Home Blog Page 4982

लोहिया के एक नारे ने देश की दिशा ही बदल दी!

0

जयराम शुक्ल

‘पिछड़ा पावै सौ में साठ’ का नारा देने वाले सोशलिस्ट नेता डाक्टर राममनोहर लोहिया ने कहा था ‘लोग मेरी बात सुनेंगे लेकिन मेरे मरने के बाद’ आज लोहिया का यह नारा राजनीतिक दलों और नेताओं के सिर पर चढ़कर बोल रहा है।
उत्तरप्रदेश और बिहार के बाद अब मध्यप्रदेश में पिछड़े वर्ग की राजनीति परवान पर है। फौरी सबब है नगरीय निकाय और पंचायत के चुनाव का। कांग्रेस और भाजपा बढ़चढ़कर ऐसे पैरवी कर रही हैं कि यदि उनका बस चले तो समूचा आरक्षण ही ओबीसी के चरणों में रख दें।

Jay Ram Shukla सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश सरकार से 27% ओबीसी आरक्षण देने का तार्किक आधार माँगा था, जो सरकार देने में विफल रही। सुप्रीमकोर्ट के अंतरिम आदेश के अनुसार कहा गया जितना आरक्षण देना हो दीजिए लेकिन यह सीमा 50% पार नहीं होना चाहिए। भाजपा ढोल बजाकर नाच रही है- हम जीत गए, हम जीत गए।
लेकिन हकीकत यह कि चुनाव में पिछड़ों के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण बहाल हो गया जो पहले से था। यह जानते हुए भी कि सुप्रीम कोर्ट को 27 प्रतिशत पिछड़ावर्ग आरक्षण स्वीकार्य नहीं होगा लेकिन कमलनाथ की अल्पकालिक सरकार ने यह रायता फैलाया। इसके बाद दोनों पार्टियों के नेताओं ने झूठ पर झूठ बोलकर समाज को भ्रम के कुहासे में धकेल दिया।
पिछडों के हितैषी दिखने की राजनीति सिरपर चढकर झूठ पर महाझूठ इसी तरह बोलती रहेगी और यही 2023 के विधानसभा व लोकसभा का आधार भी बनने वाला है।
पिछड़ों की यह राजनीति आजादी मिलने के कुछ बरस बाद से ही शुरू हो गई। डाक्टर राममनोहर लोहिया आजादी मिलने के एक वर्ष पूर्व ही पंडित नेहरू से राजनीतिक मतभेदों के चलते अलग हो गए। जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, अशोक मेहता, आचार्य नरेन्द्र देव के साथ मिलकर सोशलिस्ट पार्टी बना ली।
डाक्टर लोहिया जातितोड़ों का आंदोलन जरूर चलाते थे पर उनका मानना था कि यह प्रवृति तभी खत्म होगी जब पिछड़ेवर्ग लोग सामाजिक और राजनीतिक रूप से बराबरी पर आ जाएंगे।
लोहिया के पिछड़े लोगों में जाति नहीं थी बल्कि वंचित समुदाय था जिसमें महिलाएं भी शामिल थीं। लोहिया की परिभाषा में दलित कोई जाति नहीं वरन् वे लोग थे जिन्हें सदियों से दबाया और कुचला गया था, जो शोषित थे। इसी परंपरा को यमुना प्रसाद शास्त्री ने शोषितोदय कहकर आगे बढ़ाया।
63 में वे फरुख्खाबाद से उप चुनाव में जीतकर लोकसभा पहुँचे। वे मानते थे कि कांग्रेस वोट तो दलितों और पिछड़ों से लेती है पर उसका नेतृत्व कुलीन हाथों में है। वामपंथियों को भी इसी श्रेणी का मानते थे। यद्यपि लोहिया स्वयं कुलीन मारवाड़ी थे।
1965 के आसपास उन्होंने दो नारे दिए पहला नारा था- संसोपा ने बाँधी गाठ, पिछड़ा पावै सौ में साठ, दूसरा नारा था- मँहगी रोको बाँधों दाम, वरना होगा चक्का जाम। पहले नारे को कांग्रेस के भीतर ही पिछड़ा वर्ग के लोगों ने जाति को आधार बनाकर सूत्रवाक्य बना लिया।
कांग्रेस के भीतर से ही चौधरी चरण सिंह ने लोहिया के इस नारे को बुलंद किया और प्रकारान्तर मेंं उत्तरप्रदेश की चन्द्रभानु गुप्त की सरकार गिरा दी। बिहार में पिछड़े वर्ग के कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने। पिछड़ों की यह राजनीति सैलाब की तरह ऐसी बढ़ी कि गैर कांग्रेसवाद के अश्वमेधी घोड़े पर सवार हो गई।
67 तक कांग्रेस की नौ राज्यों की सरकारें बेदखल हो गईं। गैर कांग्रेसवाद के इस नारे को जनसंघ का साथ मिला। पंडित दीनदयाल उपाध्याय लोहिया के साथ हो लिए। वही क्रम 77 में दोहराया गया जब जेपी और नानाजी की जोड़ी बनी।
दरअसल लोहिया पंडित नेहरू से इस बात से भी नाखुश रहे कि 1955 पिछड़ावर्ग के हितों के लिए गठित काका साहब कालोलकर की सिफारिशों को दरकिनार कर दिया गया था।
1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो सबसे बड़ा काम 1978 में बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में आयोग गठित कर दिया जिसे पिछड़े वर्ग के लिए सिफारिशें देनी थी।
मंडल साहब ने जनता पार्टी की सरकार के गिरते -गिरते अपनी सिफारिशें पेश की। 1980 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार पुनः आ गई। मंडल कमीशन की रिपोर्ट राजीव गाँधी के शासन काल तक दबी रही।
1989 में जब वीपी सिंह की जनमोर्चा सरकार बनी तो मंडल कमीशन फिर याद आया।
मंडल साहब ने 1931 की जातीय जनगणना को आधार मानकर रिपोर्ट दी कि देश में 52 प्रतिशत आबादी पिछड़ों की है। आरक्षण में 50 प्रतिशत की सीमा और जातीय आबादी को ध्यान में रखते हुए केन्द्र सरकार की ओर से 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का आदेश जारी हुआ।
इस आदेश से देश में भूचाल सा आ गया। सवर्ण युवाओं ने आत्महत्याएं की..। लेकिन पिछड़ा वर्ग की राजनीति का सिक्का चल निकला।
1990 के बाद लालू यादव और मुलायम सिंह का राजनीति में अभ्युदय हुआ। दोनों राज्यों की पिछड़े वर्ग की राजनीति की हवा मध्यप्रदेश आ पहुंची। 1990 के बाद इन तीनों राज्यों में एक भी ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना। एक दो अपवाद छोड़ दें तो अदल-बदलकर पिछड़े वर्ग से ही मुख्यमंत्री बनते रहे।
1991 में नरसिंह राव की सरकार आने के बाद सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत का आरक्षण देकर मामले को ठंडे करने की कोशिश की लेकिन पिछड़े वर्ग की राजनीति तबतक धधक चुकी थी।
सभी राज्यों ने मंडल कमीशन के 52 प्रतिशत और केन्द्र के 27 प्रतिशत आरक्षण की बात को पकड़ लिया। जबकि हर राज्यों में जातीय आबादी का प्रतिशत अलग-अलग है। लेकिन फिर भी सभी दलों ने पिछड़ों को लुभाने के लिए आरक्षण का खेल शुरू कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट की वैधानिक चेतावनी के बाद भी तामिलनाडु और राजस्थान ने तो आरक्षण का दायरा 67 तक पहुंचा दिया।
इस बीच 2018 में जब कांग्रेस की सरकार बनी तब कमलनाथ ने पिछड़े वर्ग की आबादी की दुहाई देते हुए आरक्षण को 14 से 27 प्रतिशत बढ़ा दिया। मध्यप्रदेश में अजाजजा हेतु वैसे भी 36 प्रतिशत का आरक्षण है। इसमें 27 प्रतिशत जोड़ देने से यह दायरा 63 प्रतिशत पहुँच जाता है। जबकि अभी भी संविधान में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत की है।
यह सीमा तब तक रहेगी जबतक कि संविधान में संशोधन न लाया जाए। गुस्से में सुप्रीम कोर्ट यह बात कई बार और बार-बार दुहरा चुका है।
कांग्रेस और भाजपा दोनों इस वास्तविकता को जानती हैं पर पिछड़े वर्ग को अपने पाले में लाने की होड़ के चलते हालात को इस मुकाम तक पहुंचा दिया। आरक्षण की इस अतार्किक लड़ाई में पिछड़े वर्ग के युवा भी वैसे ही फँसकर पिस रहे हैं जैसे कि सामान्य वर्ग के।
गैर कांग्रेसवाद की रौ पर लोहिया ने यह नारा तो उछाल दिया कि ‘पिछड़ा पावै सौ में साठ’ लेकिन उसकी परणति का आँकलन अपने जीते जी नहीं कर पाए। जिस सामाजिक विषमता के खिलाफ जिन्हें लेकर उन्होंने राजनीतिक युद्ध छेड़ा था वही आज जातीय राजनीति के सबसे बड़े झंडा बरदार बन गए। पर वे यह बात सही कह गए- लोग मेरी बात सुनेंगे लेकिन मेरे मरने के बाद।
◆और अंत में
पंचायत चुनावों में हम ओबीसी को
27% टिकट देंगे: कांग्रेस
और हमने 27% से ज्यादा देना तय कर रखा है: भाजपा
अब आगे…
महाजन आयोग की रिपोर्ट देखेंगे कि वे कितने प्रतिशत की बात कर गए: कांग्रेस
बिसेन आयोग ने अभी-अभी 35% देने की बात की है : भाजपा
हम मंडल आयोग की सिफारिश के अनुसार 52% देने जा रहे हैं: कांग्रेस
लोहिया जी कह गए थे पिछड़ा पावै सौ में साठ सो अब भाजपा ने है बाँधी गाँठ..
मोदी राज में 10% धनी 90% के मालिक हैं सो हम उन 90% वालों को आरक्षण देंगे: कांग्रेस
तन समर्पित मन समर्पित और पिछड़ों के लिए जीवन समर्पित
लो 100% दिया: भाजपा
इसमें 10% प्रवासियों को भी जोड़कर हम 110% आरक्षण देंगे: कांग्रेस
कोई शक……!!!
संपर्कः8225812813

