लखनऊ: देशभर में फैली बेशकीमती शत्रु संपत्तियों (Enemy Properties) को लेकर केंद्र सरकार ने एक बड़ा और कड़ा निर्णय लिया है। करोड़ों और अरबों रुपये की बाजार कीमत वाली इन संपत्तियों की विडंबना यह है कि इनमें से कई बड़ी संपत्तियां ऐसी हैं, जिनका मासिक किराया केवल कुछ सौ रुपये है, जबकि उनके किराएदार और अवैध कब्जेदार उनसे प्रति माह लाखों रुपये की मोटी कमाई कर रहे हैं। इन संपत्तियों को खाली करवाकर इनकी खुली नीलामी कराने के पीछे मुख्य वजह यही है कि तमाम प्रशासनिक कोशिशों के बावजूद शत्रु संपत्ति अभिरक्षा कार्यालय (Custodian Office) इनका किराया बढ़वाने या वास्तविक बाजार दर के हिसाब से वसूली करने में पूरी तरह असफल रहा है। यही कारण है कि अब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इन सभी संपत्तियों की नीलामी करने का ठोस फैसला किया है।
राजधानी के पॉश हजरतगंज में स्थित हलवासिया मार्केट का मामला
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सबसे पॉश और वीआईपी इलाके हजरतगंज में स्थित मशहूर हलवासिया मार्केट शत्रु संपत्ति के दायरे में आती है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार, यह विशाल संपत्ति लगभग दस हजार वर्ग मीटर क्षेत्र में फैली हुई है और दशकों से लीज पर दी गई है। हैरानी की बात यह है कि इस बहुमूल्य कमर्शियल प्रॉपर्टी का प्रति माह किराया मात्र 700 रुपये है।
नाममात्र का किराया होने के कारण अभिरक्षा कार्यालय को इससे आर्थिक रूप से भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है, जबकि यहां से करोड़ों का कारोबार किया जा रहा है। आगामी वर्ष इस संपत्ति की लीज अवधि भी समाप्त होने जा रही है।
इसी प्रकार अन्य संपत्तियों का हाल भी कम चौंकाने वाला नहीं है:
कोहली ब्रदर्स: लगभग 400 वर्ग मीटर में फैली इस संपत्ति का मासिक किराया सिर्फ 250 रुपये है।
कपूर होटल: इस बहुमूल्य व्यावसायिक संपत्ति का किराया महज 8 हजार रुपये प्रति माह है।
टाटा समूह से जुड़ी संपत्ति: इसका किराया केवल 3 हजार रुपये प्रति महीना है।
महाटेक्स हैंडलूम: करीब 400 वर्ग मीटर में फैली इस संपत्ति का किराया भी महज 2 हजार रुपये प्रति महीना ही वसूला जा रहा है।
इन आंकड़ों से आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इतने प्राइम और पॉश लोकेशन पर स्थित शत्रु संपत्तियों से जहां निजी लोग लाखों-करोड़ों रुपये कमा रहे हैं, वहीं सरकारी खजाने और अभिरक्षा कार्यालय को इसके एवज में नाममात्र की आय भी नहीं हो रही है। विभाग ने अतीत में कई बार किराया तर्कसंगत बनाने या उसे बढ़ाने की जद्दोजहद की, लेकिन हर बार कानूनी और प्रशासनिक पेंच फंसते चले गए। हालांकि, अब सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इन संपत्तियों की लीज और पुरानी किरायेदारी का नवीनीकरण नहीं किया जाएगा, बल्कि इन्हें पूरी तरह खाली करवाकर नीलाम किया जाएगा।
इन संपत्तियों को कब्जामुक्त कराना नहीं होगा आसान
गृह मंत्रालय के इन सख्त आदेशों के बावजूद शत्रु संपत्तियों को अवैध कब्जों से मुक्त कराना प्रशासन के लिए आसान चुनौती नहीं होगी। अभिरक्षा कार्यालय इससे पहले भी कई बार अवैध कब्जों से इन संपत्तियों को छुड़ाने की कोशिशें कर चुका है। कुछ संपत्तियों को खाली भी कराया गया, लेकिन अधिकांश पर आज भी कब्जा बरकरार है।
मौजूदा किरायेदार, लीजधारक और अवैध रूप से कब्जा जमाने वाले लोग अदालतों का दरवाजा खटखटा चुके हैं। तमाम कानूनी पेंचीदगियों के कारण अभिरक्षा कार्यालय कई मामलों में त्वरित और अंतिम कार्रवाई करने से चूक जाता रहा है। जानकारों का मानना है कि गृह मंत्रालय के आदेश के बाद भी इन संपत्तियों को पूरी तरह से कब्जामुक्त करना प्रशासन के लिए कड़ी परीक्षा साबित होगा।
60 फीसदी से अधिक संपत्तियों पर अवैध कब्जे का शिकंजा
विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, कुल शत्रु संपत्तियों में से महज आठ से दस प्रतिशत संपत्तियां ही वैध रूप से लीज या किरायेदारी पर हैं। इनमें से कुछ की नीलामी पहले की जा चुकी है, जबकि कुछ ही संपत्तियां सीधे तौर पर विभाग के नियंत्रण में हैं।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, कुल शत्रु संपत्तियों के 60 प्रतिशत से अधिक हिस्से पर आज भी अवैध कब्जे विद्यमान हैं। स्थिति यह है कि कई जगहों पर लोग इन बेशकीमती जमीनों पर अवैध रूप से खेती कर रहे हैं। यही नहीं, कइयों ने तो मूल लीज खत्म होने या नियमों को ताक पर रखकर इन संपत्तियों को आगे अन्य लोगों को किराए पर उठा रखा है, जिससे वे अवैध रूप से हर महीने लाखों रुपये की कमाई कर रहे हैं।









