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विंध्‍य से सिंगरौली की दस्तक सुनिए..!

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जयराम शुक्ल
नगर निगम चुनाव (municipal elections) के पहले चरण में विंध्य ( Vindhya Region) की तीन सीटों में से दो, सिंगरौली (Singrauli) और सतना (Satna) के महापौर (Mayor) का फैसला हो गया है।
इस क्षेत्र की राजनीति के इपीसेंटर कहे जाने वाले रीवा (Rewa) नगर निगम के चुनाव का परिणाम 20 जुलाई को निकलेगा।
इन दोनों परिणामों के बारे में प्रथमदृष्टया कहें तो सतना में बीजेपी को योगेश ताम्रकार (Yogesh Tamrakar) की जीत के लिए कांग्रेस (Congress) के बागी बसपा उम्मीदवार सईद अहमद (Sayeed Ahmed) का अभिनंदन करना चाहिए।
सिंगरौली में बीजेपी संगठन की स्वेच्छाचारिता और सत्ता के दंभ ने ‘आम आदमी पार्टी’ के लिए आगे बढ़कर पथ प्रशस्त किया है।
यहां से रानी अग्रवाल 9 हजार से ज्यादा के सम्मानजनक अंतर से जीतीं हैं। इस तरह मध्यप्रदेश की मुख्यधारा की राजनीति में ‘आप’ के लिए दरवाजा खुले हैं।

Jayram Shukla

◆संघ के गढ़ सतना के संकेतों को ऐसे समझिए
मतगणना के अंतिम परिणाम में बीजेपी के योगेश ताम्रकार को 62975 मत, कांग्रेस के सिद्धार्थ कुशवाहा को 38228 मत और बसपा के सईद अहमद को 26094 मत मिले हैं।
यानी कि बीजेपी यहां 24747 मतों से जीती है। यह संख्या जितनी बड़ी है, उतनी उत्साह जनक नहीं है। वजह कांग्रेस के 38228 में कांग्रेस के बागी और बसपा प्रत्याशी सईद के वोट 26094 जोड़ दिए जाएं तो यह संख्या पहुंचती है 64322। यानी कि बीजेपी को मिले वोट से पौने 2 हजार ज्यादा हैं।
यद्यपि यह भी कहना सही नहीं होगा कि सईद अहमद न लड़ते तो ये पूरे वोट कांग्रेस को मिल ही जाते। लेकिन जीतने के लिए बीजेपी के दांतों पसीना आता और जीत का फासला बमुश्किल हजार-बारह सौ में सिमट जाता। बीजेपी को इस जीत के संकेत समझने होंगे
इस दृष्टि से देखें तो सतना में बीजेपी को इस जीत के लिए कांग्रेस के बागी सईद अहमद का अभिनंदन करना चाहिए। महापौर के पिछले चुनाव में बीजेपी यहां से 28000 मतों से जीती थी। जबकि कांग्रेस से उसका सीधा मुकाबला था।
2018 के विधानसभा चुनाव में सतना जिले की 7 सीटों में कांग्रेस को 2 मिली थीं। फिर रैंगांव उपचुनाव में एक और जुड़ गई।
संकेत यह कि यहां बीजेपी की साइज घट रही है और कांग्रेस नाले से निकलकर नदी तक पहुंचने की ओर अग्रसर है।
कुलमिलाकर इस जीत पर बीजेपी को फूलकर कुप्पा होने की जगह इसके संकेतों को समझने की जरूरत होगी।

◆सिंगरौली को सिंगुर बना देने का खामियाजा तो भुगतना ही होगा..
अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने मध्यप्रदेश की राजनीति में जिस सिंगरौली से दस्तक दी है, उसके जियोपॉलिटिकल महत्व पर अभी शायद किसी की नजर नहीं है।
सिंगरौली मध्यप्रदेश का वह भू-भाग है, जहां से उत्तरप्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमा लगती हैं। कोयला और बिजली के इस क्षेत्र की आबादी में यूपी, बिहार, बंगाल, उड़ीसा के लोग भी हैं, जो वोट देते हैं।
‘आप’ का यहां से इसलिए भी जीतना उल्लेखनीय हो जाता है।
इस चुनाव का परिणाम कहता है कि यहां अब बीजेपी का वह बुखार उतरने लगा है, जो 2008 में जिला बनाने के साथ ही जनजन में चढ़ गया था।
सिंगरौली को जिला बनाना शिवराज सिंह चौहान का बतौर मुख्यमंत्री एक मास्टर स्ट्रोक था। तब से अब तक हुए विधानसभा- लोकसभा चुनावों में यहां की जनता झोलीफाड़ समर्थन देती आई है।
सिंगरौली को जिला बनाते समय शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि वो इसे सिंगापुर बना देंगे। यथार्थ में हुआ उल्टा सिंगरौली सिंगुर बन गया। वहीं सिंगुर (लुटा-पिटा और पूँजीपतियों द्वारा शोषित) जिसने ममता बनर्जी को राजनीतिक प्राणवायु दिया।
इन 14 वर्षों में सीधी से सिंगरौली की एक अदद सड़क तक चलने लायक नहीं बना पाए और इस बीच सिंगरौली.. अंबानी, अड़ानी, रुइया, बिरला और भी कई छोटे मझोले उद्योगपतियों का भू-वन हड़प साम्राज्य स्थापित हो गया।

◆आप ने पूरे शोध अध्ययन के साथ सिंगरौली को अपना ठिकाना बनाया..
बीजेपी के संगठन की स्वेच्छाचारिता और सत्ता के दंभ ने राजनीति के नए विकल्प के लिए जगह दी। वर्षों तक कांग्रेस से और अब बीजेपी से छले जाने के बाद ‘आम आदमी पार्टी’ ने पूरे शोध अध्ययन के साथ सिंगरौली को अपना ठिकाना बनाया है।
इस नगर निगम चुनाव में 9 हजार से अधिक मतों से विजयी हुईं रानी अग्रवाल की जीत के मायने वैसे नहीं जैसे कि अन्य महापौरों के हैं। यहां की जनता ने कांग्रेस और भाजपा को लगभग बराबरी से तौलकर भी यह संदेश दिया है अब यहाँ की राजनीति में ये दोनों दल एक ही थैली के चट्टे-बट्टे।

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सद्गुरु की तलाश में……!