Jairam Shukla Ke Facebook Wall Se

मतदाता के पक्ष में नहीं है – कांग्रेस या भाजपा

0

भोपाल: मध्यप्रदेश में राजनीति के विचार को और चिंतकों का बदलती हुई परिस्थितियों पर गहन परिक्षण चल रहा है। विभिन्न तथ्यों के अन्वेषन के उपरांत दो दलीय शासन प्रणाली पर आधारित मध्यप्रदेश की राजनीति को बारीकी से और तथ्यों के आधार पर परीक्षित किया जा रहा है। अलग-अलग समूहों में राजनीति को लेकर चलने वाली चर्चाओं और भविष्य में पड़ने वाले उनके प्रभावों को भी इतिहास की कसौटी में तोलने की कोशिश की जा रही है।
अब तक हुई चर्चाओं के अनुसार मध्यप्रदेश जैसे राज्य जहां समूचे भारत की विभिदताएं छोटे समूह में उपस्थित है। एतिहासिक तथ्यों और आकड़ों से अलग कोई बड़े परिवर्तन की संभावना नहीं नजर आती है। चर्चाओं के दौरान यह भी पाया गया कि मध्यप्रदेश की सरकारों का गठन या राजनैतिक दलों के बहुमत के निर्धारण के मूल में जिस मतदाता का प्रभाव है वह अस्थिर, दबा और कुचला हुआ या अन्य उपेक्षित जाति समूह का प्रतिनिधि है। भावना प्रधान मतों के संग्रह में वैचारिक अस्थिरता बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बहुत कम अवसर ऐसे पाये जाते है जब मध्यप्रदेश का मतदाता नेतृत्व के किसी चेहरे या उसके कृत्यों से प्रभावित होकर मतदान करता है।

Sudhir Pandeyसर्वप्रथम कांग्रेस के संदर्भ में देखे तो चिंतन से यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान में कांग्रेस के पास इस सहज सरल मतदाता के लिए कोई चेहरा नेतृत्व के रूप में सामने नहीं है। ऐसा कोई चित्र भी नहीं है जिस पर मतदाता भरोसा कर सके। इन स्थितियों में जमीनी कार्यकर्ताओं की सक्रियता और उनका आम जनमानस से जुड़ाव केवल कांग्रेस के पक्ष मे माहोल बना सकता है। कांग्रेस के पास कार्यकर्ता है नहीं और कांग्रेस से अधीक कांग्रेस के नेताओं के जुड़ाव अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धी में है अर्थात कांग्रेस को अहंकार के आकाश से निचे उतर कर जमीन पर आना होगा जो अब उसके लिए संभव नहीं है।
दूसरी और भारतीय जनता पार्टी पिछले लगभग दो दशक से शासन में रहते हुए अब चारित्रिक रूप से शासक बन गई है। ऊंची आवाज में माइक के सामने मुक्के पटक कर दावेदारी करने से इस संवेदनशील मतदाता पर कोई प्रभाव डाला जा सकेगा वह संभव नहीं है। कहावत है फल से लदे हुए वृक्ष का झुकना जरूरी होता है, संभवतः यह प्रकृति द्वारा बनाये गये विनम्रता के सिद्धांत का उदाहरण है। बीस वर्ष की सत्ता के बाद अब भाजपा में मुख्यमंत्री पद के लिए एक दौड़ शुरू हो गई है, जिस पर आने वाले दिनों में न संघ का और नाही संगठन का कोई नियंत्रण रहेगा। इसका प्रमुख कारण विभिन्न नेताओं से जुड़े हुए कल तक अनुशासित रहे कार्यकर्ताओं का महत्वकांशा के कारण अनुशासनहीन हो जाना होगा।
उपरोक्त दोनों ही दल राजनीति की परिभाषा और सिद्धांतों में विश्वास नहीं रखते या यह कहे कि दोनों ही दलों के नेता क्षणिक स्वार्थ पूर्ति के लिए राज्य को पुनः भुलावे की गलत फहमी पाले अपनी भविष्य की योजनाओं को कागजी तौर पर पूरा कर रहे है। कांग्रेस के पास न कोई योजना है और नाही कोई लक्ष्य है तो केवल अहंकारपूर्ण दावे और इन दावों की बुनियान कार्यकर्ताओं के बिना खोखली है। दूसरी और सत्ताधारी भाजपा संघ के सिद्धंतों से अलग हटकर अब राजनीति सेवा के लिए नहीं व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए कर रही है। जहां से भी आम मतदाता को और वह विशेष कर मध्यप्रदेश के मतदाता को कुछ भी मिल पाने की संभावना नहीं है। राजनीति का चिंतन लगातार जारी है और यही चिंतन चुनाव के काफी पूर्व भविष्य की धारा का भी निर्धारण कर देगा।

Sudhir Pandey Ke Facebook Wall Se

पूरे कुएं में अनाड़ीपन की भांग…हर घण्टे नुकसान

0

ना काहू से बैर/ राघवेंद्र सिंह

मध्य प्रदेश का सियासी सीन कुछ इस तरह का है कि संगठन में मजबूत भाजपा बदलाव के नाम पर खरगोश की तरह उछलते – कूदते काम कर रही हैं। निर्णयों में समझदारी और समन्वय की अपेक्षा विमर्श कम विवाद ज्यादा की तर्ज पर सब चल रहा है। सुबह कमेटियों का गठन और शाम को उन्हें भंग करने से अनाड़ीपन का जो नया चलन शुरू हुआ है उससे नुकसान प्रति घन्टे की रफ्तार से हो रहा है। पीढ़ी परिवर्तन के जिस काम का चहुंओर स्वागत होना चाहिए था वह इतना बेशऊर किया गया कि उसकी प्रशंसा के बजाए जी भरकर निंदा हो रही है। बदलाव की तेज रफ्तार ने पूरे घर के संगठक बदल तो दिए मगर उससे जो रायता फैल रहा है उसे समेटने के लिए संघ के सिफारिश करने वाले नेताओं को भी कुछ समझ सूझ नही पड़ रहा है। बदहवासी का आलम यह है कि रायता हाथ से तो कोई जुबान से समेटने का प्रयास कर रहा है। आम कार्यकर्ताओं से लेकर संघ के दिग्गजों की चिंता कमजोर और बद से बदतर होते संगठन की तरफ इशारा करती है। जिन विष्णुदत्त शर्मा की भाजपा आयु 10 वर्ष की थी उन्हें प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बना कर पार्टी में सकारात्मक क्रांति का सपना देखा गया था अब उसे बुरे सपने की तरह टूटता हुआ भी देखा जा रहा है। संघ के एक दिग्गज के साथ प्रदेश भाजपा की समीक्षा में माना गया कि अधेड़ और साठ की उम्र वाले स्वस्थ व सक्रिय पके नेताओं को अनुभवहीन युवाओं को लाने के नाम पर जिस जल्दबाजी के साथ साइड लाइन किया गया उससे पार्टी को प्रति घन्टे के हिसाब से नुकसान हो रहा है। भोपाल से लेकर पूरे सूबे में जिस तरह संगठन चल रहा है उससे लगता है आने वाले नगरीय चुनाव में भाजपा सबसे कमजोर प्रदर्शन करे तो किसी को आश्चर्य नही होगा। बस इसी बात का डर संघ परिवार और भाजपा के प्रमुख नेताओं की नींद उड़ाए हुए है।

Raghavendra Singh

भाजपा में पहली बार हुआ…
पिछले दिनों दिल्ली में भाजपा की समीक्षा बैठक में जिस रिपोर्ट कार्ड पर बात हुई उसमे पहली बार संघ नेताओं की भी उपस्थिति रही। यह कई अर्थों में बेहद अहम है। इसे भाजपा में संघ का सीधा दखल भी माना गया। अर्थात संघ अपने जिन प्रिय पात्रों को भाजपा में संगठन महामंत्री के अलावा जिन पदों पर बैठाएगा उनकी असफलताओं को ढकने के लिए खुद भी मौजूद रहेगा। पहले इस तरह के संरक्षण का भाव केवल संगठन मंत्रियों के लिए ही देखा जाता था लेकिन अब यह दायरा बढ़ कर पब्लिक पॉलिटिक्स से सीधे जुड़े रहने वाले पदों तक जा पंहुचा है। बस यहीं से संगठन की दुर्गति का बैंडबाजा बारात निकलने के हालात बन गए हैं । दिल्ली बैठक में संघ ने भी अनुभवी नेताओं को हाशिए पर लाने को अच्छा नही मानते हुए अप्रसन्नता व्यक्त की। बताते हैं इस बैठक में मुख्यमंत्री से लेकर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भी शरीक थे। सीएम- अध्यक्ष में समन्वय बढाने की बातें भी हुईं।

सुबह समिति बनी और शाम को भंग…
भाजपा में निंदक नियरे राखिए …की बात तो अब दूर की कौड़ी है। जो अखबार, पत्रकार, नेता- कार्यकर्ता सच्ची और अच्छी बात कहे उसे पार्टी विरोधी या कुंठाग्रस्त बता घर बैठाने की राह पर लगता है पूरी टीम चल पड़ी है।
एक बैठक में प्रभारी मुरलीधर राव को कहना पड़ा- ये क्या तमाशा चल रहा है कि भाजपा, युवा मोर्चा, प्रकोष्ठों की कार्यकारणी का गठन नही हो पा रहा है। 2023 में चुनाव होना है। जिलों की कार्यकारणी सुबह गठित होती है और शाम को भंग हो जाती है।
दूसरी तरफ हकीकत यह है कि भाजपा की मीडिया/प्रवक्ताओं की टीम जो कभी बहुत स्ट्रांग होती थी वह बिखरी सी है। मीडिया फ्रेंडली मुद्दों के जानकार खांटी भाजपाई उपेक्षित और उदास हैं । पूर्व संवाद प्रमुखों से लेकर मीडिया प्रमुख रहने वाले नेताओं में विजेंद्र सिंह सिसोदिया, दीपक विजयवर्गीय, गोविं मालू, डॉ हितेष वाजपेई से लेकर राजो मालवीय, प्रखर नेता रजनीश अग्रवाल को उनकी विशेषज्ञता के अनुरूप काम नही मिला। जिन शैलेन्द्र शर्मा को 2004- 05 में रोजगार बोर्ड का अध्यक्ष बनाया था उन्हें संगठन में जब कोई जिम्मेदारी नही मिली तो फिर उन्हें रोजगार बोर्ड का जिम्मा सौंप दिया गया।

