपर से निर्देश मिलते हैं वह अपरिपक्व होने के साथ-साथ राजनीति में अनाड़ीपन के भी होते हैं। यही वजह है कि प्रदेश भाजपा की कार्यसमिति की बैठक जो आमतौर से तीन महीने में होती है वह ढाई साल तक नहीं हो पाती । वह इसके अलावा भाजपा में युवा मोर्चा और महिला मोर्चा सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इत्तेफाक से युवा मोर्चा के जो अध्यक्ष पिछले दो बार से रहे हैं उनका राजनीतिक अनुभव शून्य से शुरू होता है। वर्तमान में भाजयुमो प्रदेश अध्यक्ष वैभव पवार अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से प्रदेश भाजपा में आते हैं और फिर सीधे मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बना दिए जाते हैं । अनुभव न आंदोलन कुछ नही। गणेश परिक्रमा का प्रताप बस। इसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। पद तो जल्दी मिला लेकिन संगठन चलाने की गम्भीरता तो अनुभव से ही आएगी। अध्यक्ष प्रेस वार्ता रखते हैं और खुद ही गैरहाजिर हो जाते हैं। अनाड़ीपन की यह पूरी एक श्रंखला है जो प्रदेश भाजपा से लेकर युवा मोर्चा उनके प्रभारियों तक इस कदर है कि केंद्रीय नेतृत्व और बतौर उनके नुमाइंदे भेजे गए प्रदेश प्रभारी भी परेशान हैं। हालात ये है कि पूरे आसमान में ही छेद है पैबन्द कहां तक लगाए जाएं। टीम कैप्टन के नाते अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा भी अवश्य चिंतित होंगे। संगठन की कमजोरी उनके लिए भी अच्छी खबर तो नही है। नगरीय निकाय के चुनाव हुए तो बहुत सम्भव है पार्टी अब तक का सबसे कमजोर प्रदर्शन करे। अनुशासन में रहने वाले सन 2000 के पहले वाले कार्यकर्ता मिस कॉल वाली नई टीम में अल्पसंख्यक की तरह हैं। नए हैं तो उनके सपने भी पार्षद और मेयर बनने वाले हैं। पार्टी के लिए निष्ठा और समर्पण से काम करना उनकी डिक्शनरी में थोड़ा मुश्किल से मिलेगा। इसलिए टिकट पाने के लिए जूतमपैजार वाला संघर्ष भी दिख सकता है। एक जिले की यात्रा के दौरान प्रदेश प्रभारी मुरलीधर राव ने बेनर पोस्टर, होर्डिंग की भरमार देखते हुए नसीहत दी कि होर्डिंग लगाने और हनुमान चालीसा जेब मे रखने से टिकट नही मिलेगा। पार्टी के लिए काम करना होगा।
दरअसल कार्यकर्ताओं को संस्कारित करने वाले संगठन महामन्त्रियों की गर्व करने वाली परम्परा में अब पितृ पुरुष कुशाभाऊ ठाकरे हैं न रसूख और रुआबदार प्रो कप्तान सिंह सोलंकी जैसे कद्दावर संगठनमंत्री हैं। इसलिए तो प्रभारी मुरलीधर राव को हर बार भोपाल से लेकर दिल्ली तक बैठकों में जो कहना सुनना पड़ रहा है प्रतिदिन पार्टी की चिंता को और भी स्याह करता प्रतीत हो रहा है।
संघ के सहकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले से लेकर प्रदेश प्रभारी के बयानों की बानगी सबको चिंता में डालने वाली है।
पीढ़ी परिवर्तन के नाम पर पूरे घर के बदल डालेंगे की तर्ज पर पुराने कार्यकर्ताओं की जगह नए रंगरूटों ने ली है उससे भाजपा के सभी वरिष्ठ परेशान है। बड़ी संख्या में अनुभवियों को हाशिए करने पर श्री होसबोले ने एतराज जताया है। संघ परिवार के जिन दिग्गजों की सिफारिश पर भाजपा में युवाओं के नाम पर जो पदाधिकारी बने हैं वे सब गुड़ गोबर करने में जुटे है।