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गुरुपूर्णिमा/जयराम शुक्ल
विगत कुछ वर्षों से गुरु पूर्णिमा पर आस्था का प्राकट्य अपनी पराकाष्ठा में देखने को मिलने लगा है। इसे ऐसा भी कह सकते हैं कि अँधेरा जितना ही घना होता है रोशनी की किरण उतनी ही महत्वपूर्ण होती जाती है। भौतिकवादी दौर ने हमारे सनातनी ज्ञान और मूल संस्कृति को ढाँप लिया है। अवचेतन में हम उसी अंधकार से निकलने की चेष्टा करते हैं। पर सही पथप्रदर्शक न होने की वजह से एक गड्ढे से निकलते हैं तो चोहड़े में गिर पड़ते हैं। ऐसे में सद्गुरु की आवश्यकता और भी प्रबल हो जाती है। गुरु तो गली-गली मिल जाएंगे पर सद्गुरु को विवेक के टार्च से तलाशना पड़ता है। गुरुपूर्णिमा इस विवेक के टार्च को प्रज्जवलित करने का अवसर है जो प्रतिवर्ष आता है। जिसे सद्गुरु मिले वे वैसे ही धन्य हो जाते हैं जैसे कि गोस्वामी तुलसीदास..।
ज्ञानशिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी के लिए बजरंगबली देवता, ईश्वर नहीं, बल्कि सद्गुरु हैं। गोस्वामी जी कहते हैं-
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीश तिहुँ लोक उजागर।।
जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहुँ गुरुदेव की नाईं।।
महाकवि तुलसीदास ने हनुमान जी को गुरु बनाया और उनकी प्रेरणा से रचित ग्रंथों ने उन्हें अजर-अमर कर दिया, तो मैं मानता हूँ कि हनुमानजी महाराज से बड़ा सद्गुरु इस जगत में कोई नहीं..। महाभारत में यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा- कि पंथाः?
जवाब मिला- महाजनों येन गतो सो पंथाः।
यानी कि श्रेष्ठ जन जिस मार्ग पर चलें वही अनुकरणीय- अनुशरणीय है। सो इस जगत में मैं हनुमानजी महाराज से श्रेष्ठ गुरु और किसे मानूँ.. सो अपन ने भी। बजरंगबली को गुरुदेव मान लिया। सत्य यही है कि हनुमानजी कागज-कलम मसिजीवियों के लिए प्रथमेश हैं।
गोसाईं जी जब भी वे अपने गुरु का बखान करते हैं तो समझिये हनुमान जी का ही करते हैं। हनुमान चालीसा का आरंभ.. श्री गुरु चरण सरोज रज..से करते हुए कामना करते हैं और ऐसी ही कामना की प्रेरणा देते है..
सच पूछिये जिंदगी गुरु बिन व्यर्थ है। अध्यापक, शिक्षक, उपदेशक तो हमको हर मोड़, गली, चौरस्ते में मिल जाते हैं पर गुरु नहीं। बात सिर्फ गुरु भर से ही नहीं बनती। कबीर-नानक कहते हैं गुरु नहीं ज्ञान व मुक्ति के लिए सद्गुरु चाहिए। क्योंकि सदगुरू दुर्लभ ही मिलते है, गुरू के वेश में घंटाल ज्यादा।
कभी कभी लगता है कि राम-कथा सद्गुरु और गुरुघंटाल के बीच का भी संग्राम रहा। यानी कि हनुमानजी और रावण के बीच का। पुराणों में रावण को भी तो परमज्ञानी और रक्षसंस्कृति का प्रवर्तक बताया गया है।
एक प्रसंग से मैं अपनी बात प्रारंभ करता हूँ। हनुमानजी लंका जाते हैं तो सबसे पहले लंका की कुलरक्षक देवी लंकिनी को अपनी शिष्या बनाने का काम करते हैं। लंकिनी हनुमानजी से कहती है- तू तो मेरा अहार है कैसे चोरी छुपे घुसा जा रहा है। हनुमानजी जवाब देते है..जगत का सबसे बड़ा चोर तो लंका में रहता है। पराई नारी को छल से हर लाया। तेरा काम यदि लंका की चोरों से रखवाली करनी है तो पहले रावण को ही पकड़ लंकनी भ्रमित हो गई..कि
कौन बड़ा चोर, रावण कि हनुमानजी? गोस्वामी जी कहते हैं-
मुटका एक महाकपि हनी।
रुधिर वमत धरती ढनमनी।।
इस चौपाई को संकेतों में समझिए। भला बजरंगबली के एक मुटके से कोई बच सकता है और वह भी जो राक्षस कुल का है। हनुमानजी ने लंकनी को भौतिक रूप से मुष्टिका प्रहार नहीं किया..वह मुटका ज्ञान का मुटका था। उस मुटके ने लंकनी को लंका के पापों से ‘विरक्त’ कर दिया। विरक्त होने के बाद –
पुनि संभार उठी सो लंका।
जोरि पानि कर विनय सशंका।।
और उसके बाद लंकनी तो मानों परमज्ञानी और भगवद्चरित्र की प्रवाचक ही बन गई। गोसाईं जी ने सुंदरकांड का सबसे खूबसूरत व अर्थवान दोहा लंकनी के खाते में डाल दिया। कौन सा दोहा..
तात स्वर्ग-अपवर्ग हिय
धरी तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि
जो सुख लव सत्संग।।
यानी कि तराजू के पलड़े में सत्संग के सुख के आगे स्वर्ग का सुख पासंग बराबर नहीं है।
बजरंगी बली का वह मुटका ज्ञान का मुटका था, जो लंकनी की पीठ पर नहीं मष्तिष्क पर पड़ा और वह लंका में हो रहे अन्याय.. रावण के धतकरमों से ‘वि-रक्त’ हो गई। सद्गुरु का महात्म्य देखिए कि उससे संस्कारित शिष्य तत्काल ही अपने गुरु को उपदेश देने लगता है शुभेच्छा व्यक्त करने लगता है।
गोसाईं जी ने एक और खूबसूरत चौपाई लंकनी के खाते में डाल दी..और डालें भी क्यों न लंकनी को उन्होंने अपनी गुरुबहन जो मान लिया। तो वो चौपाई है-
प्रबिसि नगर कीजै सब काजा।
ह्रदय राखि कौशलपुर राजा।।
गजब की चौपाई है यह। हनुमानजी तो रामकाज के लिए कौशलाधीश भगवान रामचंद्र को ह्रदय में स्थापित करके ही लंका चले थे..जिस लंकनी को उन्होंने संसारसागर से विरक्त कर दिया वही अब उन्हें उपदेश दे रही है।
सद्गुरु की यही असली पहचान है कि उनका शिष्य भी उन्हीं की भाषा बोलने लगे। सो मैंने अपना सद्गुरु हनुमानजी को ही मान लिया। वे मेरे लिए चमत्कारिक देवता या रुद्रांश नहीं हैं मैं उन्हें वैसे ही सद्गुरु के रूप में देखता हूँ जैसे वि-रक्त होने के बाद लंकिनी..।
बजरंगबली परमप्रभु की प्राप्ति विरक्त होने का ज्ञान देते हैं और इधर मनुष्य है कि उसका हर रिश्ता स्वार्थ की रस्सी से बँधाँ होता है। अब तो पिता और पुत्र के बीच में भी यही रिश्ता देखने को मिलता है, दूसरों को क्या कहिए।
दाढी वाले कनफुकवा तोंदियल अपन की समझ में कभी नहीं आए। एक कान में जो मंत्र फूकते हैं वह दूसरे से निकल जाता है। फिर उनके आशीर्वाद का वजन भी भक्त की आर्थिक हैसियत के हिसाब से होता है।
अजकल ऐसे महंत, पंडे भी अपनी महिमा की मार्केटिंग करते हैं। बाकायदा उनकी प्रपोगंडा टीम होती है जो प्रचारित करती है कि ये कितने महान व चमत्कारी हैं। देश और बाजार के कौन कौन जोधा उनके चेले हैं।
ऐसे भी कई गुरू हैं जो औद्योगिक घरानों के बीच अर्बिटेशन का काम करने के लिए जाने जाते हैं।
एक बार एक मित्र एक चमत्कारी संत के यहां ले गए। चुनाव का सीजन था। टिकटार्थी लाइन पर लगे थे। मित्र भी लाइन में लग गए। संतजी भगत के चढावा के हिसाब से पार्षदी से लेकर सांसदी तक की टिकट के लिए मैय्या से विनती करते थे। मित्र के लिए मैय्या से विधायकी की सिफारिश की। अब तक मित्र के उम्र की मैय्यत भी निकल गई टिकट नहीं मिली।
चमत्कारी संत के लगुआ ने बताया कि मेरे मित्र के प्रतिद्वंद्वी ने ज्यादा भक्ति की सो टिकट उसको मिल गई। सो उसी दिन समझ में आ गया कि ..जो ध्यावे फल पावे..का क्या अर्थ होता है।
बहरहाल हर गुरुपूर्णिमा में चाँदी तो इन्हीँ की कटती है। ये अपने अपने विश्वास की बात है..विश्वास जिंदा रहे..धर्म के नाम का धंधा फले फूले। इनकमटैक्स, इनफोर्समेंट की काली छाया इनपर कभी न पडे़। जनता टैक्स पर टैक्स दे देकर इनके दर पर जैकारा मारती रहे। सरकारें आती जाती रहें और आश्रमों का टर्नओवर इसी तरह दिनदूना रात चौगुना बढता रहे।
बचपन में भागवत कथा सुनने जाता था। देवताओं राक्षसों के बीच ढिसुंग-ढिसुंग की कहानियां सुनकर बड़ा मजा आता था। पर जब गुरूबाबा काम, क्रोध, मद, मोह और माया(धन दौलत) त्यागने का उपदेश देने लगते तो बोरियत होने लगती थी।
अपने गांव में देखा गुरूबाबा लालबिम्ब.और जजमान मरियल सा। रहस्य था गुरूबाबा दस दिन देशी घी की हलवा पूरी छानते थे और उनके आदेश पर बपुरा जजमान उपासे कथा सुनता था।
गए साल मित्र के यहां भागवत हुई ।रिश्ता निभाना था सो गया..पता चला मोहमाया, लोभ त्यागने का उपदेश देने वाले पूरे दस लाख के करारनामे में आए थे।
सो ऐसे कई वाकए हैं कि न मेरा शिक्षा में कोई गुरु हुआ, न पेशे में और न ही कनफुकवा मंत्र देने वाला।
मैं तलाशता रहा कि कोई गुरु मिले स्वामी रामानंद जैसा जो कान में यह फूंकते हुए ह्रदय में उतर जाऐ ..कि जाति पाँति पूछे नहि कोय,हरि को भजै सो हरि का होय। रैदास जैसा भी कोई नहीँ मिला जिसके मंत्र ने क्षत्राणी मीरा कृष्ण की दीवानी मीरा बन गई।
कबीर, नानक जैसे सद्गुरु आज के दौर में होते और तकरीर देते तो उनकी मुंडी पर कितने फतवे और धर्मादेश जारी होते हिसाब न
लगा पाते। नेकी कर दरिया में डाल.. जैसा उपदेश देने वाले बाबा फरीद होते तो यह देखकर स्वमेव समाधिस्थ हो जाते कि.. नेकी की सिर्फ़ बातकर, विग्यपन छपा और टीवी में जनसेवा के ढोल बजा।
अपन ने बजरंग बली को गुरु इसलिए बनाया कि भक्तों से उनकी कोई डिमांड नहीं । सिंदूर चमेली का चोला व चने की दाल चढाने वालों दोनों पर बराबर कृपा बरसाते हैं। वे सद्बुद्धि के अध्येता हैं । डरपोक सुग्रीव को राज दिलवा दिया। विभीषण को मति देकर राक्षस नगरी से निकाल लाए व लंकाधिपति बनवा दिया वे । गरीब गुरबों के भगवान हैं । वे लिखने पढने वालों के प्रेरक हैं। वे वास्तव में सद्गुरु हैं।
हनुमत चरित अपने आप में ज्ञान का महासागर है सो साल का हर दिन ही मेरे लिए उनका प्रकटोत्सव है, गुरू पूर्णिमा जैसा है। इसलिए हर दिन उन्हें ही स्मरण करता हूँ कि बजरंगबली सदा सहाय करें।

संपर्कः 8225812813

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परिणामों के इंतजार में – सबकी धड़कने बढ़ी।

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सुधीर पाण्डे: मतदान पेटियों मे बंद पड़े हुये स्थानीय संस्थाओं के चुनाव परिणाम राजनेताओं और राजनैतिक दलों के धड़कनों को बढ़ा रहे है। यह परिणाम उम्मीदवारों के जीत और हार का फैसला तो करेंगे ही मध्यप्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव में वर्चस्व की दावेदारी का भी अंदाजा लगाने में मददगार सिद्ध होंगे। ये चुनाव परिणाम पार्टियों के अंदर बड़े नेताओं की राजनैतिक खेमेबाजी और शीर्ष पुरूषों की मध्यप्रदेश में नेतृत्व की दावेदारी पर भी मोहर लगायेंगे।
स्थानीय संस्थाओं के चुनाव मध्यप्रदेश में कभी इतनी बैचेनी में नहीं रहे, कि राज्य के राजनैतिक परिदृष्य में उनके प्रभाव की परिकल्पना इतने बडे़ पैमाने पर की जाय। इस बार के निर्वाचनों में मध्यप्रदेश जैसा राज्य भविष्य की कई राजनैतिक संभावनाओं और परिवर्तनों का आधार स्थानीय संस्थाओं के चुनाव परिणामों का देख रहा है।
राष्ट्रीय राजनैतिक परिदृष्य में सभी राजनैतिक दलों में जो वैचारिक और आर्थिक परिवर्तन देखने को मिल रहे है अब मध्यप्रदेश भी उससे अछूता नहीं है। इस वर्ष हुए बुनियादी संस्थाओं के निर्वाचित के बाद राज्य में भी राष्ट्रीय राजनीति की भांति नई पद्धति की राजनीति का प्रवेश होना तय है। खरीद-फरोद और लालच में निष्ठा परिवर्तन की प्रवृति का जैसे मध्यप्रदेश के राजनैतिज्ञ इंतजार कर रहे हैं। इसका सफल प्रयोग 15 महीने की कांग्रेस के पतन के रूप में देखा जा चुका है जिन 28 विधायकों ने सिंधिया के साथ कांग्रेस को छोडा था वे आर्थिक रूप से कही अधिक सम्पन्न हुये हैं और उनका राजनैतिक प्रभाव भी राज्य में कांग्रेस और भाजपा के अन्य विधायकों से ज्यादा अधिक है।
ऐसी संभावना बताई जाती थी कि 28 विधायकों का यह समूह भाजपा में उनके समर्पित कार्यकर्ताओं के मध्य अपना स्थान नहीं बना पायेगा। पर इस धारणा ने गलत साबित होकर यह प्रमाण दे दिया है कि राजनैतिक स्वार्थो की पूर्ति के लिए अपने व्यक्तिगत सम्मान को खोना भी पडे या उसे नये स्परूप में परिवर्तत करना पडे तो भी उससे दुरेज नहीं करना चाहिए और संभवतः यही असली नेता की वर्तमान पहचान बन चुकी हैं ।
चुनाव परिणामों के इंतजार का धड़कन बढ़ाने वाला यह काल खण्ड मध्यप्रदेश की भविष्य की राजनीति को भी अंकुरित करेगा। अभी तक राज्य में अपने राजनैतिक अस्तित्व के संरक्षण के लिए दो ही खेमें थे जो परस्पर विरोधी नजर आते थे। पर अब उन नये खमों ने जन्म लिया है जिनका संक्षिप्त इतिहास आम मतदाता को उनकी और आकर्षित कर रहा है। यह तय है कि इस चुनाव में भाजपा का विजयी होना एक स्वाभाविक घटना होगी कम सीटे जीत पाना संगठन समीक्षा का विषय होगा और हार जाना उसके राजनैतिक अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगायेगा। दूसरी और कांग्रेस अपने नेतृत्व के संकट से और परिकल्पना, योजना के अभाव में जमीनी राजनीति से हटकर जीत की परिकल्पना करने वाले दल के रूप में अपनी स्वयं समीक्षा करेगी।

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चंद्रगुप्तों को अब चाणक्य नहीं चारण चाहिए..!