राजनीति में नाबालिगों के जिम्मे भाजपा…
संघ परिवार में अक्सर प्रचारकों की संग आयु पूछी जाती है। उसी के हिसाब से उनका महत्व होता है ऐसे ही भाजपा में भी पार्टी के लिए काम करने वालों की आयु पुष्टि आती है आमतौर से आज की तारीख में जो भाजपा में संगठन के कर्ताधर्ता है उनकी भाजपा आयु दो से लेकर 12 वर्ष तक की है और उनके अधीनस्थ काम करने वालों की पार्टी में प्रदेश जे लेकर मंडल तक काम करने वालों की राजनीतिक आयु 30 से 40 साल तक की है। ऐसे में उन्हें जो ऊपर से निर्देश मिलते हैं वह अपरिपक्व होने के साथ-साथ राजनीति में अनाड़ीपन के भी होते हैं। यही वजह है कि प्रदेश भाजपा की कार्यसमिति की बैठक जो आमतौर से तीन महीने में होती है वह ढाई साल तक नहीं हो पाती । वह इसके अलावा भाजपा में युवा मोर्चा और महिला मोर्चा सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इत्तेफाक से युवा मोर्चा के जो अध्यक्ष पिछले दो बार से रहे हैं उनका राजनीतिक अनुभव शून्य से शुरू होता है। वर्तमान में भाजयुमो प्रदेश अध्यक्ष वैभव पवार अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से प्रदेश भाजपा में आते हैं और फिर सीधे मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बना दिए जाते हैं । अनुभव न आंदोलन कुछ नही। गणेश परिक्रमा का प्रताप बस। इसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। पद तो जल्दी मिला लेकिन संगठन चलाने की गम्भीरता तो अनुभव से ही आएगी। अध्यक्ष प्रेस वार्ता रखते हैं और खुद ही गैरहाजिर हो जाते हैं। अनाड़ीपन की यह पूरी एक श्रंखला है जो प्रदेश भाजपा से लेकर युवा मोर्चा उनके प्रभारियों तक इस कदर है कि केंद्रीय नेतृत्व और बतौर उनके नुमाइंदे भेजे गए प्रदेश प्रभारी भी परेशान हैं। हालात ये है कि पूरे आसमान में ही छेद है पैबन्द कहां तक लगाए जाएं। टीम कैप्टन के नाते अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा भी अवश्य चिंतित होंगे। संगठन की कमजोरी उनके लिए भी अच्छी खबर तो नही है। नगरीय निकाय के चुनाव हुए तो बहुत सम्भव है पार्टी अब तक का सबसे कमजोर प्रदर्शन करे। अनुशासन में रहने वाले सन 2000 के पहले वाले कार्यकर्ता मिस कॉल वाली नई टीम में अल्पसंख्यक की तरह हैं। नए हैं तो उनके सपने भी पार्षद और मेयर बनने वाले हैं। पार्टी के लिए निष्ठा और समर्पण से काम करना उनकी डिक्शनरी में थोड़ा मुश्किल से मिलेगा। इसलिए टिकट पाने के लिए जूतमपैजार वाला संघर्ष भी दिख सकता है। एक जिले की यात्रा के दौरान प्रदेश प्रभारी मुरलीधर राव ने बेनर पोस्टर, होर्डिंग की भरमार देखते हुए नसीहत दी कि होर्डिंग लगाने और हनुमान चालीसा जेब मे रखने से टिकट नही मिलेगा। पार्टी के लिए काम करना होगा।
दरअसल कार्यकर्ताओं को संस्कारित करने वाले संगठन महामन्त्रियों की गर्व करने वाली परम्परा में अब पितृ पुरुष कुशाभाऊ ठाकरे हैं न रसूख और रुआबदार प्रो कप्तान सिंह सोलंकी जैसे कद्दावर संगठनमंत्री हैं। इसलिए तो प्रभारी मुरलीधर राव को हर बार भोपाल से लेकर दिल्ली तक बैठकों में जो कहना सुनना पड़ रहा है प्रतिदिन पार्टी की चिंता को और भी स्याह करता प्रतीत हो रहा है।
संघ के सहकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले से लेकर प्रदेश प्रभारी के बयानों की बानगी सबको चिंता में डालने वाली है।
पीढ़ी परिवर्तन के नाम पर पूरे घर के बदल डालेंगे की तर्ज पर पुराने कार्यकर्ताओं की जगह नए रंगरूटों ने ली है उससे भाजपा के सभी वरिष्ठ परेशान है। बड़ी संख्या में अनुभवियों को हाशिए करने पर श्री होसबोले ने एतराज जताया है। संघ परिवार के जिन दिग्गजों की सिफारिश पर भाजपा में युवाओं के नाम पर जो पदाधिकारी बने हैं वे सब गुड़ गोबर करने में जुटे है।

कांग्रेस की कछुआ चाल…
मध्यप्रदेश में कांग्रेस बहुत खामोशी के साथ काम कर रही है। अध्यक्ष के तौर किसी नए नेता को लाने के बजाए कमलनाथ को बरकरार रखा। विवादों से बचते हए एक तरह से यह फिलहाल ठीक लगता है। जमीनी कमान फील्ड मार्शल दिग्विजयसिंह सम्हाले हैं। ग्वालियर – चंबल इलाके में कांग्रेस ज्योतिरादित्य सिंधिया को उलझाकर कमजोर करना चाहती है। कमलनाथ- दिग्विजयसिंह की जोड़ी का असर नगर निगम चुनावों में साफ देखने को मिलेगा। इन दोनों नेताओं को भाजपा में पीढ़ी परिवर्तन से उपजे असन्तोष
का अनुमान है। इसका वे चतुराई के साथ लाभ लेने की तैयारी में जुटे हैं। दिग्विजयसिंह के साथ युवक कांग्रेस अध्यक्ष और महिला कांग्रेस अध्यक्ष उनकी रणनीति के अनुरूप कदमताल कर रहे हैं। वैसे भी उन्हें कार्यकर्ताओं को एकजुट करना और उनसे काम कराना आता है।

Raghavendra Singh Ke Facebook Wall Se

कमलनाथ कब तक रह पाएंगे कांग्रेस के नाथ…

0

ना काहू से बैर/राघवेंद्र सिंह

अप्रैल में ज्योतिषी गणना के मुताबिक शनि, राहु – केतु समेत नौ ग्रहों ने अपनी चाल और घर बदले हैं। इन सब का असर सियासत और समाज दोनों पर पड़ने वाला है। कांग्रेस के साथ भाजपा भी इससे अछूती नही रहेगी। मध्य प्रदेश कांग्रेस पर सबसे पहले इसका प्रभाव पड़ा है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के महाबली वयोवृद्ध नेता कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष में से फिलहाल नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ना पड़ा है। वरिष्ठ नेता डॉ गोविंद सिंह को नेताप्रतिपक्ष बनाया गया है। इसके बाद 2023 के विधानसभा चुनावों को लेकर जो चुनौतियां हैं उनके सामने कमलनाथ कितना टिक पाते हैं यह आने वाला वक्त बताएगा लेकिन अभी से कहा जाने लगा है कि कांग्रेस को 24 घंटे काम करने के लिए किसी युवा की जरूरत है ।

