राम मंदिर चंदा मामले में बड़ा दावा, डॉ. अनिल मिश्र पर 40% कमीशन लेने का आरोप

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अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि परिसर से जुड़े निर्माण कार्यों को लेकर समय-समय पर होने वाले विवादों के बीच अब एक नया प्रशासनिक गतिरोध खुलकर सामने आ गया है। राम मंदिर निर्माण कार्यों की तकनीकी देखरेख से जुड़े रहे सेवानिवृत्त (रिटायर्ड) इंजीनियर दीनानाथ वर्मा ने इंटरनेट मीडिया पर साझा किए गए एक साक्षात्कार में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के वरिष्ठ सदस्य डॉ. अनिल मिश्र पर वित्तीय अनियमितता के गंभीर आरोप मढ़े हैं। गौरतलब है कि इससे पहले टिन्नू यादव नामक व्यक्ति भी ट्रस्ट के मुख्य पदाधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उंगली उठा चुके हैं।

पूर्व इंजीनियर दीनानाथ वर्मा ने सनसनीखेज दावा किया है कि मंदिर परिसर के भीतर बन रहे आधिकारिक कार्यालय (ऑफिस) में एल्युमिनियम से जुड़े कार्यों को कराने के एवज में एक संबंधित वेंडर से कथित तौर पर 40 फीसदी कमीशन की मांग की गई थी। उनका आरोप है कि इस अवैध हिस्सेदारी को एडजस्ट करने के उद्देश्य से ही वास्तविक कार्य के सरकारी बिल को भी करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ाकर कागजों पर तैयार करवाया गया था।

कॉल रिकॉर्डिंग होने का दावा, शिकायत के बाद काम से हटाने का आरोप

इंजीनियर वर्मा के अनुसार, उन्होंने इस पूरी वित्तीय गड़बड़ी और बढ़े हुए बिल पर कड़ी तकनीकी आपत्ति दर्ज कराई थी। उन्होंने इस मामले की पूरी शिकायत साक्ष्यों के साथ ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के समक्ष भी उठाई थी। उनका दावा है कि उन्होंने इस कथित सौदेबाजी से जुड़ी एक गोपनीय कॉल रिकॉर्डिंग भी आला अधिकारियों को सुनवायी थी, लेकिन इस पर सुधारात्मक कदम उठाने के बजाय उल्टे उन्हें ही मंदिर निर्माण के इस प्रोजेक्ट से पूरी तरह बेदखल कर दिया गया। अपने वक्तव्य में दीनानाथ वर्मा ने उस दौरान जमीनी स्तर पर काम देख रहे एक कर्मी रवि गुप्ता का भी विशेष रूप से नाम लिया।

कथित कर्मी ने सामने आकर आरोपों को नकारा, बताया निराधार

हालांकि, भ्रष्टाचार के ये आरोप सार्वजनिक मंच पर आने के कुछ ही घंटों के भीतर इस मामले में नया मोड़ आ गया। मामले में नामजद कर्मी रवि गुप्ता ने स्वयं इंटरनेट मीडिया पर लाइव आकर इन सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया। रवि गुप्ता ने स्पष्ट किया कि ट्रस्ट के वरिष्ठ सदस्य डॉ. अनिल मिश्र पर लगाए जा रहे ये लांछन पूरी तरह से मनगढ़ंत, तथ्यहीन और वास्तविकता से परे हैं। उन्होंने वास्तविक घटनाक्रम बताते हुए कहा कि राम कचहरी मंदिर परिसर में बन रहे ट्रस्ट कार्यालय के निर्माण कार्य को लेकर प्रशासनिक तौर पर उनसे एक कोटेशन (मूल्य सूची) मांगी गई थी।

नए टेंडर के तहत पारदर्शी तरीके से पूरा हुआ निर्माण कार्य

रवि गुप्ता ने बताया कि शुरुआती कोटेशन जमा करने के बाद कई दिनों तक उन्हें विभाग से कोई जवाब नहीं मिला। बाद में उन्हें पता चला कि तत्कालीन इंजीनियर दीनानाथ वर्मा किसी अन्य एजेंसी के जरिए वह काम करवा रहे हैं। हालांकि, वह कार्य तकनीकी या वित्तीय कारणों से बीच में ही लटक गया, जिसके बाद ट्रस्ट ने उन्हें दोबारा साइट पर बुलाया। वहां नए सिरे से पूरी माप-जोख की गई और पारदर्शी तरीके से नया कोटेशन स्वीकृत होने के बाद ही निर्माण कार्य को सफलतापूर्वक पूरा कराया गया।

ठेकेदार रवि गुप्ता ने दो टूक लहजे में कहा, "यह पूरा काम मेरी देखरेख में हुआ है और इसके भुगतान सीधे खाते में आए हैं। पूरे कार्यकाल के दौरान किसी भी अधिकारी या सदस्य द्वारा कभी भी किसी प्रकार की रिश्वत या कमीशन की कोई बात नहीं की गई। यदि पूर्व इंजीनियर के पास अपने दावों को सच साबित करने वाले कोई पुख्ता दस्तावेज या सबूत हैं, तो वे उन्हें छिपाने के बजाय सार्वजनिक करें। मैं उनके इन आरोपों को पूरी तरह झूठ करार देता हूँ।"

फिलहाल, अयोध्या की इस पावन धरा पर बना यह संवेदनशील मामला केवल जुबानी दावों और पलटवार तक सीमित है। यदि भविष्य में किसी अधिकृत जांच एजेंसी द्वारा इन तकनीकी और वित्तीय फाइलों की गहराई से समीक्षा की जाती है, तभी इस पूरे विवाद का सच सामने आ सकेगा।