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साँच कहै ता/जयराम शुक्ल

अभी हाल ही में एक राष्ट्रीय सेमीनार(वर्चुअल) में भाग लेने का मौका मिला। विषय था..कुशल प्रशासनिक रणनीति बनाने में अकादमिक योगदान की जरूरत। इत्तेफाकन् मुझे ही मुख्य वक्ता की भूमिका निभानी पड़ी, वजह जिन कुलपति महोदय को उद्घाटन के लिए आना था वे ऐन वक्त पर नहीं आए।

वैसे कुलपतियों के अकादमिक सरोकार बचे ही कहां। बेचारों का पूरा पराक्रम धारा 52 से बचने में ही लगा रहता है। मैंने पढ़ा था कहीं कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विश्वविद्यालयों के कुलपति का इतना मान सम्मान होता था कि प्रधानमंत्री उस शहर में जाते तो सबसे पहले कुलपतिजी से ही मिलने पहुंचते। जैसे गणेश जी की अर्चना के बाद सभी कर्मकाण्ड पूरे होते हैं वैसे ही कुलपतियों के सम्मान की स्थिति थी। चांसलर और वाइस चांसलर की अँग्रेजी व्याख्या से उलट कुलपति शब्द की भारतीय अवधारणा के सूत्र वशिष्ठ, संदीपन और द्रोणाचार्य जैसे प्राख्यात कुलगुरुओं के आश्रम से जुड़े हैं जहाँ राम, कृष्ण और अर्जुन जैसे धनुर्धरों ने शिक्षा पाई। सांस्कृतिक रूप से कुलपति शब्द की महत्ता राष्ट्रपति शब्द से किंचित भी कम नहीं।

Jayram Shukla

प्रो. अमरनाथ झा जैसे विद्वान इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति थे, उनका इतना मान सम्मान था कि प्रधानमंत्री भी उनसे समय लेकर मिलते थे। वे पंडित नेहरू को न सिर्फ शैक्षणिक विषयों पर अपितु प्रशासनिक मामलों में अपनी राय देते थे। गलत लगने पर वे नेहरू की नीतियों पर सार्वजनिक टीकाटिप्पणी करने से भी नहीं चूकते। झा साहब बड़ा मान था, विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा की स्थिति यह थी कि हर अभिभावक अपने बच्चे का इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला चाहता था। यह विश्वविद्यालय भारत का आक्सफोर्ड था जहाँ से निकलने वाले छात्र राजनीति, प्रशासन, साहित्य,संस्कृति व अन्य क्षेत्रों में देश का नेतृत्व करते थे। अस्सी के दशक तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए अपने विद्यार्थियों को तैय्यार करने के लिए ख्यातनाम था। प्रयाग के आध्यात्मिक व सांसकृतिक संस्कारों से सिक्त इन मेधावियों की छाप प्रशासन के अलावा भी सार्वजनिक जीवन के विविध क्षेत्रों में देखने को मिलती रही।

आचार्य नरेन्द्र देव जैसे प्रखर समाजवादी चिंतक भी काशी विद्यापीठ व लखनऊ विवि. के कुलपति हुए। वे कांग्रेस व पं. नेहरू के प्रखर आलोचक थे, पर वे विश्वविद्यालय के कुलपति का दायित्व सँभालें यह आग्रह स्वयं पंडित नेहरू ने किया था। आज भी इन्हें के सर्वाधिक सम्मानित कुलपति के तौर पर याद किया जाता है। मध्यप्रदेश के विश्वविद्यालयों की कमान दो ऐसे विद्वानों ने सँभाली जो मुख्यमंत्री भी बने। सागर विश्वविद्यालय के कुलपति पं. द्वारका प्रसाद मिश्र रहे जबकि रीवा के अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति बनने का श्रेय पं. शंभूनाथ शुक्ल को गया। वे विध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री भी थे। पद्मभूषण पंडित कुंजीलाल दुबे मध्यप्रदेश के प्रथम विधानसभा अध्यक्ष थे, वे इस पद पर दस साल रहे। नई पीढ़ी को यह जानना चाहिए कि श्री दुबे 1946 में नागपुर विश्विद्यालय के कुलपति बनाए गए थे। शिक्षाविद राजनेता का बड़ा सम्मान था। डा. राधाकृष्णन उच्चकोटि के शिक्षक और दार्शनिक थे, हमारे राष्ट्रपति बने। वह दौर राजनीति में विद्वता की प्रतिष्ठा का स्वर्ण काल था।

जैसा कि नाम से ही प्रकट है विश्विद्यालय माने ऐसे शैक्षणिक संस्थान जहाँ समूचे विश्व की विद्याओं का अध्ययन-अध्यापन हो। विश्वभर के अध्येता पढ़ने आएं। आजादी के बाद शुरू हुए हमारे विश्वविद्यालयों के सामने नालंदा और तक्षशिला दृष्टांन्त रहा होगा। चीनी अध्येता ह्वेनसांग नालंदा के विद्यार्थी रहे हैं। चाणक्य तक्षशिला में पढ़े भी और पढा़या भी। चाणक्य ने अपने शिष्यों को श्रेष्ठ प्रशासक और राजनायिक के रूप में गढ़ा जिन्होंने तीन चौथाई विश्व जीत चुके सिंकदर के पांव भारत में नहीं जमने दिए। सत्ता से स्वयं निरपेक्ष रहते हुए चाणक्य ने भारत को एक गणराज्य के रूप में स्थापित किया। प्रशासनिक रणनीति बनाने में अकादमिक योगदान का चाणक्य-चंद्रगुप्त से बढ़िया शायद ही कोई उदाहरण हो।

राजकाज में अकादमिक योगदान और उसके प्रतिफल देखने के लिए हमें ग्रीक और यूनानी दार्शनिकों, चिंतकों की ओर देखने की जरूरत नहीं। हमारे वैदिक वांग्यमय और पौराणिक आख्यानों में इसके सूत्र बिखरे पड़े हैं। ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की। पालनहार के नाते भगवान विष्णु को आप प्रधानमंत्री मान सकते हैं। उन्हें परामर्श देने के लिए सप्तर्षि मंडल था। ये सप्तर्षि परामर्श के साथ समय समय पर विष्णुजी को सचेत भी करते थे। विष्णुजी ईश्वर थे फिर भी सहिष्णुता की पराकाष्ठा यह ही थी कि छाती में ब्रह्मर्षि भृग के पद प्रहार के बाद भी प्रत्युत्तर में कहते हैं कि विप्रवर आपको चोट तो नहीं लगी क्योंकि कि मेरी छाती बज्र की भांति कठोर है।

आज की प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में पदप्रहार तो दूर की बात, वाक्यप्रहार से ही तिलमिलाकर सत्ताएं जीभ खैंचने के लिए तैय्यार रहती हैं। नारद भी विष्णुजी के भक्त और सलाहकार थे। पर विश्वमोहिनी स्वयंवर में लगा कि विष्णुजी ने उनके साथ छल किया तो नारद ने ऐसा भीषण श्राप दिया जिसे राम बनकर उन्हें त्रेता में भोगना पड़ा, पत्नी के वियोग में। विष्णुजी परम पराक्रमी ..जैसा कि नारद ने उलाहना देते हुए कहा..परम सुतंत्र उपर कोउ नाहीं..वे चाहते तो नारद को सृष्टि निकाला दे सकते थे पर नारद की विद्वता व उनकी प्रतिष्ठा में उन्होंने कभी आँच नहीं आने दी।

ऋषियों, देवताओं, ईश्वर के बीच ऐसे वाद, विवाद, संवाद होते रहते थे लेकिन सब परस्पर एकदूसरे के लिए अपरिहार्य थे। स्तुति की जरूरत थी, तो निंदा और आलोचना की भी। सबका महत्व था। आज तो हाल ये कि …सिर्फ करते रहो वंदना, सत्य कहना समझना मना..।

अब तो राज चाहे किसी का हो असहिष्णुता सत्ता का मौलिक चरित्र बनती जा रही है। अपने देश में सन् बहत्तर के बाद से इस प्रवृत्ति को विस्तार ही मिलता गया। स्थिति यह बन गई कि प्रशासन में जो बौद्धिकों का दखल होता था वह मंद पड़ता गया और सलाह की जगह चापलूसी शुरू हो गई।

विश्वविद्यालयों के कुलपति और शैक्षणिक संस्थानों के प्रमुख योग्यता नहीं वरन चापलूसी के आधार पर तय होने लगे हैं। इसलिए एक जमाना वो था जब प्रधानमंत्री कुलपतिजी से मिलने जाया करते थे और आज का जमाना ये कि कुलपतियों का झुंड मंत्रियों के बँगलों में लाइन लगाए खड़ा है। अपने सूबे के एक उच्च शिक्षा मंत्री थे। वे नवरात्र में भंडारा करवाते थे, एक बार मैं भी उनके अनुष्ठान में पहुंचा और यह देखकर चकित रह गया कि विश्विद्यालयों के कई कुलपति भंडारे में पूड़ी -पंजीरी बांटनें में जुटे थे। शहर में कोई मंत्री आए तो स्वागत के लिए राजनीतिक कार्यकर्ताओं से बड़ी माला कुलपति महोदय लिए खड़े रहते हैं..क्या करिएगा।

हमारे चरित्र की ये पतनशीलता हमारी ओढी हुई है। ऐसे में यदि अफसोस मानें कि लोकप्रशासन में हमारी योग्यता की कोई पूछ परख नहीं तो ये गलत बात है। हम हर नकल पश्चिम की करते हैं पर अधकचरी। शिक्षा की गुणवत्ता के बारे में भी नकल कर लें। अमेरिका दुनिया में इसलिये श्रेष्ठ है क्योंकि उसके पास श्रेष्ठ विश्विविद्यालय हैं। चीन इस श्रेष्ठता की ओर तेजी से बढ़ रहा है।

अपने मध्यप्रदेश की बात करें तो राष्ट्रीय संस्थानों को अलग कर दें तो कोई ऐसे संस्थान नहीं जिनकी रैंकिंग देश में सौ के भीतर हो। देश के पैमाने पर तो दुनिया के श्रेष्ठ सौ संस्थानों में भी कोई नंबर नहीं लगता। यह हाल उस देश का है जो अपने गुरुकुलों, नालंदा, तक्षशिला विश्विद्यालयों की बदौलत विश्वगुरू रहा है।

यह विमर्श का विषय है कि क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था बौद्धिक परंपरा को पनपने नहीं देना चाहती? क्योंकि आमतौर पर यही आरोप लगता है कि राजनीति के बेजा दखल ने शैक्षणिक संस्थाओं का बेडा गर्क किया है।

जनप्रतिनिधियों के चुने जाने का आधार उनकी योग्यता नहीं अपितु ज्यादा से ज्यादा मत अर्जित करने का कौशल है। और यह कौशल जाति, संप्रदाय, बाहुबल, धनबल से आता है। इन्हीँ में से कोई शिक्षामंत्री भी बनता है। नीति नियंताओं में ऐसे ही लोगों का बहुमत होता है। यह भी विचारणीय तथ्य है। पर अमेरिका तो लोकतांत्रिक उदारता की पराकाष्ठा और चीन एक तरह से तानाशाह। पर शिक्षा के क्षेत्र में दोनों तेजी से आगे बढे हैं।

बौद्धिकों और शिक्षाविदों का काम पढाने के अलावा लोकशिक्षण का भी है। हमारे यहां के प्रायः बौद्धिक राजनीतिक धाराओं के पिट्ठू हैं। अब तो हाल यह कि राजनीतिक दलों की पर्चा बुलेटिन बनाने का काम भी यही देखते हैं। चुनावी लोकतंत्र को किसी के हक में कैसे प्रभावित किया जा सकता है हम यह भी लगातार देख रहे हैं। इनके लिए लोकजागरण राजनीतिक एजेंडा सेट करके उसके प्रपोगंडा का भोंपू बन जाना है।