Raghavendra Singhमैं ज्योतिष का जानकार तो नहीं हूं लेकिन कहा जाता है कि ग्रहों की चाल का असर समाज के साथ राजनीति करने वालों पर भी पड़ता है। साथ ही ग्रहों के परिवर्तन के पहले सही संकेत मिलना शुरू हो जाते हैं । ज्योतिष और ग्रहों की चाल के अतिरिक्त राजनीतिक रूप से भी हालात को समझने की कोशिश की जाए तो कांग्रेसमें लंबे समय से कमल नाथ की तुलना में युवा और सकरी सक्रिय नेता को प्रदेश कांग्रेस की बागडोर सौंपने की बात होती रही है पूर्व राज्यपाल और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे अजीज कुरैशी तो सार्वजनिक तौर पर कमलनाथ को नेता प्रतिपक्ष और अध्यक्ष के पद से हटाने की बात कर चुके हैं। पार्टी नेतृत्व परिवर्तन की जो बात अजीज कुरैशी जैसे वरिष्ठ नेता ने की थी दरअसल वह कांग्रेस के कई नेताओं व कार्यकर्ताओं की भावनाओं को व्यक्त करती है। लेकिन नेता प्रतिपक्ष से कमलनाथ की विधायकों कांग्रेस के ही लोग पूर्ण परिवर्तन नहीं मानते उनका मानना है प्रदेश कांग्रेस को एक ऐसा अध्यक्ष चाहिए जो 24 घंटे कांग्रेस की नीति, कार्यकर्ता और जनता के लिए काम करें। प्रदेश की राजनीति में कभी छोटे भाई और बड़े भाई के रूप में काम करने वाले कमलनाथ व दिग्विजय सिंह के बीच पिछले दिनों जो मतभेद उभर कर आए थे उससे कमलनाथ काफी कमजोर हुए नतीजा यह हुआ की 2 महीने के भीतर कमलनाथ को नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ना पड़ा और अब संगठन को मजबूत करने के साथ भाजपा से मिलने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए मालवा या बिंद क्षेत्र से किसी जुझारू और संजीदा लीडर की जरूरत है जो प्रदेश कांग्रेश को संभाल सके इसी बीच कमलनाथ के कट्टर समर्थक सज्जन सिंह वर्मा ने संकेत दिया है कि कमलनाथ जी वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता हैं उनकी जरूरत पार्टी के लिए मध्य प्रदेश के अलावा दिल्ली और जिन राज्यों में चुनाव है वहां महसूस की जा रही है इसका मतलब अगर खोजा जाए तो आने वाले दिनों में संभवत वर्मा द्वारा बताई गई आवश्यकताओं के मुताबिक कमलनाथ को कांग्रेस कोई राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी भी सौंप सकती है इसका मतलब पहले नेता प्रतिपक्ष और बाद में प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद से भी कमलनाथ विदा हो सकते हैं असल में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव और 2024 में लोकसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस हाईकमान मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जनता और कार्यकर्ता से जुड़े किसी मजबूत नेता को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपना चाहती हैं। पिछले चुनाव में समन्वयक के रूप में पूर्व मुख्यमंत्री नर्मदा यात्री दिग्विजय सिंह ने यह काम किया था। नतीजा सबके सामने है। पन्द्रह साल बाद प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में कमलनाथ और उनके सलाहकार सरकार को चला नहीं पाए। प्रशासक के रूप में तो कमलनाथ सफल रहे लेकिन सीएम के रूप में वे सरकार के शिल्पी बने दिग्विजय सिंह और मंत्री- विधायकों और ज्योतिरादित्य सिंधिया को साथ नही रख पाए। नतीजा सबके सामने हैं कांग्रेस की सरकार गिर गई बात यहीं नहीं रुके इसके बाद कमलनाथ और दिग्विजय सिंह में भी मतभेद गहराने लगे। यह बात तब सबके सामने आई जब किसानों के एक प्रतिनिधि मंडल को लेकर तयशुदा वक्त पर दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से मुलाकात करने वाले थे। मगर यह मुलाकात रद्द कर दी गई। उसके पीछे वजह यह बताई गई कि दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री शिवराज से किसान प्रतिनिधि मंडल को मिलने का जो समय लिया था उसकी जानकारी या अनुमति पहले कमलनाथ क्यों नही ली गई ? यह बात दिग्विजय सिंह और उनके समर्थकों को नागवार गुजरी। इसके बाद ही कांग्रेस के इन दोनो दिग्गजों में दूरियां बढ़ने लगी । कांग्रेस हाईकमान के पास सभी जानकारियां पहुंची और इसी बीच राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर मैं अपने प्रेजेंटेशन में एक व्यक्ति एक पद के साथ युवाओं को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपने की बात की तो उसे पार्टी सुप्रीमो सोनिया गांधी समेत लगभग सभी लोगों का समर्थन मिला। ऐसा लगता है आने वाले दिनों में मध्य प्रदेश कांग्रेस को लेकर जो बहुत से परिवर्तन हो गए उसमें दिग्विजय सिंह के सोच- चिंतन और उनकी टीम का अक्स जरूर नजर आएगा। साल के अंत तक बहुत संभव है प्रदेश कांग्रेस को नए अध्यक्ष भी मिल जाए। इसमें अर्जुन सिंह के पुत्र वरिष्ठ कांग्रेस नेता अजय सिंह राहुल के साथ अरुण यादव जीतू पटवारी के नाम भी चर्चाओं में है अजय सिंह राहुल को प्रदेश कांग्रेस की कमान मिलती है तो एक तरह से विंध्य क्षेत्र जहां भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में एक तरफा प्रदर्शन किया था वहां भाजपा को रोकने में कांग्रेस को मदद मिल सकती है। महाकौशल में कमलनाथ का असर कांग्रेस के काम आ सकता है चंबल क्षेत्र में नेता प्रतिपक्ष डॉक्टर गोविंद सिंह कांग्रेस को सिंधिया के सामने मजबूत कर सकते हैं मालवा में दिग्विजय सिंह और उनके समर्थक निमाड़ और आदिवासी बहुल क्षेत्र में में सहकारिता के कद्दावर नेता रहे सुभाष यादव के पुत्र अरुण यादव प्रभावी भूमिका अदा कर सकते हैं कांग्रेस हाईकमान इन सब को एकजुट कर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अच्छे परिणामों की उम्मीद लगा सकता है ।

शिव के गणों विष्णु के पदाधिकारियों में बदलाव के संकेत…
मध्य प्रदेश भाजपा को लेकर पिछले दिनों दिल्ली में जो बैठक हुई वह अपने आप में ऐतिहासिक है। ऐसा कभी नहीं हुआ कि भाजपा की बैठक में संघ की भी हिस्सेदारी रही हो। इसकी वजह यह बताई जाती है की पार्टी हाईकमान को उस फीडबैक मिला है वह बहुत चिंता में डालने वाला है। कांग्रेस को वेंटिलेटर पर बताने वाली भाजपा के पास ग्राउंड जीरो की जो रिपोर्ट है उसमें विधायक मंत्रियों के साथ संगठन भी कार्यकर्ता और जनता से कम कनेक्ट हो पा रहा है। इसमें सिंधिया समर्थक मंत्री भी निशाने पर है। सबको लगता है मोदी का मैजिक विधानसभा चुनाव में भी उनकी नैया पार करा देगा लेकिन संगठन के वरिष्ठ नेता शिव प्रकाश और मुरलीधर राव के साथ संघ ने जो जानकारी भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को दिए वह निश्चित ही बहुत चौंकाने वाली है यही वजह है कि भाजपा की महत्वपूर्ण बैठक में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समेत प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा प्रदेश प्रभारी शिव प्रकाश मुरलीधर राव के साथ संघ के वरिष्ठ नेता भी उसमें शामिल हुए बैठक के बाद संकेत मिले हैं की मंत्री जो काम नहीं कर रहे हैं उनकी विदाई हो सकती है कुछ के विभाग बदले जा सकते हैं और संगठन में भी जो नेता चुनाव लड़ना चाहते हैं उनको भी समझाइश दी जा रही है कि वे संगठन के दायित्व पर ध्यान दें या अपने चुनाव क्षेत्र पर। दोनो में से किसी एक काम को चुनने के लिए कहा जा सकता है। इसका मतलब आने वाले कुछ महीने भाजपा नेताओं की धुक धुकी बढ़ाने वाले होंगे।

अनुराधा शंकर सिंह और आधी आबादी
मध्य प्रदेश की अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक अनुराधा शंकर सिंह ने नौकरी पेशा महिलाओं की उपेक्षा और उनके लिए बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने पर जो बात कही वह इन दिनों चर्चा में है। पिछले दिनों पुलिस मुख्यालय में शताधिक महिला पुलिस अफसर और महिला पुलिस सिपाहियों के बीच शोषण और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कुछ प्रश्न उठाए। इसमें मंत्रालय में वीआईपी फ्लोर पर महिलाओं के लिए वाशरूम का नही होना चिंता की बात है। महिलाओं की उपेक्षा की यह बात तब सुर्खियों में आई जब सीएम शिवराज सिंह चौहान 2 हजार 52 एम्बुलेंस का लोकार्पण कर रहे थे। इसमें इसमें महिलाओं के लिए जननी सुरक्षा योजना को महत्ता दी गई है। सीएम के पसंदीदा अफसरों में रही अनुराधा शंकर सिंह ने महिलाओं खास तौर पर महिला पुलिस को लेकर जो चिंता जताई है उस पर जरूर सरकार सकारत्मक निर्णय करेगी। वैसे भी सीएम बहनों और भांजियों के मुद्दे पर बेहद सतर्क और संवेदनशील रहते हैं।

Raghavendra Singh Ke Facebook Wall Se

नक्सल और माओवाद में बुनियादी फर्क समझिए!

0

जयराम शुक्ल

बस्तर फिर अशांत है। चरमपंथियों ने बंद का आह्वान किया है। मीडिया और अन्य वर्ग के लोग इसे नक्सलियों का एक्शन बता रहे हैं। जबकि वस्तुतः ये कानू सान्याल, चारू मजूमदार की नक्सलबाड़ी के क्रांतिदूत नहीं, अपितु ये वहसी राक्षस हैं, ये नक्सली नहीं, माओवाद की नकाब ओढ़े फिरौती और चौथ वसूलने वाले राष्ट्रद्रोही, खूनी दरिन्दे, डकैत और लुटेरे हैं।
नक्सल, यहां से आया

नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुई है जहाँ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने 1967 मे जमीदारों के खिलाफ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की। पं.बंगाल की तत्कालीन सरकार सामंतों की पोषक थी और वे खेतिहर मजदूरों का क्रूरता के साथ शोषण करते थे।
सरकार जब मजदूरों, छोटे किसानों की बजाय जमीदारों के पाले में खड़ी दिखी तो यह धारणा बलवती होती गई कि मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिये सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं, जिसकी वजह से उच्च वर्गों का शासन तंत्र और फलस्वरुप कृषितंत्र पर वर्चस्व स्थापित हो गया है।