कांग्रेस की कछुआ चाल…
मध्यप्रदेश में कांग्रेस बहुत खामोशी के साथ काम कर रही है। अध्यक्ष के तौर किसी नए नेता को लाने के बजाए कमलनाथ को बरकरार रखा। विवादों से बचते हए एक तरह से यह फिलहाल ठीक लगता है। जमीनी कमान फील्ड मार्शल दिग्विजयसिंह सम्हाले हैं। ग्वालियर – चंबल इलाके में कांग्रेस ज्योतिरादित्य सिंधिया को उलझाकर कमजोर करना चाहती है। कमलनाथ- दिग्विजयसिंह की जोड़ी का असर नगर निगम चुनावों में साफ देखने को मिलेगा। इन दोनों नेताओं को भाजपा में पीढ़ी परिवर्तन से उपजे असन्तोष
का अनुमान है। इसका वे चतुराई के साथ लाभ लेने की तैयारी में जुटे हैं। दिग्विजयसिंह के साथ युवक कांग्रेस अध्यक्ष और महिला कांग्रेस अध्यक्ष उनकी रणनीति के अनुरूप कदमताल कर रहे हैं। वैसे भी उन्हें कार्यकर्ताओं को एकजुट करना और उनसे काम कराना आता है।

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कमलनाथ कब तक रह पाएंगे कांग्रेस के नाथ…

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ना काहू से बैर/राघवेंद्र सिंह

अप्रैल में ज्योतिषी गणना के मुताबिक शनि, राहु – केतु समेत नौ ग्रहों ने अपनी चाल और घर बदले हैं। इन सब का असर सियासत और समाज दोनों पर पड़ने वाला है। कांग्रेस के साथ भाजपा भी इससे अछूती नही रहेगी। मध्य प्रदेश कांग्रेस पर सबसे पहले इसका प्रभाव पड़ा है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के महाबली वयोवृद्ध नेता कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष में से फिलहाल नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ना पड़ा है। वरिष्ठ नेता डॉ गोविंद सिंह को नेताप्रतिपक्ष बनाया गया है। इसके बाद 2023 के विधानसभा चुनावों को लेकर जो चुनौतियां हैं उनके सामने कमलनाथ कितना टिक पाते हैं यह आने वाला वक्त बताएगा लेकिन अभी से कहा जाने लगा है कि कांग्रेस को 24 घंटे काम करने के लिए किसी युवा की जरूरत है ।