पिछले सालों में ऐसे ही कई प्रदर्शन व अभियान देखने को मिले। जब असहिष्णुता के नाम पर हस्ताक्षर अभियान चलाए गए, अवार्ड वापिस किए गए। यही लोग माओवादियों, अलगाववादियों के मामले में चुप रहते हैं । थियामिन चौक में लोकतंत्र समर्थक छात्रों के नरसंहार को चीन का अंदरुनी मामला बताते हैं और जब कश्मीर में हिंसा भड़काने और जवानों पर पत्थर बरसाने वालों पर जरा सी भी कार्रवाई होती है तो ये चिंहुक उठते हैं। इसके उलट एक दूसरा वर्ग भी है। जो देश की हर मुसीबत की जड़ में सिर्फ मुसलमानों को देखने में जुटा है। दोनों धड़े इतिहास को अपने हिसाब से मथने में भिड़े हैं।

इस तरह प्रायः बौद्धिक खेमेबाजी में बंटे हैं । जो तटस्थ हैं उनकी कोई बखत व अपील नहीं। निजाम कभी अकल को पनाह नहीं देता क्योंकि वह खुद को सबसे ज्यादा अक्लमंद समझता है। वह बौद्धिकों को चाहता तो है पर अपने दरबारी की शक्ल में जो उसके हुक्म का हुक्का भरता रहे।

मध्यकाल में कबीर हुए, इब्राहीम लोधी जैसे निर्दयी और निरंकुश के शासनकाल में। काशी की गलियों में दादू, रैदास जैसे समकालीन बौद्धकों की मंडली लेकर लोकजागरण करते रहे निर्भयता के साथ।इस्लाम के निंदकों को खौलते कड़ाह में तलवा देने वाला इब्राहीम कबीर और उसके अनुयायियों का बाल बांका नहीं कर पाया। जानते हैं क्यों ..वो इसलिये कि लोक की ताकत से बड़ी बड़ी सल्तनतें घबराती हैं बशर्ते उसे जगाने वाला निजी स्वार्थों से निरपेक्ष हो।

तुलसी के प्रायः सभी समकालीनों को अकबर ने अपना दरबारी बना लिया। …माँगकर खाइबो मसीत में सोइबो कहते हुये तुलसी नहीं गए। तुलसी अपने आप में एक आंदोलन बन गए और सनातन मूल्यों की रक्षा की। यह कहना गलत है कि सत्ता का दवाब बुद्धि का गला चपा देता है। यह हम पर निर्भर करता है कि कितना दबते हैं। अब तो हाल यह है कि झुकने का इशारा मिलता है तो हम बिछ जाते हैं।

सवाल ये है कि पहले हम बौद्धिक कहलाने वाले वाले लोग खुद को नाप लें कि कितने पानी में हैं फिर तय करें कि शासन को लोकजयी बनाने की दिशा में क्या कर सकते हैं।

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हकीकत और अफसाने के बीच ‘मेयर की चेयर’

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राजनीति का मूल चरित्र और आत्मा एक ही होती है, वह राजनीतिक दलों के रूप में सिर्फ चोला ग्रहण करती है। दिलचस्प यह कि इस बार महापौर के प्रत्याशियों के चयन में भाजपा में कांग्रेस का चरित्र तो कांग्रेस में भाजपा का दिखा। पहले कांग्रेस में ऐसा हुआ करता था कि क्षत्रपगण अपने- अपने पट्ठों के लिए जी-जान सटा देते थे अन्त में एक लाइन का प्रस्ताव पास होता था कि जो आलाकमान तय करें वही अंतिम निर्णय होगा। इस बार यह कवायद भाजपा में देखने को मिली कम से कम ग्वालियर और इंदौर के प्रत्याशी को लेकर दिखी ही।
राजनीतिक दलों में अधिनायकवादी अवधारणा अब भाजपा में भी घर करती जा रही है। पार्टी संगठन के जिस आंतरिक लोकतंत्र पर आड़वाणी जी कभी दम भरते हुए कहा करते थे कि देश में भाजपा ही एक मात्र राजनीतिक संगठन है जिसमें अभी आंतरिक लोकतंत्र जिन्दा है।

Jayram Shukla 1नब्बे के शुरुआती दशक तक यह बेशक जिन्दा था जब मंडल अध्यक्ष से लेकर प्रदेशाध्यक्ष तक के लिए चुनाव हुआ करते थे। प्रदेश अध्यक्ष के लिए विक्रम वर्मा वर्सेज शिवराजसिंह चौहान के उस चर्चित चुनाव को हमारी पीढ़ी के पत्रकार कैसे भूल सकते हैं।
भाजपा में संगठन के आंतरिक लोकतंत्र की बात अब गुजरे दिनों की हो चुकी है। मनोनयन और तदर्थंवाद, शीर्ष नेतृत्व पर निर्णय के लिए निर्भरता लगभग वैसे ही बनती जा रह है जो कि कांग्रेस की परिपाटी बनी बन है। इस दृष्टि से अब भाजपा को ‘पार्टी विद डिफरेंट’ कहना अब जरा मुश्किल होगा।
बहरहाल महापौर का प्रत्याशी तय करने में कांग्रेस ने बाजी मार ली। प्रत्याशियों के चयन पर पहले जैसी रस्साकशी नहीं दिखी। कांग्रेस में यह सबकुछ भाजपाई अनुशासन की तरह हुआ।
यह बात अवश्य है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं नहीं अपितु नेताओं की पार्टी बन चुकी है। उसके पास कलेक्टिव लीडरशिप का अभाव है, जान सटाकर अपने प्रत्याशियों के लिए लड़ने वाला काडर भी नहीं बचा।
कांग्रेस में अभी भी वह वृत्ति बनी हुई है कि सामने वाला जीत गया तो हमारा चांस भी खतम, सो टिकट तक न पहुँचने वाले पार्टी के दावेदार प्रतिद्वंदी प्रत्याशी से ज्यादा खतरनाक होकर उभरते हैं और अपनी ही पार्टी को हराने के लिए रूपये तक खर्च करने में नहीं हिचकते। इसबार ऐसा नहीं होगा कोई बड़ा कांग्रेसी नेता दावे के साथ नहीं कह सकता।
भाजपा में अभी यह वृत्ति इतनी गहरी नहीं है। क्षणिक नाराजी के बाद सबकुछ ठीक हो जाता है और दूसरे नाराज नेता/कार्यकर्ता के लिए अन्य कोई लाभप्रद विकल्प मौजूद नहीं होता। निचले दर्जे के कार्यकर्ताओं तक सतत् प्रशिक्षण ऊर्जा संचारित किए रहता है। भाजपा की यह ताकत क्षीण जरूर हुई है पर मूलतः बची हुई है।
महापौर के प्रत्याशियों की स्थिति लगभग स्पष्ट हो गई है। एक दो दिनों में पार्षदी के प्रत्याशी भी तय हो जाएंगे। महापौर तो सीधे जनता से चुने जाने हैं लेकिन उसके नीचे के नगरनिकायों में वैसा ही दृष्य
देखने को मिलेगा जैसा कि छात्रसंघ चुनावों में यूआर और विश्वविद्यालय के लिए धरपकड़ व गोलबंदी होती रही है।
चुने हुए जनप्रतिनिधियों का बिकना या खरीदा जाना सदाचार हो चुका है। उसे अब कोई भी दल बदनामी का सबब नहीं मानता। सो आप उम्मीद कर सकते हैं कि नगरपालिकाओं व परिषदों के लिए और उधर जनपद व जिला पंचायतों के लिए पार्षदों/ सदस्यों के क्या रेट मिलने वाले हैं।
कई सदस्य/पार्षद इसी प्रत्याशा से लड़ भी रहे होंगे। मतदाता अब समझदार हो चला है सो वह भी वोट के बदले नोट के महत्व को भलीभाँति समझने लगा है। हाँ इस बीच इसे सुखद खबर कह सकते हैं कि मुख्यमंत्री के आह्वान पर बड़ी संख्या में समरस पंचायतें चुनी गई हैं। समरस यानी कि निर्विरोध।
इस चुनाव में एक राजनीतिक दूरंदेशी बात भी निकल कर आ सकती है। डेढ़ वर्ष बाद विधानसभा के चुनाव हैं और उससे छह महीने बाद लोकसभा के। सो इन चुनावों के परिणामों को सत्ता का सेमीफाइनल कहकर पेश किया जा सकता है।
स्थानीय चुनावों में कांग्रेस के जमाने में भी महानगरों व नगरों में जनसंघ/भाजपा का वर्चस्व रहा है। पिछले चुनावों तक यह रिकॉर्ड कायम रहा। इस बार अनुमान लग पाना जरा मुश्किल सा है। प्रदेश की सरकार के प्रति नाराजगी यहाँ-वहाँ रह-रह कर फूटती दिखती है।
सबसे मुश्किल यह कि चुनाव की टाइमिंग सत्ताधारी भाजपा के पक्ष में ज्यादा नहीं है। हर शहर में विकास की वास्तविकता बरसात के समय ही प्रकट होती है। सड़के, नालियां, बिजली सभी कसौटी पर होंगी। कई नगर बाढ़ प्रभावित होते हैं उनसे दो-चार होना पड़ेगा। हाँ बिजली को लेकर मतदाता आश्वस्त हो सकते हैं कि इस चुनाव तक उन्हें उमस भरी गर्मी से परेशान नहीं होना पड़ेगा। भले ही सरकार को खुद को बेचना पड़े बिजली की व्यवस्था हरहाल पर रहेगी। क्योंकि यह अच्छे से मालूम है कि बिजली गई तो सबवोट अँधेरे में।
कांग्रेस उत्साह में है कि नगर सरकार के लिए भी ‘वक्त है बदलाव’ का नारा कारगर हो सकता है। अभी कुछ नहीं कह सकते लेकिन भाजपा पहले की भाँति कम्फर्ट जोन में नहीं है।
पंचायत और नगरीय चुनाव के परिणाम प्रदेश नेतृत्व के स्थायित्व को भी तय करेंगे। भाजपा के अंदरखाने में अभी से ही अगस्त क्रांति की बात शुरू हो गई है।
कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं बचा यदि परिणाम में वह आधे की हिस्सेदारी भी ले लेती है तो उसे अगले चुनाव के लिए संजीवनी बूटी मिल जाएगी।
नगरनिकायों के चुनाव और मेयर का महत्व कभी ऊँचे दर्जे का हुआ करता था। भारत में विधायक और सांसद तो 1952 से चुने जाने शुरू हुए लेकिन अपने देश में नगरीय प्रशासन की व्यवस्था सोलहवीं सदी से चलती आ रही है।
सन् 1688 में मद्रास नगरनिगम का गठन हुआ इसके बाद 1762 में कोलकाता व मुंबई नगरनिगम गठित हुए। यह व्यवस्था अँग्रजों की देन है। मेयर शब्द 1190 में किंग जान के समय यूनाइटेड किंगडम में स्थापित हो चुका था। 1822 में इंग्लैंड में म्युनिसिपल कारपोरेशन एक्ट बना जो जस का तस भारत में लागू कर दिया गया।
अँग्रजों ने देश के नगरों व महानगरों की व्यवस्था को इसी तहत संचालित किया। जबलपुर, ग्वालियर और इंदौर के नगरनिगम अँग्रेजों के जमाने से हैं। अभी जिस अधिकार संपन्नता के साथ नगरीय व पंचायतों के चुनाव हो रहे हैं इसका श्रेय प्रधानमंत्री पीव्ही नरसिंह राव को जाता है। उन्हीं के कार्यकाल 1992 में 74वां संविधान संशोधन विधेयक आया जो निर्वाचन हेतु कानून बना।
कभी मेयर का पद सबसे सम्मानित हुआ करता था। उच्चशिक्षा, सुसंस्कार और सर्वस्पर्शी चरित्र खासियत हुआ करती थी। एक तरह से जैसे राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक हुआ करता था वैसे ही नगर का मेयर। मेयर जिसे हमने हिन्दी में महापौर का नाम दे दिया है वास्तव में उस शहर की नाक हुआ करते थे।
मध्यप्रदेश के यशस्वी महापौरों में हमने भवानी प्रसाद तिवारी(जबलपुर), नारायण कृष्ण शेजवलकर (ग्वालियर) राजेन्द्र धारकर(इंदौर) के नाम सुने हैं बिलासपुर के मेयर राघवेंद्र राव का भी बड़ा नाम था।
अपने रीवा के इलाकेदार हारौल नर्मदा प्रसाद सिंह पंडित जवाहर लाल नेहरू के शहर इलाहाबाद(अब प्रयाग) के दो बार मेयर रहे हैं।
रीवा तब नगरपालिका थी। उसके एक अध्यक्ष थे नरेन्द्र सिंह। श्री सिंह थे तो कांग्रेसी लेकिन जब डा.राममनोहर लोहिया रीवा आए तो उन्होंने उनका नगर की ओर से ऐतिहासिक नागरिक अभिनंदन किया। रीवा का नरेन्द्र नगर मोहल्ला उन्हीं के नाम है।
तब नगर में जो भी महापुरुष आते थे वे मेयर के मेहमान होते थे और उनका नागरिक अभिनंदन हुआ करता था। पृथ्वीराज कपूर का भी रीवा में ऐतिहासिक नागरिक अभिनंदनहुआ था।