Jay Ram Shukla 1 इस न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है। 1967 में “नक्सलवादियों” ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। इन विद्रोहियों ने औपचारिक तौर पर स्वयं को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया और सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी।
1971 के आंतरिक विद्रोह (जिसके अगुआ सत्यनारायण सिंह थे) और मजूमदार की मृत्यु के बाद यह आंदोलन एकाधिक शाखाओं में विभक्त होकर कदाचित अपने लक्ष्य और विचारधारा से विचलित हो गया।
कानू सान्याल ने से अपने आन्दोलन की यह दशा देखकर 23 मार्च 2010 को नक्सलबाड़ी गांव में ही खुद को फांसी पर लटकाकर जान दे दी थी। मरने से एक वर्ष पहले बीबीसी से बातचीत में सान्याल ने कहा था कि वो हिंसा की राजनीति का विरोध करते हैं.
उन्होंने कहा था, ‘‘ हमारे हिंसक आंदोलन का कोई फल नहीं मिला. इसका कोई औचित्य नहीं है. ’’
नक्सलबाड़ी की क्रांति पं.बंगाल के जमीदारों के खिलाफ थी..चूकि तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे जो कि खुद बड़े जमीदार थे के नेतृत्व वाली पं.बंगाल सरकार जमीदारों की पक्षधर थी इसलिए इस लड़ाई को सरकार के खिलाफ घोषित कर दिया गया था।
बहरहाल अपनी मौत से पहले कानू सान्याल ने हिंसक क्रांति को व्यर्थ व अनुपयोगी मान लिया था। नक्सलबाड़ी की क्रांति किसान-मजदूरों की चेतना का उद्घोष थी।
नक्सलबाड़ी की क्रांति में खेतिहर महिलाएं भी शामिल थीं..जिन्होंने हंसिया,खुरपी,दरांती से सामंती गुन्डों का मुकाबला किया..। अपने आरंभकाल में यह क्रांति अग्नि की भांति पवित्र व सोद्देश्य थी..इसके विचलन को स्वीकारते हुए ही कानू सान्याल ने आत्मघात किया।
सन् 2006 में एक पत्रिका की कवर स्टोरी के संदर्भ में मैने कानूदा से बातचीत की थी।
क्या ये नहीं मालूम कि कानू सान्याल और चारू मजूमदार का नक्सलवाद 77 की ज्योतिबसु सरकार के साथ ही मर गया था।
जिस भूमिसुधार को लेकर और बंटाई जमीदारी के खिलाफ नक्सलबाड़ी के खेतिहर मजदूरों ने हंसिया और दंराती उठाई थी उसके मर्म को समझकर पं.बंगाल में व्यापक सुधार हुए , साम्यवादी सरकार के इतने दिनों तक टिके रहने के पीछे यही था।
उस समय के नक्सलबाड़ी आन्दोलन के प्रायः सभी नेता मुख्यधारा की राजनीति में आ गए थे। चुनावों में हिस्सा भी लिया। मेरी दृष्टि में इन आदमखोर माओवादियों को नक्सली कहा जाना या उनकी श्रेणी में रखना उचित नहीं।
वैसे बता दें कि आधिकारिक तौर पर भी ये नक्सली नहीं माओवादी हैं और सरकार भी मानती है कि ये राष्ट्र के खिलाफ युद्ध छेड़े हुए हैं। जबकि नक्सलियों का कदम विशुद्ध रूप से सामंती शोषण के खिलाफ था।
दरअसल पड़ोस के किसी भी देश को अस्थिर और आंतरिक विद्रोह की स्थिति उत्पन्न करना चीन की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। विचारों के साथ अस्त्र-शस्त्र और हिंसक क्रांति का नारा समता मूलक समाज के लिए एक छलावा है। नागरिक अधिकारों को पाँव तले रौंदना वाला चीन(वहां की सत्ता) स्वयं दुनिया भर में गरीबों के शोषण के लिए बदनाम है लेकिन वह तमाम उन देशों में ऐसे अपराधिक गिरोहों को फंड उपलब्ध कराता है ताकि सरहद पर लड़ने की बजाय वह उन्हें घर के भीतर ही अस्थिर कर सके। दुर्भाग्य यह कि देश का बड़ा तबका नकस्ली व माओवादी में इस बुनियादी भेद से अब तक अनजान है।

Jairam Shukla Ke Facebook Wall Se

वरिष्ठ नेताओं के दम पर ही – अगले महाभारत के लिए कांग्रेस तैयार

0

सुधीर पाण्डे

भोपाल: आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर बढ़ती हुई सरगर्मी अब राजनैतिक दलों में संगठात्मक परिवर्तन की और जा रही है। कांग्रेस ने यह तय कर लिया है कि पुरानी पीढ़ी के भरोसे ही मध्यप्रदेश में एक बार सत्ता की स्थापना की जायेगी। सबसे रोमांचक पहलू यही है कि मध्यप्रदेश के वरिष्ठ किन्तु विवादास्पद रहे नेता ही अब अग्रिम पंग्ति में आकर संगठन की एकता और सक्रियता को पुनः मजबूत करेंगे। इस प्रयोग से यह संकेत मिलता है कि अखिल भरतीय स्तर पर कांग्रेस का हाई कमान अभी सुधरा नहीं है, बल्कि परम्परागत शैली की राजनीति को ही अपनी आर्थिक मजबूरियों के कारण आश्रय दे रहा है।

Capture 40

कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में अपनी गतिविधियों को कागज़ी तौर पर विस्तार देने की अपनी कोशिशे प्रारंभ कर दी है। सबसे बड़ा परिवर्तन यह है कि कांग्रेस के संगठात्मक ढ़ांचे को बनाने, संचालित करने और सुधारने की जिम्मेवारी प्रदेश अध्यक्ष कामनाथ के निर्देश पर अब लगभग दिग्गिविजय सिंह के हाथों सौप दी गई है। गुना और ग्वालियर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र जहां ज्योतिरादित्य सिंधिया का व्यापक प्रभाव है और भाजपा की दृष्टि से ये क्षेत्र भाजपा के लिए अधिक मजबूत है में मुकाबला राजा और महाराजा के बीच तय कर दिया गय है। सिंधिया को अपनी साख बचाने के लिए इस क्षेत्र में दिग्गिविजय सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस का सामना करना पडेगा। राजनीति के जानकार यह मानते है कि गुना क्षेत्र को छोड़ दे तो शेष ग्वालियर क्षेत्र में सिंधिया दिग्गिविजय सिंह से अधिक प्रभावी है। स्वर्गीय माधवराव सिंधिया के युग से है कांग्रेस की प्रत्येक विजय का सेहरा सिंधिया राज परिवार के सर पर ही बंधता रहा है। इस क्षेत्र में कांग्रेस बिखरी हुई है जातिगत आधार पर बटी हुई है और कार्यकर्ताओं का मनोबल ग्वालियर किले के प्रति उनके पूर्वजों द्वारा व्यक्त की गई निष्ठा के कारण आज भी संगदिग्ध है।

दिग्गिविजय सिंह प्राप्त जानकारी के अनुसार पांच सालों के बाद पुनः कांग्रेस हाई कमान की टीम के सदस्य बना लिये गये है। अब उन्हें वे समस्त जिम्मेवारियां और जानकारियां सीधे प्राप्त करने के आधिकार है जो पिछले गोवा चुनाव के दौरान उनकी संगदिग्ध गतिविधियों के कारण बाधित कर दी गई थी। वास्तव में ये दिग्गिविजय सिंह की जीत है जो गोवा जैसी बडी राजनैतिक घटना के बाद भी उनकी वापसी कमजोर हाई कमान के समाने एक मजबूरी बन गई। कांग्रेस में पुनः कमलनाथ और दिग्गिविजय सिंह की रणनीति पर चलने का निर्णय किया है। इस राजनीति के दो भाग है, पहला कमरा बंद बैठकों और योजनाओं पर प्रबंध की राजनीति को कमलनाथ संचालित करेंगे और खुली हवाओं में कार्यकर्ताओं के मध्य कांग्रेस को सक्रिय बनाने का कार्य दिग्गिविजय सिंह करेंगे। शेष सारा नेतृत्व इन दोनों के आधीन ही निर्देशों पर कार्य करेगा। कांग्रेस हाई कमान राज्य की राजनीति के लिए इन दोनों शीर्ष पुरुषों पर ही विश्वास करेगा।
राजनीति के जानकार मानते है कि पूरे प्रदेश में बिखरी हुई कांग्रेस को एकत्र कर पाना संभव नहीं है। जहां कांग्रेस के छोटे कार्यकर्ता और स्थानीय नेतृत्व भाजपा के प्रभावी नेताओं के साथ सहभागिता से व्यवसाय संचालित कर रहा है, वहां इस तरह की गतिविधि का स्वतंत्र रूप से पार्टी के पक्ष में संचालित हो पाना असंभव है।

वैसे भी दिग्गिविजय सिंह के दिशा निर्देशों पर कांग्रेस का सामान्य कार्यकर्ता ही निर्देश जारी करने के विरुद्ध कई प्रश्न खड़े कर सकता है। दूसरी और यह राजनीति पार्टी के लिए नहीं हो रही है बल्कि अपने बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए और भविष्य के युवा नेताओं को बरगलाने के लिए हो रही है यह बात भी आम कार्यकर्ता को पूरी तरह स्प्ष्ट है। ऐसी स्थिति में एक गंभीर राजनीतिक संरचना का हो पाना अंसभव कार्य है। पीढ़ियों के बदलावों में वैसे भी निष्ठा और वचन बद्धता की राजनीति को समाप्त कर दिया है। जाती हुई पीढ़ी अपने परिवार के स्वार्थ के लिए राजनीति कर रही है तो आने वाले पीढ़ी सीधे युद्ध करके अपने अधिकारों के संरक्षण के लिए तटीबद्ध है। इन स्थितियों में भी कांग्रेस हाई कमान को परम्परागत राजनीति ही बेहतर नजर आती है इसे कम से कम कांग्रेस को तो सौभाग्य तो नहीं कह सकते।

Sudhir Pandey Ke Facebook Wall Se

शाह ने की तारीफ और निष्कंटक हुआ शिव-राज…

0

ना काहू से बैर/ राघवेंद्र सिंह

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 22 अप्रैल 2022 से काफी राहत महसूस कर रहे होंगे। उनके विरोधी खेमे में सियासी तौर पर सत्ता को लेकर चिंता का सूरज तप रहा होगा। चौहान अपने चौथे कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद भोपाल यात्रा पर आए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की प्रशंसा पाने में भी कामयाब हो गए । पिछले 6 महीने में गृहमंत्री शाह की मध्यप्रदेश में यह दूसरी यात्रा थी। जिसमें वह शिवराज के मैनेजमेंट को देखते हुए सरकार की तारीफ किए बिना नहीं रहे।
गृह मंत्री अमित शाह ने भोपाल के जंबूरी मैदान में कहा कि प्रदेश की जबलपुर यात्रा में आदिवासी वनवासी कल्याण लिए 17 सूत्री एलान किया था। तब मैंने शिवराज जी से कहा था जनता हिसाब मांगेगी। आज जब मैंने हेलीकॉप्टर में शिवराज जी से जब 17 सूत्री घोषणाओं के बारे में रिपोर्ट ली तो मुझे खुशी है कि सब पर काम शुरू हो गया है। इसके लिए शिवराज जी और उनकी पूरी टीम के लिए बधाई । शिवराज जी ने अपने काम से प्रदेश पर बीमारू होने का जो टप्पा लगा था राज्य को उससे बाहर निकाल कर विकसित राज्य बना दिया है। यहां आदिवासी कल्याण के जो काम हुए हैं वह दूसरे राज्यों के लिए भी अनुकरणीय है।
बस यहीं से लगता है चौथी पारी के मुख्यमंत्री शिवराज निष्कंटक हो गए। इससे 2023 के विधानसभा चुनाव तक सरकार में कोई परिवर्तन होता नही दिखता है। इस तरह के संकेतों से शिवराज के मुकाबले अगले चुनाव को देखते हुए कांग्रेस को भी परिश्रम की पराकाष्ठा करने वाले नेता की दरकार होगी। जिसके पैर में चक्कर, मुंह में शक्कर,सीने में आग और माथे पर बर्फ हो। सीएम शिवराज अक्सर कार्यकर्ताओं के बीच अपने भाषणों में सफल संगठक के जिन गुणों का बखान करते रहते हैं यही बातें पब्लिक लाइफ में कामयाबी के लिए नेताओं की पूंजी भी होती है। इसी के बूते शिवराज सिंह तीन बार भाजपा को सरकार में लाने का जादू और विरोध के बावजूद चार बार सीएम बनने का हुनर हासिल किए हुए हैं।

