निकाय चुनाव में भाजपा का दबदबा, बांसवाड़ा में बोर्ड बनना तय; सभापति की रेस में रावत Vs राणा

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बांसवाड़ा: बांसवाड़ा नगर परिषद चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 60 में से 34 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज कर स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर लिया है। बोर्ड गठन की तस्वीर साफ होते ही अब नगर परिषद के नए सभापति के चयन को लेकर सरगर्मियां तेज हो गई हैं। चूँकि सभापति का पद अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग के लिए आरक्षित है, इसलिए भाजपा के एसटी वर्ग से विजयी पार्षदों में खींचतान शुरू हो चुकी है। सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की पृष्ठभूमि से जुड़े पार्षद को ही इस शीर्ष पद की जिम्मेदारी सौंपने का पक्षधर है।

सभापति का पद एसटी वर्ग के लिए आरक्षित

बांसवाड़ा नगर परिषद में इस बार सभापति का पद एसटी वर्ग हेतु आरक्षित किया गया है। नगर परिषद के कुल 60 वार्डों में से 9 वार्ड एसटी वर्ग के लिए आरक्षित थे, जहाँ से इस वर्ग के कुल 13 प्रत्याशी चुनावी समर में उतरे थे। टिकट वितरण के समय से ही भाजपा का बोर्ड बनने पर सभापति पद के लिए संभावित चेहरों पर चर्चा आरंभ हो गई थी। इसमें वार्ड 17 से राजेश कटारा और वार्ड 9 से मुकेश रावत प्रमुख दावेदार माने जा रहे थे, जबकि प्रचार के दौरान वार्ड 4 से दिनेश राणा और वार्ड 27 से श्यामा राणा का नाम भी रेस में शामिल हो गया था।

राजेश कटारा और श्यामा राणा की पराजय से बदले समीकरण

सोमवार को मतगणना के उपरांत आए नतीजों में सभापति पद के मुख्य दावेदार राजेश कटारा और श्यामा राणा चुनाव हार गए। इसके पश्चात् अब मुकेश रावत और दिनेश राणा के नाम रेस में सबसे आगे उभरकर आए हैं। भाजपा से एसटी वर्ग में चुनाव जीतने वाले अन्य पार्षदों में जीवा कुमारी, लक्ष्मीकांत ताबियार तथा रंगजी निनामा भी शामिल हैं, परंतु मुख्य मुकाबला रावत और राणा के मध्य ही देखा जा रहा है।

एबीवीपी पृष्ठभूमि और संगठनात्मक अनुभव की भूमिका अहम

चुनाव परिणामों के पश्चात अब संघ की प्राथमिकताओं को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चाएँ गर्म हैं। सूत्रों के मुताबिक, संगठन एबीवीपी पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले कार्यकर्ता को नगर परिषद की कमान देने का इच्छुक है। खास बात यह है कि रेस में शामिल मुकेश रावत और दिनेश राणा, दोनों ही पूर्व में एबीवीपी से जुड़े रहे हैं। हालांकि, मुकेश रावत का संगठनात्मक व प्रशासनिक अनुभव उनकी दावेदारी को अधिक वजन प्रदान करता है। रावत पूर्व में भाजपा के जिला महामंत्री रह चुके हैं और पंचायत समिति सदस्य के रूप में भी कार्य कर चुके हैं, जो उन्हें दिनेश राणा की तुलना में बढ़त दिला सकता है।

उप सभापति पद के लिए भी कई दिग्गजों में होड़

सभापति के साथ-साथ उप सभापति के पद को लेकर भी पार्टी के भीतर दावेदारी शुरू हो गई है। पूर्व उप सभापति महावीर बोहरा, दीपक जोशी और चंकी शाह लगातार तीसरी बार चुनाव जीतकर परिषद में पहुँचे हैं, जिससे उनकी दावेदारी बेहद मजबूत मानी जा रही है। वहीं, चुनाव संयोजक भवानी जोशी अपने पुत्र भरत जोशी को उप सभापति बनवाने के लिए प्रयासरत हैं, जो दूसरी बार पार्षद चुने गए हैं। इसके अतिरिक्त नगर अध्यक्ष युगल उपाध्याय भी दूसरी बार चुनाव जीतकर उप सभापति पद की दौड़ में बने हुए हैं।

अब भाजपा नेतृत्व के सामने सभापति और उप सभापति दोनों पदों के लिए सर्वमान्य चेहरों का चुनाव करना एक बड़ी चुनौती है। जहाँ सभापति पद पर सामाजिक व वैचारिक पृष्ठभूमि को प्राथमिकता दी जा रही है, वहीं उप सभापति के चयन में वरिष्ठता, संगठनात्मक निष्ठा और क्षेत्रीय समीकरण निर्णायक सिद्ध होंगे।