अपने सतना में दो सुप्रसिद्ध चिकित्सक अध्यक्ष व महापौर हुए । डा. लालता खरे जिन्होंने अपना सर्वस्व ही सतना शहर को दान दे दिया। दूसरे थे डा. बीएल यादव, वे बच्चों के डाक्टर थे, महिलाएं इन्हें अपना भाई-बेटा, भगवान सदृश मानती थीं। खुले चुनाव में वे निर्दलीय लड़े और रिकॉर्ड मतों से जीते।
महापौर का पद धारण करने वालों में अद्वितीय गरिमा रहती थी वे चयनित होने के बाद पार्टी निर्पेक्ष हो जाया करते थे। क्या हम अब ऐसे मूल्यों की अपेक्षा कर सकते हैं।
पतन चौतरफा हुआ है..हमारा चरित्र ही तो लोकतंत्र के मूल चरित्र को बनाता है। हम जितने खुदगर्ज हुए उसी हिसाब से व्यवस्था भी ढ़लती गई। बहरहाल सामने चुनाव है, आप वोट न देंगे तो भी वे चुने जाएंगे तो हम क्यों न कम खराब उम्मीदवार के लिए अपना वोट दें। हो सकता है वही कल खरा निकल जाए।

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रुपए की इज्ज़त का सवाल है बाबा…!

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साँच कहै ता/जयराम शुक्ल
जब जब रुपया धड़ाम से नीचे गिरता है तो अपने देश के स्वयंभू अर्थशास्त्रियों के बीच हाहाकार मच जाता है। तेजडिय़ों, मंदडिय़ों के चेहरे सूखने लगते हैं। शेयर बाजार में सेनसेक्स और निफ्टीे हार्टअटैक नापने की मशीन के कांटे की तरह ऊपर-नीचे होने लगते हैं। हाल फिलहाल का मौद्रिक नजारा कुछ ऐसा ही दिख रहा है।
टीवी चैनलों से चिन्तित आवाजें आ रही हैं। सोशल मीडिया में देश की अर्थव्यवस्था हांफते कह रही है कि प्रधानमंत्री जी कुछ करिए। प्रधानमंत्री के प्रधान वित्तीय सलाहकार देश को दिलासा दे रहे थे कि सब कुछ ठीक हो जाएगा… डॉलर की अकड़ जल्दी ही ढ़ीली पड़ जाएगी।
अभी हमारे बंदे पता लगा रहे हैं कि कौन-कौन सा क्षेत्र एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) के लिए बचा है। उन इलाकों की भी खोज की जा रही है जहां मल्टीनेशनल्स या अमेरिकी पूंजी से चलने वाले कारपोरेट घरानों को तेल- गैस- कोयला – हीरा और अन्य खनिज खोदने के पट्टे दिए जाएं।
Jayram Shukla 1
इनका पता लगते ही डालरों की बरसात होने लगेगी और अपना रुपया फिर तन जाएगा। बस न्यू इंडिया बनने के लिए आँखें मूँद कर अपना योगदान देते जाओ और फिर आगे देखो।
अपुन अर्थशास्त्री नहीं है, लिहाजा पहले तो रुपए गिरने की खबर सुनी तो लगा.. रिजर्व बैंक के खजाने से रुपए की पेटी या ट्रंक धड़ाम से नीचे गिरा होगा। रुपए का गिरना और उठना अपन बीपीएल (बिलो पॉवर्टी लाइन) वालों को समझ में नहीं आता। वैसे भी हम गरीबी रेखा के नीचे गिरे हुए लोग हैं।
फिर भी अपने मोहल्ले में रहने वाले और सरकारी स्कूल में इकॉनामिक्स -कॉमर्स पढ़ाने वाले मास्साब से पूछा – सर जी ये रुपया गिरता कैसे है? मास्साब संविदाकर्मी थे, डीईओ-बीईओ को रिश्वत देकर नौकरी पाई थी, .. सो उस टीस को अपनी व्याख्या में घोलते हुए कहा – “जैसे मेरा प्रिन्सिपल डीईओ के, डीइओ शहर के नेता के, नेताजी- मुख्यमंत्री के, मुख्यमंत्री आलाकमान के चरणों पर पाटापसार गिरते हैं, वैसे ही अपना रुपया डॉलर के चरणों में गिर गया है।”
कोई नई बात नहीं मूरख। ऐसा गिरना उठना तो सृष्टि का नियम है।
मास्साब बोले- वैसे जब समूचे देश में ही नीचे गिरने की होड़ मची हो तो बेचारा रुपया कब तक थमा-तना रहेगा।
हाल ही में देखा … कि कई ऊँचे- ऊँचे लोग रुपए के लिए कितना नीचे गिर सकते हैं। कई कारपोरेटी चोट्टे सातसमंदर पार जा गिरे।
सरकार के अफसर, नेता-मथानी, घपले घोटालों में फंसकर डूबते उतराते रहते हैं। कोई चारित्रिक रूप से नीचे गिरता है तो कोई नैतिक रूप से। रुपये को भी ऐसई गिरे रहने दो।
मैंने कहा – मास्साब सवाल ये है कि अपना रुपया डॉलर के सामने गिरा है, ये अपने देश के स्वाभिमान से जुड़ा मामला है।
गांधीजी चर्चिल के सामने तो नहीं गिरे। विवेकानंद ने शिकागो में भूखे भारत की धार्मिक व अध्यात्मिक शान के झण्डे को फहराया।
धमकी पर धमकी के बाद भी इन्दिरा जी अमेरिका के आगे नहीं गिरी। मास्साब आखिर अपने रुपए का कुछ तो स्वाभिमान होना चाहिए। जब देखो तब डॉलर के आगे दंडवत हो जाता है।
मास्साब ने कहा- चलो चलके मोहल्ले के नेता से पूछ लेते हैं। आखिर उसकी भी जिम्मेदारी बनती है।
मोहल्ले के नेताजी ने अपने ज्ञान की पिटारी खोली और जानकारी दुरुस्त करते हुए बोले- इससे पहले अपने प्रधानमंत्री कौन थे? डा. मनमोहन सिंह ही न।
ये वही मनमोहन सिंह है कभी जिनके दस्तखत रिजर्व बैंक के नोट पर रहते थे। फिर ये आईएमएफ (इन्टरनेशनल मनिटरी फंड) और वर्ल्ड बैंक में नौकरी करने गए। इन दोनों जगहों में डॉलर का ही बोलबाला है।
फिर इन्डिया लौटे तो नरसिंहराव के खजांची बन गए। जब खजांची बने तो देखा खजाने में एक डॉलर भी नहीं। चन्द्रशेखर जी देश का सोना गिरवी करवा गए थे।
मनमोहनजी ने जुगत लगाई और देश के खिड़की -दरवाजे डॉलर के प्रवेश के वास्ते खोल दिए। फिर प्रधानमंत्री बनते ही ऐलान किया- इन्डिया आओ, डॉलर दो, लूटो खाओ, डॉलर दो।
इसी को आर्थिक उदारीकरण यानी कि ग्लोबलाइजेेशन कहते हैं। इस तरह उन्होंने ग्राम्यवासिनी भारत माँ के आँगन को “गोबराइजेशन” करके चमका दिया।
यूरोपी कम्पनियां इन्डिया आईं, डॉलर दिया, प्राकृतिक संसाधनों को लूटा। नेताजी बोले- यूपीए सरकार ने डालर को अपने मूड़े (सिरपर)चढ़ा रखा था। उसकी आदत जाते जाते ही जाएगी.. न।
बीच में मास्साब टपक पड़े- सो इसलिए जब डॉलर अपने फॉर्म पर आता है तो अपनी अर्थव्यवस्था के रंग उड़ जाते है और रुपया डॉलर के चरणों पर बिछ जाता है।
और यह तब तक बिछा रहता है जब तक अमेरिका, यूरोप के मल्टीनेशनल्स डॉलर की नई खेप लेकर इन्डिया नहीं पहुंचते।
यानी कि जब रुपया गिरे तो समझिए कोई नया विनिवेश-आर्थिक समझौता और व्यापारिक सौदा होने वाला है।
मास्साब का अर्थशास्त्र जब अपुन के पल्ले नहीं पड़ा तो मैं फिर नेताजी से पूछ बैठा ..कि वो पन्द्रह लाख रुपये, वो स्विस बैंक का पैसा..वो अच्छे दिन ? अब तो मनमोहन सिंह नहीं हैं…ना।
नेताजी ने दाएं, बाएं फिर सीधे देखते हुए कहा ..मैं किसी भी तरह का वक्तव्य देने के लिए अधिकृत नहीं हूँ… नो कमेंट।
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विद्वानों को क्योंं कहना पड़ा कि- वैद्यराज नमः तुभ्यं यमराज सहोदरः