मोदी – शाह की सुपर-डुपर जोड़ी…
दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की जोड़ी टीम भाजपा में कप्तान, कोच और मैनेजर की संयुक्त भूमिका में हैं। कौन प्लेयर टीम में आएगा- कौन बाहर बैठेगा से लेकर किसको कब और कैसे खिलाना है यह भी मोदी शाह की जोड़ी तय करती है। कह सकते हैं कि मोदी-शाह की जोड़ी का रसूख सातवें आसमान पर है। ये दोनो भाजपा में नेताओं की सुपर -डुपर हिट लीडरशिप में शुमार हैं। पहले कभी यह रुतबा अटल-आडवाणी की जोड़ी को हासिल था। भाजपा से लेकर सरकार तक में मोदी-शाह, निर्माता-निर्देशक और पटकथा लेखक सब कुछ हैं। यह दोनों दिग्गज, आम भाषा में कहें तो ऑल इन वन हैं। यह सब पार्टी लाइन को मजबूती से पकड़े रहने के कारण भी हुआ।

सूबे में हैं चौहान और तोमर…
मध्यप्रदेश के नेताओं में ऐसी जोड़ी 2005 के बाद से शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र सिंह तोमर की बनी हुई है। चौहान जनता के बीच तो तोमर बतौर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय रहते आए हैं। श्री तोमर के केंद्र में मंत्री बनने के बाद सूबे की सियासत में थोड़े समीकरण बदले हैं लेकिन संगठन और निर्णय करने वाले चौहान- तोमर की जोड़ी की राय को तव्वजो देते आए हैं। प्रयोगों को छोड़ जब भी कभी गम्भीर विकल्प की बात आती है तो तोमर का नाम जरूर सुनाई पड़ता है। कहा जाता है पिछले विधानसभा चुनाव में प्रदेश भाजपा संगठन की कमान तोमर के हाथ होती तो सरकार भाजपा की ही बनती।
पीएम मोदी की मुख्यमंत्री चौहान पर तीसरे कार्यकाल तक सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी वक्र दृष्टि रहा करती थी। उनकी तिरछी नजर और गम्भीर मुख मुद्रा या यूं कहिए पीएम की बॉडी लैंग्वेज यह संदेश देती थी कि सब कुछ ठीक नही है। एमपी में मोदी के गम्भीर रहने पर कहा जाता था ” मुस्कुराइए आप मध्यप्रदेश में हैं “… लेकिन मानना होगा कि मामा शिवराज ने पीएम मोदी को भी मना लिया और गृह मंत्री शाह को भी अपने काम से खुश कर लिया।

सोनिया की किचिन केबिनेट दिग्विजय सिंह…
लगभग पांच साल बाद महात्मा गांधी की प्रबल अनुयायी वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह एक बार फिर सोनिया गांधी किचन कैबिनेट में किए गए हैं। वे अल्पसंख्यकों के पक्ष और भाजपा के साथ संघ परिवार के खिलाफ टीका टिप्पणी करने के कारण अक्सर सुर्खियों में बने रहते हैं। दिनरात कार्यकर्ताओं से जीवंत संपर्क के कारण वे फील्ड मार्शल भी कहे जाते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सत्ता में आने के पीछे उन्हें बड़ी वजह माना जाता है।
कांग्रेस की दिग्विजय सिंह की केंद्रीय राजनीति में वापसी एक बड़ा निर्णय है। प्रशांत किशोर के कांग्रेसमें राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय होने के बाद हुआ है इसका मतलब यह भी है कि आने वाले दिनों में मध्य प्रदेश कांग्रेस में भले ही कोई बदलाव ना हो लेकिन विधानसभा में कांग्रेस को पीसीसी चीफ कमलनाथ की जगह कोई नया नेता प्रतिपक्ष मिल जाए हालांकि ऐसा कमलनाथ की इच्छा के बगैर संभव नहीं है क्योंकि नाथ का गांधी परिवार से वर्षों पुराना पारिवारिक और आत्मीय रिश्ता है हालांकि पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह से भी गांधी परिवार खासतौर से स्वर्गीय राजीव गांधी और सोनिया जी के बहुत गहरे रिश्ते थे लेकिन विधानसभा चुनाव के पहले कैप्टन अमरिंदर मुख्यमंत्री पद से विदा कर दिए गए थे। नतीजतन बाद में कैप्टन ने कांग्रेस छोड़ दी थी। इसलिए देखना होगा कि बदली हुई परिस्थितियों में यह पुराने रिश्ते पार्टी हित में कितनी अहमियत रखेंगे।

Raghavendra Singh Ke Facebook Wall Se

या अली….मदद करो बजरंगबली!

0

जयराम शुक्ल

नवसंवत्सर से हनुमान जयंती तक के बीच में देश में कोई सात दंगे हुए। रामनवमी के दिन मध्यप्रदेश का खरगोन आग से झुलस उठा। रामदरबार की झाँकी के साथ निकल रही शोभायात्रा पर पत्थरों, पेट्रोल बमों की बारिश हुई। कुछ सिरफिरे युवाओं ने भीड़ में तलवार बाजी की। उसके कवर कर रहे शैतानों ने गोलियां दागीं।
गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पुलिस अधीक्षक को गोली लगी वे अस्पताल में है। एक मासूम अस्पताल में जीवन-मृत्यु से संघर्ष कर रहा है। हमले मंदिरों पर भी हुए। उन्हें तोड़ा और मूर्तियां नष्ट की गईं। बताने की जरूरत नहीं कि यह क्यों और किन लोगों ने किया। यह भी बहस का अलग विषय है कि खुफिया तंत्र और प्रशासन फेल रहा। विमर्श का विषय यह कि नफरत की आग यकायक इतनी तेज कैसे होने लगी?

