नई दिल्ली। अमेरिका में भारतीय आईटी (IT) कंपनियों और पेशेवरों को प्रभावित करने वाले सख्त इमिग्रेशन नियमों को लेकर देश की राजनीति गरमा गई है। कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला है और अमेरिकी नीतियों के सामने झुकने का गंभीर आरोप लगाया है।
परमानेंट लेबर सर्टिफ़िकेशन (PERM) प्रोग्राम से अस्थायी बाहर
कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स के माध्यम से केंद्र सरकार पर जोरदार निशाना साधा है। उनका आरोप है कि अमेरिकी प्रशासन द्वारा बड़ी भारतीय आईटी कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफ़िकेशन (PERM) प्रोग्राम से अस्थायी रूप से बाहर किए जाने के मामले में प्रधानमंत्री मोदी ने कोई कड़ा रुख नहीं अपनाया है, बल्कि वे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में पूरी तरह झुकते नजर आ रहे हैं।
H-1B वीजा फीस और PERM सस्पेंशन से दोहरा झटका
कांग्रेस नेता ने कहा कि H-1B वीजा के लिए भारी-भरकम फीस चुकाए जाने के कारण अमेरिकी कंपनियों को पहले से ही भारतीय टैलेंट को अपनी कंपनियों में हायर करने से पहले कई बार सोचना पड़ रहा था। अब ट्रंप प्रशासन द्वारा प्रमुख भारतीय आईटी कंपनियों के लिए PERM प्रोग्राम को सस्पेंड किए जाने से अमेरिका में काम कर रही इन फर्मों के लिए अपने कर्मचारियों को स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड के लिए स्पॉन्सर करना और भी ज्यादा पेचीदा और मुश्किल हो गया है।
राहुल गांधी की सलाह का जिक्र और '56 इंच' पर तंज
पवन खेड़ा ने अपने बयान में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने कई बार प्रधानमंत्री को यह सलाह दी थी कि अमेरिका के साथ कूटनीतिक वार्ताओं के दौरान उन्हें अपनी बात पर पूरी दृढ़ता से अड़े रहना चाहिए और एक मजबूत रुख अपनाना चाहिए। लेकिन इसके विपरीत, मोदी जी राहुल गांधी की सलाह मानने के बजाय अपने 'दोस्त' डोनाल्ड ट्रंप के दबाव के आगे नतमस्तक होना बेहतर समझ रहे हैं।
किन कंपनियों पर पड़ा है इस अमेरिकी फैसले का असर?
मिली जानकारी के मुताबिक, अमेरिकी श्रम विभाग (US Department of Labor) ने कई प्रमुख आईटी और टेक कंपनियों द्वारा नए PERM आवेदन दाखिल करने पर रोक लगाने की आधिकारिक घोषणा की है। इस फैसले की चपेट में आने वाली प्रभावित कंपनियों में कॉग्निजेंट, इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), विप्रो और एचसीएल (HCL) जैसी दिग्गज भारतीय आईटी फर्में शामिल हैं, साथ ही माइक्रोसॉफ्ट और एडोब जैसी अमेरिकी टेक कंपनियां भी इससे प्रभावित हुई हैं।
अमेरिकी प्रशासन ने कई सक्रिय फेडरल जांचों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया है कि इन कंपनियों के न तो नए आवेदन स्वीकार किए जाएंगे और न ही पहले से पेंडिंग पड़े आवेदनों पर कोई कार्रवाई की जाएगी। अमेरिका का यह आरोप है कि वर्ष 2009 से इन कंपनियों ने लाखों विदेशी कर्मचारियों के लिए वीजा हासिल किए हैं, जिससे स्थानीय अमेरिकी नागरिकों के लिए रोजगार के अवसरों पर विपरीत असर पड़ा है।
NASSCOM और टेक कंपनियों का पक्ष
इस पूरे घटनाक्रम पर भारतीय आईटी उद्योग की प्रतिनिधि संस्था 'नैसकॉम' (NASSCOM) ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि इमिग्रेशन और प्रतिभाओं की आवाजाही (टैलेंट मूवमेंट) को एक ही तराजू में नहीं तोला जाना चाहिए। संस्था के अनुसार, PERM प्रक्रिया के सस्पेंड होने से इमिग्रेशन के केवल एक खास रास्ते पर असर पड़ता है, जबकि भारतीय आईटी कंपनियों ने पिछले कुछ वर्षों में H-1B वीजा पर अपनी निर्भरता काफी हद तक कम कर दी है। इसके अलावा, इन कंपनियों ने अमेरिका में स्थानीय स्तर पर लोगों की भर्ती को बढ़ावा दिया है।
दूसरी ओर, माइक्रोसॉफ्ट ने स्पष्ट किया है कि उसके नए कर्मचारियों के लिए बाकी बची H-1B फाइलिंग में ऐसे लोग शामिल हैं जो पहले से ही कानूनी तौर पर अमेरिका में रह रहे हैं और कंपनी का कुल अमेरिकी वर्कफोर्स का यह हिस्सा लगभग 1 प्रतिशत है। वहीं, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने कहा है कि इस सस्पेंशन से उसकी अमेरिकी कार्यनीति या क्लाइंट्स के कामकाज पर कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि पिछले दो सालों में उनके PERM आवेदन सिंगल डिजिट में रहे हैं और कंपनी अगले पांच वर्षों में अमेरिका में 15,000 और स्थानीय लोगों को भर्ती करने की योजना पर काम कर रही है।