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दो मसले मुझे हमेशा बहुत परेशान करते हैं। एक डॉक्टरों की पर्ची और दूसरी बड़ी अदालतों के फैसलों की इबारत। मैं अंग्रेजी माध्यम से विज्ञान का स्नातक और स्नातकोत्तर उपाधिधारी हूं जब मैं असहज और परेशान हो जाता हूं तो उन लोगों की क्या कहिए जिन्हें पढ़ाई के समय एबीसीडी सुनते ही बुखार आ जाता था।
◆ये फलां डॉक्टर का पर्चा है,इसकी दवाएं ढिकां मेडिकल पर मिलेंगी
कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो डॉक्टर लोग अपनी पर्ची में न जाने किस कूटलिपि से अंग्रेजी में दवाइयों के नाम लिखते हैं इस रहस्य को सिर्फ वो मेडिकल की दुकानवाला जानता है जिसके यहां से दवाई खरीदने की सिफारिश की जाती है। एक बार मैंने अपनी सहूलियत के हिसाब से मेडिकल स्टोर बदल दिया। दुकानदार ईमानदार निकला। औने-पौने कोई दवा थमाने की बजाय बता दिया कि ये फलाँ डाक्टर की पर्ची है इसमें लिखी दवाएं ढिकां मेडिकल स्टोर में मिलेंगी। वैसे ये दुकानवाला मुझे कोई भी दवा थमा सकता था, पर्ची में यही लिखी हैं बता कर। मैं उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि मैं मेडिकली निरक्षर हूं।
◆आम मरीज जीते जी जान नहीं पाता, उसका ड्रग ट्रायल हो रहा है या इलाज
फलां डॉक्टर, ढिकां मेडिकल स्टोर या लैब में ही क्यों भेजता है ये रहस्य अब रहस्य नहीं रहा। दो साल पहले इंदौर में ड्रग ट्रायल काण्ड के बाद यह अच्छे से उजागर हो गया। दवाइयां बनाने वाली कंपनियां ये सब प्रपंच रचती हैं। आम भारतीय मरीज अपने जीते जी जान ही नहीं पाता कि उसका ड्रग ट्रायल चल रहा होता है कि इलाज। बहरहाल मैं डॉक्टर्स की उस गूढ़ मेडिकल पर्ची के बारे में बात कर रहा था। मरीजों की लंबी कतार और कैश कलेक्शन पर ज्यादा नजर रखने वाला डॉक्टर मरीज को आनन-फानन बता जाता है कि इसे खाना है, इसे लगाना है। ये तीन बार के लिए,ये दोबार के लिए, इसे तब खाना जब तकलीफ हद से गुजर जाए।
◆एक तिहाई मरीज धनाभाव में बिना जांच,दवा खरीदे लौट जाते हैं
मरीज और उसका अटेंडेंट दोनों का दिमाग चकरघिन्नी की तरह घूमने लगता है क्योंकि उसके दिमाग में पैथोलॉजी की सत्रह जाँच और दस दवाइयों का लेखा सामने आ रहता है। वह बटुए टटोलने लगता है कि रुपया पुज जाएगा कि नहीं। यकीन मानिए डाक्टर तक पहुंचकर, फीस अदाकर पर्ची बनवाने वालों में से एक तिहाई मरीज धनाभाव में बिना जाँच कराए व दवा खरीदे लौट जाते हैं। उनमें से कुछ कर्ज लेकर दूसरे तीसरे दिन लौटते हैं। शेष यह कहते हुए खुद को भगवान के हवाले कर देते हैं कि एक न एक दिन तो सबै को मरना है..चाहे दवा खाएं या न खाएं।
◆देश की चिकित्सा व्यवस्था अराजक दौर की शिकार है
प्रायः हर गांव या मोहल्ले में ऐसे कई केस मिल जाएंगे जिसमें गलत दवा खाने या लगाने से कोई मर गया या स्थाई विकलांग हो गया। इतने ही केस ऐसे भी होते हैं कि मर्ज कुछ और था लेकिन डॉक्टर ने दवाई किसी दूसरे मर्ज की कर दी। ऐसे मामलों में मरने वालों की संख्या सामान्य बीमारियों से मरने वालों की संख्या से कम नहीं होती। पर न तो इनकी कोई सांख्यिकी बनती और न ही कोई प्रकरण दर्ज होता। अपने देश की चिकित्सा व्यवस्था इसी अराजक दौर की शिकार है।
◆ डॉक्टर पर्चे में लिखने लगे हैं, ये कानूनी कार्रवाई के लिए मान्य नहीं
आजकल तो चिकित्सक अपनी दवा पर्ची में मोटे हर्फों में यह लिखवाने लगे हैं कि..यह पर्ची किसी भी कानूनी कार्रवाई के लिए मान्य नहीं..। कमाल देखिए कि यह साफ सुथरी हिन्दी में लिखा होता है ताकि साक्षर मरीज इसे अच्छे से पढ़ ले कि डॉक्टर साहबान की दवा खाने से यदि तुम्हारी आँख भी फूट गई तो कोई कार्रवाई नहीं कर सकते क्योंकि पर्चे में पहले से ही लिखा। हाँ डाक्टर साहब इस बात के लिए बाध्य नहीं हैं कि वे मर्ज और दवाई का नाम तथा इस्तेमाल करने का तरीका साफ-साफ लिखें ताकि मरीज और उसका अटेंडेंट समझ जाए।
◆अंग्रेजी की ताकत और ग्लैमर तभी तक है जब तक उसे समझ न पाएं
अंग्रेजी की ताकत और उसका ग्लैमर तभी तक है जब तक कि सामने वाला उसे समझ न पाए। जिस दिन ये अँग्रेजी आम लोगों को समझ में आने लगेगी उसी दिन से इसका तिलस्म खत्म। और इसके साथ ही उन बड़े वकीलों और डॉक्टरों का धंधा भी, जिनकी दुकानें सिर्फ और सिर्फ अँग्रेजी के नाम से सजी हैं। क्या मेडिकल कौंसिल आफ इंडिया को इन स्थितियों से इत्तेफाक नहीं है.? है, पिछले कुछ सालों से दवाओं के नाम हिंदी में भी लिखे जाने लगे हैं। हो सकता है कि देश की अन्य भाषाओं के लिए भी निर्देश हो। जैसे कि केरल में बिकने वाली दवा में अँग्रेजी के साथ मलयाली में भी लिखा जाता हो। लेकिन यह कहाँ किस कोने में लिखा जाता है इसके लिए आपको मैग्नीफाइंग ग्लास की जरूरत पड़ेगी।
◆सेवा क्षेत्र के सबसे संवेदनशील मामले में सबसे ज्यादा बेरहमी क्यों..?
दवाओं के कम्पोजीशन और साइडइफेक्ट्स की नसीहतें छह से चार प्वाइंट्स के अक्षर में लिखी जाती हैं। अब इसे पढ़कर आँखें फोड़िए और नया मर्ज पालिए। जहाँ तक मुझे जानकारी है मेडिकल कौंसिल ने डाक्टरों को यह भी निर्देश दे रखे हैं कि वे दवाओं का नाम साफ-साफ अक्षरों में लिखें व उसके प्रयोग को भी विधिवत उल्लेखित करें। दवाओं के कम्पोजीशन का भी जिक्र करें क्योंकि एक ही दवा को विभिन्न कंपनियां अपने अपने ब्रैंडनेम से बेंचती हैं। दवा की कीमतों में भी बड़ा फर्जीवाड़ा है। हर शहर में दवाओं के अलग-अलग दाम हैं। कहीं- कहीं तो दवा के दामों में सत्तर प्रतिशत तक का अंतर है। कहीं कोई देखने वाला नहीं। कोई चेक एन्ड बैलेंस नहीं। सेवा क्षेत्र के सबसे संवेदनशील मामले में सबसे ज्यादा बेरहमी।
◆सिस्टम को हांकने वालों का ही भरोसा सिस्टम में नहीं ?
पिछले पंद्रह साल से मैंने यह नहीं सुना जाना कि कोई बड़ा जनप्रतिनिधि, हाकिम, अफसर किसी जिला अस्पताल या मेडिकल कालेज में भर्ती होकर अपना इलाज या आपरेशन करवाया हो। जब सिस्टम को हाँकने वालों का ही भरोसा सिस्टम में नहीं तो क्या कहिए। निजी अस्पतालों में तो इलाज भी नीलाम होता है। ऊँचा दाम ऊँची चिकित्सा। जितना दाम उतना इलाज। देश की साक्षरता विश्व की औसत साक्षरता से 10 प्रतिशत कम 75 प्रतिशत है। जो साक्षर हैं उनमें महज 10 प्रतिशत लोगों को ही पढ़ा लिखा समझिए शेष को सिर्फ उतना अक्षर ज्ञान है जो कंपनियों के प्रोडक्ट और सरकार की उपलब्धियों के विज्ञापन की भाषा पढ़ सकें।
जब डॉक्टरों की कूटभाषा ये 10 प्रतिशत पढ़े लोग ही ढंग से नहीं समझ पाते, बाकी लोग तो इस अभिजात्य बिरादरी के लिए ढोर डंगर से ज्यादा नहीं।
◆और अंत में
डॉक्टर शपथ का दसांश भी अमल करें तो विश्व का कल्याण हो जाए। हर डॉक्टर की दवा की पर्ची में ऊपर Rx जैसा कुछ लिखा रहता है। यह डॉक्टरों को अपने पेशे के लिए ली गई हिप्पोक्रेटिक शपथ की याद दिलाता रहता है। हिप्पोक्रेट ग्रीक के महान दार्शनिक हैं जिन्हें आधुनिक चिकित्सा का प्रवर्तक माना जाता है। डॉक्टर इस शपथ का दसांश भी अमल करने लगें तो समूचे विश्व का कल्याण हो जाए। सरकारों को अलग से कोई कानून बनाने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ेगी इस शपथ का तथ्य-कथ्य आपको गूगल गुरू बता देंगे, इस लेख को पढ़ने के बाद हिप्पोक्रेटिक ओथ को सर्च कर पढ़िएगा जरूर।
हमारी सनातनी सांस्कृतिक परपंरा में सृष्टि के आदि वैद्य (डॉक्टर) धनवंतरि को भगवान विष्णुजी का स्वरूप बताया गया है..इसलिए युगों से डाक्टर के प्रति ईश्वरीय आस्था रही है-
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतरये
अमृतकलशहस्ताय सर्वभयविनाशाय सर्वरोगनिवारणाय
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्रीमहाविष्णुस्वरूपाय
श्रीधन्वंतरीस्वरूपाय श्रीश्रीश्री औषधचक्राय नारायणाय नमः॥
लेकिन जब डॉक्टर-वैद्य उपरोक्त मानदंडों पर खरे नहीं उतरे तब मनीषियों को कहना पड़ा कि-
वैद्यराज नमस्तुभ्यं यमराजसहोदर।
यमस्तु हरति प्राणान् वैद्यो प्राणान् धनानि च ॥
(हे वैद्यराज, यम के भाई, मैं आपको प्रणाम करता हूं यम तो सिर्फ प्राण हरते हैं पर आप धन और प्राण दोनों हर लेते हो !!)

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आजादी के बाद तबीयत से छले गए हमारे गाँव!