Jay Ram Shukla हम जितनी तरक्की करते जा रहे हैं। पढ़ने-अध्ययन करने में जितने प्रवीण होते जा रहे हैं उसकी दूनी रफ्तार से दकियानूस और खुदगर्ज भी। दरअसल यह खेल उन लोगों का है जो देश के भीतर और बाहर यह बात तेजी से फैला रहे हैं कि भारत में मुसलमान असुरक्षित हैं।
ये वही लोग हैं जिन्होंने ऐसी ही असुरक्षा की भावना फैलाकर छह दशकों तक मुसलमान वोटरों को दुहा और मंचों से गंगा-जमुनी संस्कृति की दुहाई दी। मुसलमानों को एक कौम के रूप में पाले और बनाए रखा। कौम का मतलब राष्ट्र होता है तो क्या राष्ट्र भीतर या समानांतर कोई दूसरा राष्ट्र(कौम) भी है। हम अक्सर तकरीरें सुनते हैं कि ‘हम अपने कौम के लोगों से यह इल्तिजा करते हैं’। क्या मतलब हुआ इसका? क्या हम और आप कौम(राष्ट्र) में शामिल नहीं हैं..?
जिस किसी ने गंगा-जमुनी संस्कृति की थ्योरी दी और जिन्होंने इसे स्थापित किया वे ही आज नफरत की इस लहलहाती फसल के लिए जिम्मेदार हैं। एक राष्ट्र में दो समानांतर संस्कृति नहीं बह सकती। उनमें क्षेत्र और समय के हिसाब से वैविध्य अवश्य हो सकता है पर प्रतिद्वंदिता नहीं। यहाँ दशकों से गंगा के समानांतर जमुना की बात की जाती है।
जमुना का अस्तित्व तो प्रयाग में आकर खत्म हो जाता है। न जाने कितने नद-नदियां और नाले गंगा में आकर गंगामय हो जाते हैं। उनका अस्तित्व विलीन हो जाता है।
उसी तरह देश की विभिन्न सभ्यताओं, परंपराओं और संस्कृतियाँ मिलकर राष्ट्रीय संस्कृति गढ़ती हैं।
हिन्दू कभी असहिष्णु नहीं रहे। आज भी वे न जाने कितने पीर और औलिया को मानते हैं। मजारों में जाकर मन्नतें माँगते व मत्था टेकते हैं। अजमेर शरीफ और निजामुद्दीन औलिया की दरगाह में जाइए आपको मुसलमानों से ज्यादा हिन्दू ही मिलेंगे। लेकिन हिन्दू तीर्थ स्थलों व उनके देवी-देवताओं को लेकर जो भाव महमूद गजनवी और बाबर में था कमोबेश वही आज भी है। जबकि उनमें से बड़ी संख्या (90प्रतिशत के करीब) के मुसलमानों की पितृभूमि व उनके पुरखों की पुण्यभूमि यही भारत है।
पता नहीं इस यथार्थ को क्यों नहीं समझाया जाता। जब यही समझाइश राही मासूम रजा और आरिफ मोहम्मद खान जैसे विशुद्ध मुस्लिम स्कालर देते हैं तो उन्हें काफिर घोषित कर दिया जाता है। उनके दकियानूसी विचारों और परदे के पीछे के पापों को जब तस्लीमा नसरीन और सैटनिक वर्सेस के लेखक सलमान रश्दी देने लगते हैं तो उनके सिर को कलम करने का हुक्म सुना दिया जाता है।
मध्ययुग में रसखान, रहीम, जायसी, नजीर और न जाने कितने मुस्लिम स्कालर हुए जिन्होंने अपने धर्म को नहीं बदला लेकिन भारतीय संस्कृति और उनके महापुरुषों पर इतना सुंदर लिखा जिसे हम भजन-कीर्तन की तरह याद रखते हैं। क्या यह धारा फिर नहीं बह सकती। यदि हमने निजामुद्दीन औलिया और अजमेर शरीफ समेत अनगिनत पीर-औलिया-और बाबाओं को सिरमाथे पर रखते हैं उनके दर पर जाकर आस्था व्यक्त करते हैं तो दूसरों के धर्म के प्रति सद्भाव की यह धारा देवबंद और बरेली से क्यों नहीं फूटनी चाहए।
जो धर्म जड़ होता है आज नहीं तो कल उसका मरना तय है। उदात्तता ही उसे सतत् बनाए रखती है इसीलिए हमारा धर्म धर्म है रिलीजन नहीं, वह सनातन धर्म है। कभी-कभी प्रश्न उठता है कि ईसाइयत को आए 22 सौ वर्ष हुए और इस्लाम के मुश्किल से 17 सौ वर्ष।
जब ये धर्म नहीं थे तब आज के इनके अनुयायियों के पुरखे किस धर्म के अनुयायी रहे होंगे। इससे पहले के धर्मों में अग्निपूजकों का धर्म था, उनके पहले भी कोई धर्म रहा होगा। और वह धर्म सनातन ही ही है जिससे विश्वभर में अलग-अलग नए पंथ तैयार होते गए। यानी कि सभी के मूल में सनातन धर्म ऐसे ही है जैसे की ईश्वर, अल्लाह, जीसस एक हैं। उन तक पहुँचने के पंथ, पद्धति और मार्ग में विभेद हो सकता है। विवेकानंद ने अपने संभाषणों में यही कहा। रामधारी सिंह दिनकर ने संस्कृति के चार अध्याय में भी लगभग ऐसी ही व्याख्याएं दीं।
कभी-कभी लगता है कि गाँव के अनपढ़ और आधुनिक शिक्षा से दूर कहे जाने वाले लोग धर्माचार्यों और मौलवियों की अपेक्षा धर्म के मर्म को न सिर्फ ज्यादा जानते हैं अपितु उसे जीते भी हैं।
मुझे अपने गाँव का वो अली और बजरंगबली वाला दृष्टान्त याद आ रहा है जब इन दोनों देवों में बँटवारा नहीं हुआ था…। “बात 67-68 की है। मेरे गाँव में बिजली की लाइन खिंच रही थी। तब दस-दस मजदूर एक खंभे को लादकर चलते थे। मेंड़, खाईं, खोह में गढ्ढे खोदकर खड़ा करते। जब ताकत की जरूरत पड़ती तब एक बोलता.. या अलीईईईई.. जवाब में बाँकी मजूर जोर से एक साथ जवाब देते…मदद करें बजरंगबली..और खंभा खड़ा हो जाता।
सभी मजूर एक कैंप में रहते, साझे चूल्हें में एक ही बर्तन पर खाना बनाते। थालियां कम थी तो एक ही थाली में खाते भी थे। जहाँतक याद आता है..एक का मजहर नाम था और एक का मंगल।
वो हमलोग इसलिए जानते थे कि दोनों में जय-बीरू जैसे जुगुलबंदी थी। जब काम पर निकलते तो एक बोलता – चल भई मजहर..दूसरा कहता हाँ भाई मंगल।
अपनी उमर कोई पाँच-छ: साल की रही होगी, बिजली तब गाँव के लिए तिलस्म थी जो साकार होने जा रही थी। यही कौतूहल हम बच्चों को वहां तक खींच ले जाता था। वो लोग अच्छे थे एल्मुनियम के तार के बचे हुए टुकड़े देकर हम लोगों को खुश रखते थे।
उनदिनों हम लोग भी खेलकूद में.. याअली..मदद करें बजरंगबली का नारा लगाते थे और मजाक में एक दूसरे को मजहर-मंगल कहकर बुलाते थे।
उनकी एक ही जाति थी..मजूर और एक ही पूजा पद्धति मजूरी करना। तालाब की मेंड़ के नीचे लगभग महीना भर उनका कैंप था न किसी को हनुमान चालीसा पढ़ते देखा न ही नमाज।
सब एक जैसी चिथड़ी हुई बनियान पहनते थे, पसीना भी एक सा तलतलाके बहता था। खंभे में हाथ दब जाए तो कराह की आवाज़ भी एक सी ही थी। और हां मजहर के लोहू का रंग भी पीला नहीं लाल ही था।
तुलसी बाबा कह गए-
रामसीय मैं सब जगजानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।
बाद में गालिब ने इसकी पुष्टि करते हुए ..मौलवियों से पूछा…या वो जगह बाता दे जहाँ खुदा न हो..!
यह अजीब हवा-ए-तरक्की है .सबकुछ बँट गया हाँसिल आया लब्धे शून्य..! इस शून्य की पीठपर सिंहासन धरके किस पर राज करोगे भाई।

Jairam Shukla Ke Facebook Wall Se

धरती माता को बुखार अरे है कोई सुनने वाला….

0

जयराम शुक्ल
धरतीमाता का ताप साल-दर-साल बढ़ता ही जा रहा है। पिछले साल के मुकाबले इस साल तापमान कुछ और डिग्री ज्यादा रहेगा, मौसम वैज्ञानिकों ने ऐसा अनुमान व्यक्त किया है। अब तो हरीतिमा से ढँके भोपाल का पारा 45 सेल्सियस तक पहुंच जाता है। आज से बीस-पच्चीस साल पहले अमरकंटक और पचमढ़ी में एसी की मशीनें नहीं थीं। इन देसी हिल स्टेशनों में अब बिना एसी गुजारा नहीं। आज वहां जाएं तो झुलस जाएंगे। अमरकंटक की “माई की बगिया” की गुलबकावली वैसे ही झुलसी-झुलसी सी रहती है जैसे गोरे गाल में कोई गरम तवा छुआ दे।

Jay Ram Shukla नौतपा नौदिन का नहीं पूरे अब पूरे अप्रैल मई रहता है। अगले वर्षों से कहीं इसका नाम न बदलना पड़े। इस पूरी गरमी सूरज आग का गोला बना सिर पर ही सवार है। नीचे की जमीन वैसे ही गरम जैसे डोसा सेंकने वाली लोहे की प्लेट। लू-लपट के आगे हीटर ड्रायर फेल। कुलमिलाकर हालत ऐसे जैसे कि भँटा ओवन में सिझता है। गरमी में ऐसे ही कई सिझकर मौत के निवला बन जाते है, इसे हीट स्ट्रोक का नाम दिया गया है अनुपम मिश्रजी कहा करते थे कि धरती माता का बुखार लगातार बढ़ता जा रहा है, साल दर साल। क्या हम तभी सम्हलेंगे जब वह कोमा में पहुँच जाएगी। वे ग्लोबल वार्मिंग को इसी तरह समझाते थे। मनुष्य को जब बुखार आता है तो उसका तापमान बढ़ता है। हमें बुखार क्यों आता है? जब शरीर की प्रतिरोधक क्षमता विषाणुओं के आगे पस्त हो जाती है और हमारे अंग संक्रमित होने लगते हैं। यह संक्रमण मिट्टी- हवा- पानी- भोजन के माध्यम से शरीर तक पहुँचता है।
हम मनुष्य प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए बड़े अस्पतालों में जाते हैं, सर्जरी कराते हैं, दवाइयाँ खाते हैं। हमारी धरती माता इलाज के लिए कहाँ किस अस्पताल में जाए। उसकी कराह कौन सुने? बस हम खुदगर्ज लोग खुदी को बुलंद करने में जिंदगी भर लगे रहते हैं।

धरती माता ने हमें पाला और हम उसे अनाथ असहाय छोड़कर आगे निकल लिए। उसके लिए ईश्वर ने किसी अनाथालय का भी तो इंतजाम नहीं किया।

धरती माता हर युग में संत्रस्त होती आई है। त्रेता में भी ..भूमि विचारी गो तनु धारी गई विरंचि के पासा..। मानस में ये स्तुति आती है..जय जय सुरनायक जनसुख दायक। ब्रह्मा उसकी अर्जी विष्णु के पास रखते हैं। विष्णु जी इसे स्वीकार करते हैं ..तब भै प्रकट कृपाला दीनदयाला बनकर आते हैं।

हमारे पौराणिक आख्यानों के संकेतों को समझिए। बहुत कुछ है उसमें। रामायण को पर्यावरणीय दृष्टि से पढ़िए, समझिए। चित्रकूट के सरभंग आश्रम में जब राम राक्षसों के कुकृत्यों को अपनी आँखों से देखते हैं तभी प्रण करते हैं- निशिचर हीन करहु महि भुज उठाइ प्रण कीन्ह। धरतीमाता को निशचरों से मुक्ति का संकल्प लेते हैं। और अगस्त्य के आमंत्रण पर इस चुनौती को स्वीकार करते हुए दंडकारण्य की ओर चल पड़ते हैं।

हर चुनौती खतरों से भरी होती है। राम चाहते तो मजे से 14 वर्ष सुरक्षित चित्रकूट में बिता सकते थे। पर उन्हें खरदूषण और त्रिसरा से निपटना था। ये खरदूषण और त्रिसरा कौन..? साम्राज्यवादी रावण के एजेंट धरती माता आज भी ऐसे ही एजेंटों से संत्रस्त है। पौराणिक नामों में भी छिपे हुए गूढार्थों को जानिए। खरदूषण और प्रदूषण। खरदूषण प्रदूषण का प्रतीक जो अपने आका रावण के आदेश पर दंडकारण्य के पर्यावरण का नाश करने में जुटा था। राम पहला काम इन्हीं का संहार करके शुरू करते हैं।
सूपनखा भी ऐसी ही एक प्रतिनिधि है। सीता धरतीमाता की पुत्री सूपनखा अपने विशाल नाखूनों से भूमिजा को नोच लेना चाहती है। लक्ष्मण उसे विरूप बना देते हैं। आज खनन कंपनियां सूपनखाओं की भूमिका में हैं। भूमि व भूमिजा दोनों को अपने विशाल मशीनी पंजों से नोंच रही हैं।