Raghavendra Singhमैं ज्योतिष का जानकार तो नहीं हूं लेकिन कहा जाता है कि ग्रहों की चाल का असर समाज के साथ राजनीति करने वालों पर भी पड़ता है। साथ ही ग्रहों के परिवर्तन के पहले सही संकेत मिलना शुरू हो जाते हैं । ज्योतिष और ग्रहों की चाल के अतिरिक्त राजनीतिक रूप से भी हालात को समझने की कोशिश की जाए तो कांग्रेसमें लंबे समय से कमल नाथ की तुलना में युवा और सकरी सक्रिय नेता को प्रदेश कांग्रेस की बागडोर सौंपने की बात होती रही है पूर्व राज्यपाल और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे अजीज कुरैशी तो सार्वजनिक तौर पर कमलनाथ को नेता प्रतिपक्ष और अध्यक्ष के पद से हटाने की बात कर चुके हैं। पार्टी नेतृत्व परिवर्तन की जो बात अजीज कुरैशी जैसे वरिष्ठ नेता ने की थी दरअसल वह कांग्रेस के कई नेताओं व कार्यकर्ताओं की भावनाओं को व्यक्त करती है। लेकिन नेता प्रतिपक्ष से कमलनाथ की विधायकों कांग्रेस के ही लोग पूर्ण परिवर्तन नहीं मानते उनका मानना है प्रदेश कांग्रेस को एक ऐसा अध्यक्ष चाहिए जो 24 घंटे कांग्रेस की नीति, कार्यकर्ता और जनता के लिए काम करें। प्रदेश की राजनीति में कभी छोटे भाई और बड़े भाई के रूप में काम करने वाले कमलनाथ व दिग्विजय सिंह के बीच पिछले दिनों जो मतभेद उभर कर आए थे उससे कमलनाथ काफी कमजोर हुए नतीजा यह हुआ की 2 महीने के भीतर कमलनाथ को नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ना पड़ा और अब संगठन को मजबूत करने के साथ भाजपा से मिलने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए मालवा या बिंद क्षेत्र से किसी जुझारू और संजीदा लीडर की जरूरत है जो प्रदेश कांग्रेश को संभाल सके इसी बीच कमलनाथ के कट्टर समर्थक सज्जन सिंह वर्मा ने संकेत दिया है कि कमलनाथ जी वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता हैं उनकी जरूरत पार्टी के लिए मध्य प्रदेश के अलावा दिल्ली और जिन राज्यों में चुनाव है वहां महसूस की जा रही है इसका मतलब अगर खोजा जाए तो आने वाले दिनों में संभवत वर्मा द्वारा बताई गई आवश्यकताओं के मुताबिक कमलनाथ को कांग्रेस कोई राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी भी सौंप सकती है इसका मतलब पहले नेता प्रतिपक्ष और बाद में प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद से भी कमलनाथ विदा हो सकते हैं असल में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव और 2024 में लोकसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस हाईकमान मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जनता और कार्यकर्ता से जुड़े किसी मजबूत नेता को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपना चाहती हैं। पिछले चुनाव में समन्वयक के रूप में पूर्व मुख्यमंत्री नर्मदा यात्री दिग्विजय सिंह ने यह काम किया था। नतीजा सबके सामने है। पन्द्रह साल बाद प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में कमलनाथ और उनके सलाहकार सरकार को चला नहीं पाए। प्रशासक के रूप में तो कमलनाथ सफल रहे लेकिन सीएम के रूप में वे सरकार के शिल्पी बने दिग्विजय सिंह और मंत्री- विधायकों और ज्योतिरादित्य सिंधिया को साथ नही रख पाए। नतीजा सबके सामने हैं कांग्रेस की सरकार गिर गई बात यहीं नहीं रुके इसके बाद कमलनाथ और दिग्विजय सिंह में भी मतभेद गहराने लगे। यह बात तब सबके सामने आई जब किसानों के एक प्रतिनिधि मंडल को लेकर तयशुदा वक्त पर दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से मुलाकात करने वाले थे। मगर यह मुलाकात रद्द कर दी गई। उसके पीछे वजह यह बताई गई कि दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री शिवराज से किसान प्रतिनिधि मंडल को मिलने का जो समय लिया था उसकी जानकारी या अनुमति पहले कमलनाथ क्यों नही ली गई ? यह बात दिग्विजय सिंह और उनके समर्थकों को नागवार गुजरी। इसके बाद ही कांग्रेस के इन दोनो दिग्गजों में दूरियां बढ़ने लगी । कांग्रेस हाईकमान के पास सभी जानकारियां पहुंची और इसी बीच राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर मैं अपने प्रेजेंटेशन में एक व्यक्ति एक पद के साथ युवाओं को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपने की बात की तो उसे पार्टी सुप्रीमो सोनिया गांधी समेत लगभग सभी लोगों का समर्थन मिला। ऐसा लगता है आने वाले दिनों में मध्य प्रदेश कांग्रेस को लेकर जो बहुत से परिवर्तन हो गए उसमें दिग्विजय सिंह के सोच- चिंतन और उनकी टीम का अक्स जरूर नजर आएगा। साल के अंत तक बहुत संभव है प्रदेश कांग्रेस को नए अध्यक्ष भी मिल जाए। इसमें अर्जुन सिंह के पुत्र वरिष्ठ कांग्रेस नेता अजय सिंह राहुल के साथ अरुण यादव जीतू पटवारी के नाम भी चर्चाओं में है अजय सिंह राहुल को प्रदेश कांग्रेस की कमान मिलती है तो एक तरह से विंध्य क्षेत्र जहां भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में एक तरफा प्रदर्शन किया था वहां भाजपा को रोकने में कांग्रेस को मदद मिल सकती है। महाकौशल में कमलनाथ का असर कांग्रेस के काम आ सकता है चंबल क्षेत्र में नेता प्रतिपक्ष डॉक्टर गोविंद सिंह कांग्रेस को सिंधिया के सामने मजबूत कर सकते हैं मालवा में दिग्विजय सिंह और उनके समर्थक निमाड़ और आदिवासी बहुल क्षेत्र में में सहकारिता के कद्दावर नेता रहे सुभाष यादव के पुत्र अरुण यादव प्रभावी भूमिका अदा कर सकते हैं कांग्रेस हाईकमान इन सब को एकजुट कर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अच्छे परिणामों की उम्मीद लगा सकता है ।