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जयराम शुक्ल
पंचायत सरकार एक जुलाई तक चुन ली जाएगी। विधायकों और सांसदों ने अपने पट्ठे ग्राम पंचायत से लेकर जिला पंचायत तक उतारे हुए हैं। भाजपा के एक बड़े नेता अपने बेटे के वोट के लिए जिस तरह उत्तेजना में विफरते हुए दिखे उससे अंदाजा लगा सकते हैं कि ये चुनाव क्या मायने रखने वाले हैं। बहरहाल मूल मुद्दा यह कि क्या पंचायतों के चुनाव में गाँव के असल मुद्दे है कि ये बस यूँ ही दारू-दक्कड़ और नोट के जरिए निपट जाएंगे।किसी भी बड़े राजनीतिक दल ने पंचायत चुनावों को केन्द्र पर रखकर कोई घोषणापत्र या एजेंडा जारी किया हो यह भी पढ़ने सुनने को नहीं मिला।
संभवतः बिना दलीय चिन्ह के चुनाव हो रहे हैं इसलिए किसी ने घोषणापत्र जैसे कर्मकांड की जरूरत नहीं समझी। सही बात तो यह कि आजादी के बाद से गाँव तबीयत से छले गए।
अपने पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान के साथ एक और महत्वाकांक्षी योजना शुरू की थी ‘आदर्श ग्राम योजना’ ये दोनों योजनाएं महात्मा गांधी को समर्पित थीं।
इस योजना के साथ सांसदों को भी जोड़ा और सभी को अपने संसदीय क्षेत्र के एक गांव का कायाकल्प करने का आग्रह किया।
बाद में इस योजना को मोदी जी ही भूल गए और सांसदों का कहना ही क्या..।
दरअसल महात्मा गांधी ने गांवों की संरचना वहां के सामाजिक ताने-बाने को जितनी संजीदगी से समझा, उतनी समझ आज तक के आर्थिक सर्वेक्षणों व अनुसंधानों के बाद भी विकसित नहीं हुई। योजनाकारों ने कभी गांवों में दिन नहीं बिताए।
और जिन सांसदों से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह अपेक्षा पाले बैठे रहे कि वे गांव का कायाकल्प कर देंगे उनमें से नब्बे फीसदी सिर्फ वोट मांगने गांवों में जाते हैं, कांच बंद वातानुकूलित गाड़ियों में बैठकर।
गांवों की बुनियादी जरूरतों की समझ तभी विकसित हो सकती है जब वे गांवों में रहे, समझें और ग्रामीण जीवन जिएं। महात्मा गांधी ने जो कुछ कहा वो पहले किया, उसे भोगा, वर्धा, चंपारण, साबरमती के आश्रमों में रहकर, इसलिए उनमें ग्राम स्वराज की बुनियादी समझ थी।
गांधी का स्वच्छता अभियान वातावरण की पवित्रता से तो जुड़ा ही था लेकिन उससे ज्यादा गहरे उसके सामाजिक मायने थे।
सफाई का काम जो वर्ग करता था और आज भी कर रहा है उसे इसलिए अछूत माना जाता था कि वह वह गंदगी साफ करता है। मल व विष्ठा ढोता है। गांधी जीवन भर चाहते थे कि अपने हिस्से का यह काम हर कोई करे। यह किसी जात व वर्ग के साथ न जोड़ा जाए। हर हाथ में झाडू हो, हर व्यक्ति अपना शौचालय साफ करने लगे तो अपने आप अछूतोद्धार हो जाए।
दुर्भाग्य से ये न हुआ और न होगा। आजादी हासिल करने से ज्यादा गांधी गांवों को आत्मनिर्भर बनाने के पक्ष में थे। छोटे-छोटे कुटीर उद्योग धंधों को विकसित करने के पक्ष में।
जिन गांवों का इतिहास 100 वर्ष से पुराना है वहां आप पाएंगे कि वृत्तिगत जातियों की अच्छी बसाहट थी। बढ़ई, लोहार, चर्मकार, पटवा, रंगरेज, धोबी, भुंजवा, तमेर, सोनार, नाई, बारी, काछी। गांव अपने आप में एक सम्पूर्ण आर्थिक इकाई था। जो अन्न उपजाते थे उनकी उपज में उपरोक्त वर्ग के लोगों का हिस्सा होता था।
मेरी जानकारी में गावों में मुद्रा विनिमय ने 60 के दशक के बाद जोर पकड़ा। गांवों में हर वर्ग के बीच एक ऐसा ताना-बाना था कि समूचा गांव एक जाजम में सोता एक ही चादर को ओढ़ता।
वोट की राजनीति करने वालों से देखा नहीं गया। उन्होंने जाति में बांट दिया जिनकी साझेदारी से गांवों की अर्थव्यवस्था चलती थी वे दलित-पिछड़े अगड़े हो गए। वे आरक्षरण की खैरात की लाइन में लग गए इधर टाटा ने लुहारी छीन ली और बाटा ने चर्मकारी। सब के उद्यम एक-एक करके छिन गए।
आज गांवों में मल्टीनेशनल की घुसपैठ हो गई। रंगरेज, पटवा, सोनार, तमेर सबके धंधे हड़प लिए गए। ये सब अब नौकरी व मजदूरी की कतार में खड़े बैठें है। और दूसरी बात पिछले तीन दशकों में गांव का पलायन शहर की ओर बहुत तेजी से बड़ा है। इसकी वजह रोजगार के साथ जरूरी संसाधनों की कमी है।
जैसे गांवों में अच्छे स्कूल नहीं हैं, जो हैं वो अव्यवस्थित और सरकारी हैं। जो सरकारी स्कूल हैं वह सिर्फ वजीफा बांटने या दोपहर का भोजन खिलाने मात्र के हैं। उनकी कोई मानीटरिंग नहीं की गई और आधुनिक आवश्यकताओं से नहीं जोड़ा गया। इस दृष्टि से गांव के लोग भारी तादात में शहर की ओर भागे।
गांवों में स्वास्थ्य सेवाएं नहीं हैं। बिजली जो आज की जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा है, वह नहीं है। देश का दुर्भाग्य देखिए कि दूर दराज के गांवों तक मोबाइल और इंटरनेट पहुंच गया लेकिन जिन सुविधाओं की वजह से एक भारतीय गांव, गांव कहलाता है वे सुविधाएं वहां पर दूर दूर तक दिखाई नहीं देतीं हैं। टेलीविजन के मायारूप से प्रभावित होकर भी बहुत बड़ा पलायन गांव से शहर की ओर हुआ है।
अब जरूरी ये है कि गांव का चयन करते वक्त उस गांव की पृष्ठभूमि का एक सामाजिक आर्थिक अध्ययन हो और जो वर्ग वृत्तियों से जुड़े थे कभी, उनके पुराने कौशल को वापस लाने के लिए योजनाएं बनें।
एक संपूर्ण गांव, जिस गांव की बात महात्मा गांधी किया करते थे, वो गांव संपूर्ण गांव तब बनेगा जब उसकी अपनी अर्थ व्यवस्था होगी। इस अर्थ व्यवस्था का जो मूल घटक है वह पुराने परांपरकि लोग हैं, जो कृषि का काम करते हैं। रंगरेजी, दर्जी, पटवा, लुहार, करीगरी आदि का काम करते हैं।
आज इनको जातीय चश्मे से अलग देखने की आवश्यकता है और उनकी सदियों से चली आ रही परंपराओं को नए आधुनिक संदर्भ में, आधुनिक अर्थ व्यवस्था के तहत सहेजने और विकसित करने की जरूरत है।
नरेन्द्र मोदी ने मॉडल तो गांधी का लिया पर यह नहीं समझा कि गंगा में पानी बहुत बह चुका है। गांव में विभाजन की रेखा गहरी हो चली है। विषमता की खाई चौड़ी हो चुकी है।
ज्यादातर गांवों की स्थिति यह है कि सत्तरफीसदी जोत की जमीन पांच फीसदी लोगों के हाथ में है। गांव के सत्तर फीसदी लोग इन पांच फीसदी लोगों के यहां काम करें या शहरों में जाकर मजदूरी करें, स्लम में जिएं।
आजादी के बाद सीलिंग एक्ट आया। निर्धारित किया गया कि एक परिवार के पास अधिकतम इतनी भूमि होनी चाहिए। सीलिंग एक्ट के कानून पर रत्ती मात्र अमल नहीं हुआ।
पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने जो इतने लंबे दिनों तक शासन किया वो सीलिंग एक्ट को कड़ाई से पालन करवा के ही किया। भूमि का समान वितरण करके। अब सीलिंग एक्ट की कोई बात नहीं करता। क्योंकि नौकरशाह और नेता दोनों ही जमीदार हैं। ये क्यों अपनी जमीन छिनने देंगे।
कोई भी गांव तभी आदर्श बन पाएगा जब वहां के लोगों में जीविका के साधन विकसित किए जाएं। जीविका का साधन खेती है और जोत की जमीन पर मुट्ठीभर के लोगों का कब्जा।
जिन वृत्तियों से गांव की अर्थव्यवस्था चलती थी उन्हें फिर से स्थापित करना होगा। यानी की कुटीर उद्योगों को। इसके लिए सरकार जोर दे। आधुनिक तकनीक गांवों तक पहुंचाए- लुहारी, बढ़ईगिरी, दर्जी के काम जैसे बुनियादी उद्योगों को बढ़ाए।
आज गांव में सिर्फ दो प्रजाति ही रहती है। एक जमीदार और दूसरे मजदूर। जमीदारों के पास खेती के ऐसे आधुनिक साधन आ गए कि मजदूरों की जरूरत ही नहीं बची। जब गांव-गांव के रूप में बचेंगे तब न उन्हें आदर्श बनाया जाएगा।
पहले जरूरी है ऐसी समेकित व समावेशी योजनाओं के बनाने का जो गांवों को उनकी पुरानी पारंपरिक अर्थव्यवस्था में जान फूँके। वृत्तिगत कौशल को लौटाए।
विषमतामूलक समाज वाले गांवों को आदर्श बनाने की बात कागजी ही रहेगी, क्योंकि गांधी के बाद किसी भी राजपुरुष ने गांवों के अंतस में झांकने की चेष्ठा ही नहीं की।

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साँच कहै ता मारन धावै झूठे जग पतियाना..