पूँजी हमेशा से प्रकृति की दुश्मन रही है। जहाँ पूँजी का बोलबाला हुआ वहां प्रकृति का नाश समझिए। कोई नगर सोने का कैसे हो सकता है। पर सोने की लंका थी। सोने की लंका वस्तुतः पूँजीवाद की प्रतीक है। राम इस व्यवस्था का नाश करते हैं। वे चाहते तो अयोद्धा से भरत की चतुरंगिणी और जनक की पलटन को बुला सकते थे..। लेकिन नहीं.. उन्होंने प्रकृति के आराधकों की ही सेना जोड़ी। केवट, भील, कोल, किरात उनके सेवादार बने। बंदर, भालु, गिद्ध, गिलहरी ये सब उनकी सेना में।
राम ने शोषितों का सशक्तिकरण किया। उनका, जो वास्तव में पीड़ित थे। रावण की सेना से वैसी ही सेना भिड़ा सकते थे लेकिन नहीं, वे चाहते थे कि पूँजी के खिलाफ प्रकृति की विजय हो। सोने की लंका खाक में मिल गई। पूँजी पर प्रकृति की यह महाविजय थी जिसका नेतृत्व राम ने किया।

रामादल प्रकृति का आराधक था, धरती पुत्र था। धरती माता की वेदना को समझता था इसलिए एक साम्राज्यवादी पूँजीपति से हाँथ मिलाने और उसकी आधीनता को स्वीकार करने की बजाय उससे दो-दो हाथ करना ही यथेष्ठ समझा। धरती माता की इज्जत बच गई। लंका के उस माफिया के कब्जे से भूमिजा सीता को छुड़ा लाए।

कभी हम अपने पौराणिक आख्यानों को इस दृष्टिकोण से भी समझने की कोशिश करें, वहां समस्या है तो उसके समाधान के सूत्र भी हैं। हम यहां समस्या के सूत्रधारों के पाले में खड़े होकर समाधान की गुहार लगा रहे हैं। अब कोई राम नहीं आनेवाले जो वानर भालुओं को जोड़कर प्रकृति की अस्मिता बचाने की जंग छेंड़े। पहले हमें ही तय करना होगा कि हम किस पाले में खड़े हैं। अबकी समस्या ज्यादा विकट है.। धरती माता गाय बनकर अब किस अवतार के लिए गुहार लगाए..यहां तो बस कसाइयों की जमात है जिसने गाय की भाँति धरतीमाता को भी दुहकर असहाय छोड़ना जानती है।

प्रकृति को हम जब तक पश्चिम के नजरिए से देखेंगे कोई हल नहीं निकलने वाला। प्रकृति उनके लिए पर्यावरणीय घटकों का समुच्चय हो सकती है, अपने लिए नहीं। प्रकृति के साथ दैवीय भाव तब से रहा है जब से इस सृष्टि की रचना हुई और जीव में चेतन हुआ। प्रकृति के हर घटक हमारे देवता हैं जिंन्हें हम पंच तत्व कहते हैं। यही पश्चिम के लाए पर्यावरण है।

पूरब और पश्चिम के बीच का द्वंद्व ग्यान और विग्यान के बीच का द्वंद्व है। ग्यान सास्वत है, निरपेक्ष और सार्वभौमिक है। पश्चिम ने अपनी सुविधा के हिसाब से ग्यान को विग्यान में बदल दिया। विग्यान सार्वभौमिक, समावेशी नहीं बल्कि स्वार्थी है।
ग्यान प्रकृति के निकट है उसका वास्तविक पुत्र है और विग्यान प्रकृति का दुश्मन। इसे देवता और दैत्य के कथानक से समझ सकते हैं। दोनों कश्यप की संतानें हैं। उनकी एक पत्नी दिति के पुत्र दैत्य और अदिति के देव। इस तरह दैत्य और देव हैं तो सगे भाई पर स्वभाव एक दूसरे के विपरीत। उसी तरह ग्यान और विग्यान के बीच का रिश्ता।

ग्यान कहता है प्रकृति माँ है वह अन्न देती है, हवा पानी आश्रय देती है, इसके कुशल-क्षेम में ही हमारा भला है। विग्यान कहता है यह वस्तु है, इसकी कोख की संपदा हमारी है, इसका तिल-तिल भोगनीय है। कल की कल देखेंगे आज हमारा है हम आज को भोगें। ग्यान भूत से सबक लेता है, वर्तमान को धन्य मानता है, भविष्य की चिंता करता है। पर आज विग्यान लंकाधिपतियों के पास है और ग्यान अनाथालय में।
प्रकृति के मर्म को ग्यानचक्षु से देखेंगे तो सब समझ में आएगा….लेकिन ग्यानचक्षु में तो भौतिकता का मोतियाबिंद हो गया है। विग्यानचक्षु को धरतीमाता की बुखार और उसकी तड़प वैसे ही महसूस नहीं होगी जैसे रावण को लंका और समूचे कुल के महानाश के संकेत।

Jairam Shukla Ke Facebook Wall Se

आगामी विधानसभा चुनाव के लिए – शक्ति परिक्षण जारी

0

भोपाल: वर्ष 2023 के लिए मध्यप्रदेश में चुनावी सरगर्मी बढ़नी शुरू हो गई है। नये परिसीमन के आदेश के बाद जहां नई पंचायतों का गठन हो रहा है वहीं पंचायत और ग्रामीण स्तर तक राजनैतिक सक्रियता क्रमशः बढ़ती जा रही है। महसूस होता है कि भाजपा इन चुनावों में नये चेहरों का प्रयोग करेगी। संभावना तो यही है कि भाजपा की और से राज्य के नेतृत्व के लिए अनु. जाति, जनजाति का चेहरा भविष्य के लिए प्राथमिकता के आधार पर होगा। दूसरी और कांग्रेस में पुराने चेहरों पर ही चुनाव का दम आधारित कर दिया है। कमलनाथ और दिग्गिविजय सिंह की जोड़ी क्रमशः इस चुनाव में भी कांग्रेस के भाग्य का निर्धारण करेगी। तीसरी उम्मीद आम आदमी पार्टी से है, जो आने वाले चुनाव में प्रदेश भर के सभी राजनैतिक समीकरणों को परिवर्तित करने की कोशिश कर सकती है।

Capture 37मध्यप्रदेश में भाजपा हर स्तर पर राज्य के अंतिम मतदाता तक पहुंचने के लिए शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व पर आतुर है। जितना श्रम सत्ता कर रही है उतना ही श्रम संगठन की और से भी नजर आ रहा है। यदि भाजपा भविष्य के चुनाव में अनु. जाति या जनजाति के किसी उम्मीदवार को सामने रखकर चुनाव लड़ती है तो उसका प्रभाव कही अधिक होगा। भाजपा के पास वरिष्ठ स्तर के नेताओं की कमी नहीं है, जो वर्षो से संगठन के प्रति आस्थावान रहे है। भाजपा इन चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया को सामने रखकर भी खेल सकती है। सिंधिया का प्रभाव व्यवहारिक रूप में सिमित है और उन्हें भाजपा का परम्परागत कार्यकर्ता अभी भी पूरी तरह से स्वीकार नहीं कर पाया है। परंतु सिंधिया का आभा मंडल और एक आधुनिक युवा होने की छवि भाजपा के विकास की परिभाषा को बल देती है।
दूसरी और कांग्रेस अपने टूटे-फूटे संगठन को सुधारने में लगी है। पिछड़ा वर्ग सम्मेलन के माध्यम से एक नई चेतना लाने की कोशिश की जा रही है। परंतु प्रभावशील नये चेहरे को स्थान देने की जगह इस बार की सक्रियता कमलनाथ की प्रबंधन की राजनीति और दिग्गिविजय सिंह की कूटनीतिक रणनीति को ही मिलना तय माना जा रहा है। कार्यकर्ता आज तक इसे पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाया है। देखना है क्या भविष्य मे इसका लाभ कांग्रेस को आम मतदाता के मध्य मिल पाता है।

तीसरी और आम आदमी पार्टी दो राज्यों में सरकार बनाने के बाद अपने कार्यक्रमों के साथ मध्यप्रदेश में पहली बार कदम रखने जा रही है। आम आदमी पार्टी चुनाव जीतेगी नहीं पर मतों के अंतर को कम-ज्यादा करने में उसकी व्यापक भूमिका होगी। दिल्ली और पंजाब के पार्टी के कार्यक्रमों में मध्यप्रदेश के युवाओ के मध्य भी कई प्रश्न खड़े कर लिए है। वस्तुतः आम आदमी पार्टी अब तक राजनीति व्याप्त जमीदारी प्रथा के विरुद्ध जाकर राजनीति का क्षेत्र अति सामान्य युवाओं के लिए खोल रही है। अपने चुनावी घोषणा पत्रों के वायदों पूरा कर रही है, और प्रतिदिन की आम आदमी की परेशानियों से साक्षात्कार कर रही है। आम आदमी पार्टी की राज्य में उपस्थिति कांग्रेस और भाजपा के अब तक चले आ रही समीकरणों को बदलनें में कितनी सफल होती है ये चुनाव परिणाम ही बताएँगे, क्योकि मध्यप्रदेश की जमीन में प्रभावशाली तीसरा राजनैतिक दल पहली बार अपनी उपस्थिति दर्ज कराने जा रहा है।

मध्यप्रदेश का आगामी चुनाव आम जनता की समस्याओं उम्मीदवारों की लोकप्रियता और युवा, किसान, महिलाओं के प्रतिदिन की परेशानियों पर केन्द्रीत होगा। इस चुनाव के बाद वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव सामने है, इसलिए वर्ष 2023 में होने वाले तीन राज्यों के चुनाव सभी राजनैतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण हो गए है।

Sudhir Pandey Ke Facebook Wall Se

Join Whatsapp Group
Join Our Whatsapp Group