शिव के गणों विष्णु के पदाधिकारियों में बदलाव के संकेत…
मध्य प्रदेश भाजपा को लेकर पिछले दिनों दिल्ली में जो बैठक हुई वह अपने आप में ऐतिहासिक है। ऐसा कभी नहीं हुआ कि भाजपा की बैठक में संघ की भी हिस्सेदारी रही हो। इसकी वजह यह बताई जाती है की पार्टी हाईकमान को उस फीडबैक मिला है वह बहुत चिंता में डालने वाला है। कांग्रेस को वेंटिलेटर पर बताने वाली भाजपा के पास ग्राउंड जीरो की जो रिपोर्ट है उसमें विधायक मंत्रियों के साथ संगठन भी कार्यकर्ता और जनता से कम कनेक्ट हो पा रहा है। इसमें सिंधिया समर्थक मंत्री भी निशाने पर है। सबको लगता है मोदी का मैजिक विधानसभा चुनाव में भी उनकी नैया पार करा देगा लेकिन संगठन के वरिष्ठ नेता शिव प्रकाश और मुरलीधर राव के साथ संघ ने जो जानकारी भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को दिए वह निश्चित ही बहुत चौंकाने वाली है यही वजह है कि भाजपा की महत्वपूर्ण बैठक में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समेत प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा प्रदेश प्रभारी शिव प्रकाश मुरलीधर राव के साथ संघ के वरिष्ठ नेता भी उसमें शामिल हुए बैठक के बाद संकेत मिले हैं की मंत्री जो काम नहीं कर रहे हैं उनकी विदाई हो सकती है कुछ के विभाग बदले जा सकते हैं और संगठन में भी जो नेता चुनाव लड़ना चाहते हैं उनको भी समझाइश दी जा रही है कि वे संगठन के दायित्व पर ध्यान दें या अपने चुनाव क्षेत्र पर। दोनो में से किसी एक काम को चुनने के लिए कहा जा सकता है। इसका मतलब आने वाले कुछ महीने भाजपा नेताओं की धुक धुकी बढ़ाने वाले होंगे।

अनुराधा शंकर सिंह और आधी आबादी
मध्य प्रदेश की अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक अनुराधा शंकर सिंह ने नौकरी पेशा महिलाओं की उपेक्षा और उनके लिए बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने पर जो बात कही वह इन दिनों चर्चा में है। पिछले दिनों पुलिस मुख्यालय में शताधिक महिला पुलिस अफसर और महिला पुलिस सिपाहियों के बीच शोषण और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कुछ प्रश्न उठाए। इसमें मंत्रालय में वीआईपी फ्लोर पर महिलाओं के लिए वाशरूम का नही होना चिंता की बात है। महिलाओं की उपेक्षा की यह बात तब सुर्खियों में आई जब सीएम शिवराज सिंह चौहान 2 हजार 52 एम्बुलेंस का लोकार्पण कर रहे थे। इसमें इसमें महिलाओं के लिए जननी सुरक्षा योजना को महत्ता दी गई है। सीएम के पसंदीदा अफसरों में रही अनुराधा शंकर सिंह ने महिलाओं खास तौर पर महिला पुलिस को लेकर जो चिंता जताई है उस पर जरूर सरकार सकारत्मक निर्णय करेगी। वैसे भी सीएम बहनों और भांजियों के मुद्दे पर बेहद सतर्क और संवेदनशील रहते हैं।

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नक्सल और माओवाद में बुनियादी फर्क समझिए!

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जयराम शुक्ल

बस्तर फिर अशांत है। चरमपंथियों ने बंद का आह्वान किया है। मीडिया और अन्य वर्ग के लोग इसे नक्सलियों का एक्शन बता रहे हैं। जबकि वस्तुतः ये कानू सान्याल, चारू मजूमदार की नक्सलबाड़ी के क्रांतिदूत नहीं, अपितु ये वहसी राक्षस हैं, ये नक्सली नहीं, माओवाद की नकाब ओढ़े फिरौती और चौथ वसूलने वाले राष्ट्रद्रोही, खूनी दरिन्दे, डकैत और लुटेरे हैं।
नक्सल, यहां से आया

नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुई है जहाँ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने 1967 मे जमीदारों के खिलाफ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की। पं.बंगाल की तत्कालीन सरकार सामंतों की पोषक थी और वे खेतिहर मजदूरों का क्रूरता के साथ शोषण करते थे।
सरकार जब मजदूरों, छोटे किसानों की बजाय जमीदारों के पाले में खड़ी दिखी तो यह धारणा बलवती होती गई कि मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिये सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं, जिसकी वजह से उच्च वर्गों का शासन तंत्र और फलस्वरुप कृषितंत्र पर वर्चस्व स्थापित हो गया है।