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इस बार की कबीर जयंती बिना किसी बड़े सरकारी आयोजन के गुजर गई। पिछले चुनाव के पहले शरद ऋतु में भोपाल के लाल परेड़ में बड़ा आयोजन हुआ था और लोकसभा चुनाव से पहले हमारे प्रधानमंत्री कबीर के मरणस्थल ‘मगहर’ उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने गए थे।
आजकल महापुरुषों के जन्म और मरणदिन वोटीय महत्व के हिसाब से मनाए जाते हैं। इसमें मैं कोई हर्ज नहीं मानता। भले ही कबीर जेष्ठ में उमस के बीच आग बरसते दिनों में काशी में पैदा हुए थे, लेकिन मेरा मानना है कि कबीर जैसे औघड़ महापुरुष का तो नित्यप्रतिदिन आठों याम, चौबीसों घंटे, प्रतिक्षण प्रकटोत्सव मनाया जाना चाहिए।
नाम की ही बड़ी महत्ता होती है, उस बहाने उस महापुरुष के कामों का भी स्मरण हो जाता है। अब कबीर के कहन का सवांश भी स्मरण हो आए तो भला ही भला। कबीर की जिंदगी तो मुक्त छंद है उन्हें कैसे भी गाओ। जिसने उन्हें जिस नजर से देखा उस तरह पाया।
कबीर ऐसे औघड़ हैं कि उनको जप के या उनकी कही कहके काम सधने की बजाय बिगड़ ज्यादा जाता है। इसलिए वे सत्ता को कभी भी नहीं सुहाए। जिनने पकड़ने की कोशिश की वो हाथ जला बैठे।
कबीर आग के गोले की मानिंद हैं, उनसे शीतलता की उम्मीद करना व्यर्थ है। जेठ की पूरी तपन उनमें समाई है। होश सँभालने के बाद से ही उनकी सत्ता से भिडंत शुरू हो गई। आज उनके साखी, सबद, रमैनी और दोहे बम्बगोला की तरह दमदमाते हैं।
मुझे याद है कि एक सरकार ने पाठ्यक्रम से उनके कई दोहे हटवा दिए थे। उनमें से एक दोहा यह भी था-
निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय,
बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय।।
अब भला बताएं इस चापलूस युग में निंदकों की कहां गुंजाइश। इमरजेंसी के दौर के अग्निधर्मा शायर दुष्यंत ने लिखा था-जिसकी नजर उठी वह शख्स गुम हुआ। सो सत्ता की नजर ..ढाई आखर प्रेम.. से पहले निंदक नियरे पर पड़ी और दोहा किताब से गायब। हमारी पीढी ने इसे पढा़ था, नयी पीढी तो ..दुनिया बुरा माने तो गोली मारो.. वाली है।
बहरहाल सरकार द्वारा निंदक नियरे वाले दोहे की कटौती का.. हल्ला विधानसभा में भी मचा था। इसके बाद हल्ला मचाने वालों की सरकार आई तो उसके एक उत्साही मंत्री में भारी कबीर प्रेम जागा। सो उन्होंने ने कबीर की जयंती पर आधिकारिक रूप से जनसंपर्क दिवस मनाने की घोषणा कर दी।
यह भी बड़ा मजेदार वाकया था। जो कबीर मरने के लिए काशी छोड़कर मगहर चले गए उन कबीर को सत्ता के साकेत में सिंहासन पर बैठा दिया गया। इसमें कबीर का तो कोई बस रहा नहीं सो उनकी जयंती में चारण-भाँटों की भाँति सत्ता की उपलब्धियों का उच्चारण होने लगा।
उन दिनों भी मैंने एक विनतीनुमा लेख लिखा था। भाई साहब जनसंपर्क को बरबाद मत करिए। यदि इन लोगों में कबीर की आत्मा उतर आई तो कहीं के नहीं रहोगे। कबीरदास का प्रेत आपको राजनीति नहीं करने देगा।
राजनीति में तो कई-कई मुँहों से अलग-अलग सुविधानुसार बोलना पड़ता है। कबीर तो खुली आँखोँ वाले संत थे। वे तो घर जारकर साथ चलने का आह्वान करते हैं। यहां तो राजनीति में घर बनाने आते हैं लोग। कल तक जो झोपड़े में थे आज महलों में हैं।
अब किसी दिन कबीरदास के प्रेत ने लुकाठी हाथ में थमा दी और कहा ले पहले अपना घर जार फिर चल हमारे साथ तो न तो आपकी राजनीति बचेगी और न ये सरकार।
ये अच्छा हुआ कि वे उत्साही मंत्री जी अगले साल कबीर जयंती को जनसंपर्क दिवस के रूप में नहीं मना पाए। उनकी तरक्की हो गई, वे केन्द्र की राजनीति में चले गए। कबीर दफ्तरों में टँगने से बच गए।
मैंने इस सरकार के एक असरदार नेता को सुझाया कि अपने अधिकारियों के प्रबोधन करने के लिए कविभूषण और चंदबरदाई को पढना अनिवार्य कर दीजिए। क्योंकि जनसंपर्क के अधिकारी/कर्मचारी भी उन्हीं स्कूलों से वही किताबों को पढकर निकले हैं जिनमें ..कबीर का निंदक नियरे वाला दोहा पढा़या जाता था।
सुशासन के लिए ब्रेनवाश जरूरी है।
नेताजी ने जवाब में कहा- अब इसकी जरूरत नहीं हमने सीधे, सीधे भूषण, चंदबरदाई को ही आउटसोर्स कर लिया है। जो ..ठंडा मतलब कोका कोला.. का स्लोगन लिखते थे वही अब अपने लिए लिखा करेंगे। कबीर कितने महान हैं कइयों की आत्मा और दिमाग को ठंडे का तड़का लगने से बचा लिया।
कबीर, तुलसी से ज्येष्ठ थे। तुलसी ने आँखे बंदकर आत्मा से भक्ति करने की बात की। कबीर ने कहा आँखे खोलकर भक्ति करो। जो अच्छा लगे अच्छा कहो, बुरा लगे बुरा बताओ। आँखें भी दोनों खुली रहनी चाहिए। जिससे मस्जिद-मंदिर दोनों दिखें। और उनमें बैठे ढोढकविद्या रचने वाले पंडा मौलवी भी।
कबीर को चाहे निरक्षर लढ़े या डी.लिट वाला पढ़े सबको बराबर समझ में आते हैं। क्योंकि इन्होंने घुमाफिराकर कुछ भी नहीं कहा। कहने का अंजाम भी भोगा और बताया। इन्हें पढने-समझने के लिए किसी विद्वान व्याख्याता की भी कोई जरूरत नहीं।
मैंनें बचपन से अबतक इन्हें पढा़। हजारी प्रसाद द्विवेदी के कबीर को भी और पुरुषोत्तम अग्रवाल की अकथ कहानी प्रेम की भी। कबीर को आप जितना ही पढते जाएंगे कबीर आपमें उतने ही घुसते जाएंगे।
लोककलाओं के विश्वप्रसिद्ध अध्येता कपिल तिवारी जब आदिवासी लोककला परिषद में थे तो उन्होंने मुझे एक विदेशी लिंडा हेस से मिलवाया था। किस देश की थीं यह तो मुझे याद नहीं लेकिन जब मैंने बताया कि मैं रीवा से हूँ तो उन्होंने रीमाराज्य राज्य से कबीर के रिश्ते के बारे में इतना कुछ बता दिया जितना अपने देसी अध्येता भी नहीं जानते।
कबीर का किसी राजव्यवस्था से भी कोई संपर्क हो सकता है यह असहज सी बात है। पर रीमाराज्य जो कि उन दिनों बाँधवगद्दी के नाम से जाना जाता था कबीर का व्यापक प्रभाव था। उन दिनों आधा छत्तीसगढ़ भी बघेल राजाओं के आधीन था। आप देखेंगे की आधे छत्तीसगढ़ और उन दिनों के रीवा राज्य के दूसरे हिस्सों में कबीर की स्मृतियाँ किसी न किसी रूप में हैं। बाबर के समकलीन राजा वीरसिंह देव से लेकर वीरभानु तक की गद्दी कबीर के शिष्यत्व में रही।
बाँधवगढ़ के सेठ धनी धरमदास तो कबीर के उत्तराधिकारी ही बन गए और कबीर पंथ को आगे बढ़ाया। सेन नाई भी बाँधव दरबार के थे। अमरकंटक में कबीर और नानक की भेंट हुई थी। गुरुग्रंथ साहेब में कबीर के सबद, साखियां और दोहे हैं। हमारी माटी में कबीर के संस्कार हैं। उनके सबदों की सुवास है इसलिए मैं ऐलानिया कहा करता हूँ कि ..आपन जात कबीर की..है।
जैसा कि मैंने कहा-कबीर को पढना,कबीर के भीतर घुसना या इसका विलोम भी। याने कबीर का आराधन कबीर को अपने दिलो-दिमाग में बैठाने जैसा है। ये पढकर बिसराए नहीं जा सकते हैं।
दुनिया के ये ऐसे विरले जीव हैं कि लिखा कुछ भी नहीं- मसि कागद छुयो नहिं कलम धरयो नहिं हाथ। इनकी कही बातों को जितना सहेजा गया ऐसा किसी के साथ नहीं हुआ। क्योंकि ये आँखिन देखी बयान करते हैं,कागद लेखी नहीं।
कबीर गरीब गुरबों की उम्मीद हैं। समुंदर के किनारे जलती हुई लाट हैं जो किसी को भटकने नहीं देते। कबीर के कहे को गीता की तरह ग्रहीत करना होगा तभी आत्मा का मैल साफ होगा,दिन की रतौंधी दूर होगी।
कबीर प्रतिक्षण याद किये जाने चाहिए। राजव्यवस्था कबीर से सीख ले तो उसे रामराज्य तक इंतजार ही नहीं करना होगा। कबीर और उनकी वाणी आज भी अमोघ है इसपर ..आधे से कछु आध.. भी अमल हो तो भारतवर्ष ही नहीं संपूर्ण विश्व का कल्याण हो जाए।
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आठ वर्षो में देश का स्वाभिमान – पुनः स्थापित हुआ।

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सुधीर पाण्डे

पिछले आठ सालों में इस देश को ऐसा क्या मिला, जो आज़ादी के बाद के सात दशक के इतिहास में हासिल न हो सका। स्वतंत्रता के बाद भारत को विकास की ओर ले जाने वाला बुनियादी ढांचा कितना सही था और कितना गलत, इसकी समीक्षा 70 सालों के दौरान कभी नहीं कि गई। यह मान लिया गया कि भारत के नवनिर्माण की जो राह बनी थी, उसे ही विकास की धारा मानकर निरन्तर मजबूत बनाये रखना है।

पिछले आठ सालों के दौरान इन पुरानी अवधारणाओं को तोड़ा गया, इनकी समीक्षा की गई और विकास को अवरूद्ध न करते हुए नई तकनिकी और प्रयोगों के दम पर तेजी से आगे ले जाने की कोशिश की गई। आठ वर्ष का समय किसी भी बिगड़ी हुई धारा को सुधारने के लिए प्रयाप्त नहीं कहा जा सकता। इन परिस्थितियों में जब पुरानी धारा के आवेग को बिना रोके उनमें सुधार और नई धाराओं का प्रादुलभाव किया जा सके। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आठ वर्ष पूर्व जिन प्रयोगों को भारत में प्रारंभ किया वे प्रथम दृष्टि में स्वीकार्य नहीं माने गये। यही कारण था कि इन प्रयोगों के दीर्घकालीक की समीक्षा के स्थान पर इन्हें घातक करार दे दिया गया।
समय के साथ स्थितियों में परिवर्तन आया है, जो भारत आठ वर्ष पूर्व विश्व के सामने एक अपरिचित अभिव्यक्ति था। उसे ना सिर्फ पहचान मिली बल्कि नये पंखों के भरोसे उसने उड़ान भरना भी सीख लिया।
आठ वर्ष की अवधि में यदि मोदी सरकार की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि पर गौर न किया जाए तो वह बैमानी होगा। अंग्रेजों के शासनकाल की पूर्व अवधि से क्रमशः भारत में अपनी पहचान खो दी थी, आत्मविश्वास के स्तर पर हम विश्व में सांप और बंदर नचाने वाले देशों के रूप में अपनी पहचान रखते थे। विश्व का कोई भी देश इतनी बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद हमारी आर्थिक अर्थ व्यवस्था को महत्व नहीं देता था। दूसरे अर्थो में कहे तो समूचा विश्व भारत का उपयोग करता था, पर भारत को अपने समकक्ष पहुंचने देना नहीं चाहता था। नागरिक चेतना केवल अपने स्वार्थपूर्ती पर आकर ठहर जाती थी, और राष्ट्रहित नागरिक के व्यक्तिगतहित के साथ जुड़ जाता था। परिणाम यह होता था कि कोई राजनैतिक दल गरीबी हटाओं का नारा देकर देश में अपनी सरकार दशकों तक चलाने में सक्षम हो जाता था।
आठ वर्ष पूर्व चंद नाम ही ऐसे होते थे, जिन्हें इस देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाले नेताओं के रूप में जाना जाता था। यह कैसे भूला जा सकता है कि क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद की मां अपने पूरे जीवन काल में आज़ादी के बाद भी डकैत की मां के रूप में अपने जीवन यापन के लिए निम्नतम स्तर का संघर्ष करती रही। देश में इन चंद जमीदारों को आज़ादी के लिए नेता मान कर उनकी महिमा मंडित की गई। पर उन अज्ञात और ज्ञात संघर्षशील व्यक्तियों को स्वाधीनता के युद्ध में एक सेनानी तक की जगह नहीं दी गई। यह बात अलग है कि स्वाधीनता संग्राम सेनानी को आजीवन पेंशन के नाम पर राशि ताम्र पत्र के साथ दी गई थी। पिछले आठ वर्षो में समाज के विभिन्न वर्गो से आज़ादी के संघर्ष की वास्तविक गाधा को निकाला गया, तो वर्षो से चला आ रहा एक बड़ा झूठ समूचे भारत के सामने आकर खड़ा हो गया, कि चंद लोगों ने नहीं समूचे भारत ने अलग-अलग प्रेरणाओं को माध्यम से दो सौ वर्ष की आज़ादी के संघर्ष को अपना सब कुछ खो कर जिया था।
आठ वर्षो में भारत को स्वाभिमान दिया है, अपने गुजरे हुए कल की वास्तविक पहचान दी है और भविष्य में इस विश्व में अपनी पताखा फैलाने के लिए एक मजबूत आधार दिया है। नई राह पर भारत क्रमशः एक नई इबारत लिखेगा इसमे संदेह नहीं होना चाहिए।

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