Jay Ram Shukla 1 इस न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है। 1967 में “नक्सलवादियों” ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। इन विद्रोहियों ने औपचारिक तौर पर स्वयं को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया और सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी।
1971 के आंतरिक विद्रोह (जिसके अगुआ सत्यनारायण सिंह थे) और मजूमदार की मृत्यु के बाद यह आंदोलन एकाधिक शाखाओं में विभक्त होकर कदाचित अपने लक्ष्य और विचारधारा से विचलित हो गया।
कानू सान्याल ने से अपने आन्दोलन की यह दशा देखकर 23 मार्च 2010 को नक्सलबाड़ी गांव में ही खुद को फांसी पर लटकाकर जान दे दी थी। मरने से एक वर्ष पहले बीबीसी से बातचीत में सान्याल ने कहा था कि वो हिंसा की राजनीति का विरोध करते हैं.
उन्होंने कहा था, ‘‘ हमारे हिंसक आंदोलन का कोई फल नहीं मिला. इसका कोई औचित्य नहीं है. ’’
नक्सलबाड़ी की क्रांति पं.बंगाल के जमीदारों के खिलाफ थी..चूकि तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे जो कि खुद बड़े जमीदार थे के नेतृत्व वाली पं.बंगाल सरकार जमीदारों की पक्षधर थी इसलिए इस लड़ाई को सरकार के खिलाफ घोषित कर दिया गया था।
बहरहाल अपनी मौत से पहले कानू सान्याल ने हिंसक क्रांति को व्यर्थ व अनुपयोगी मान लिया था। नक्सलबाड़ी की क्रांति किसान-मजदूरों की चेतना का उद्घोष थी।
नक्सलबाड़ी की क्रांति में खेतिहर महिलाएं भी शामिल थीं..जिन्होंने हंसिया,खुरपी,दरांती से सामंती गुन्डों का मुकाबला किया..। अपने आरंभकाल में यह क्रांति अग्नि की भांति पवित्र व सोद्देश्य थी..इसके विचलन को स्वीकारते हुए ही कानू सान्याल ने आत्मघात किया।
सन् 2006 में एक पत्रिका की कवर स्टोरी के संदर्भ में मैने कानूदा से बातचीत की थी।
क्या ये नहीं मालूम कि कानू सान्याल और चारू मजूमदार का नक्सलवाद 77 की ज्योतिबसु सरकार के साथ ही मर गया था।
जिस भूमिसुधार को लेकर और बंटाई जमीदारी के खिलाफ नक्सलबाड़ी के खेतिहर मजदूरों ने हंसिया और दंराती उठाई थी उसके मर्म को समझकर पं.बंगाल में व्यापक सुधार हुए , साम्यवादी सरकार के इतने दिनों तक टिके रहने के पीछे यही था।
उस समय के नक्सलबाड़ी आन्दोलन के प्रायः सभी नेता मुख्यधारा की राजनीति में आ गए थे। चुनावों में हिस्सा भी लिया। मेरी दृष्टि में इन आदमखोर माओवादियों को नक्सली कहा जाना या उनकी श्रेणी में रखना उचित नहीं।
वैसे बता दें कि आधिकारिक तौर पर भी ये नक्सली नहीं माओवादी हैं और सरकार भी मानती है कि ये राष्ट्र के खिलाफ युद्ध छेड़े हुए हैं। जबकि नक्सलियों का कदम विशुद्ध रूप से सामंती शोषण के खिलाफ था।
दरअसल पड़ोस के किसी भी देश को अस्थिर और आंतरिक विद्रोह की स्थिति उत्पन्न करना चीन की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। विचारों के साथ अस्त्र-शस्त्र और हिंसक क्रांति का नारा समता मूलक समाज के लिए एक छलावा है। नागरिक अधिकारों को पाँव तले रौंदना वाला चीन(वहां की सत्ता) स्वयं दुनिया भर में गरीबों के शोषण के लिए बदनाम है लेकिन वह तमाम उन देशों में ऐसे अपराधिक गिरोहों को फंड उपलब्ध कराता है ताकि सरहद पर लड़ने की बजाय वह उन्हें घर के भीतर ही अस्थिर कर सके। दुर्भाग्य यह कि देश का बड़ा तबका नकस्ली व माओवादी में इस बुनियादी भेद से अब तक अनजान है।

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